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प्रकृति के महत्व को समझाता है यह त्योहार

Tue, 06 Aug 2013 02:04 PM IST
अनाम स्वामी
अनाम स्वामी Updated Tue, 06 Aug 2013 02:04 PM IST
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hariyali amavas festival of nature

श्रावण कृष्ण पक्ष अमावस्या को हरियाली अमावस्या के नाम से जाना जाता है। यह अमावस्या पर्यावरण के संरक्षण के महत्व व आवश्यकता को प्रदर्शित करती है। देश के कई भागों विशेष कर उत्तर भारत में इसे एक धार्मिक पर्व के साथ ही पर्यावरण संरक्षण के रूप में मनाया जाता है। इस दिन नदियों व जलाशयों के किनारे स्नान के बाद अपने इष्ट की पूजा और फिर वृक्षों और पेड़ पौधों को रोपने का विधान भी है।

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मनीषियों ने विशेषकर आम, आंवला, पीपल, वट वृक्ष और नीम के पौधों को रोपने का विशेष महत्व बताया है। कहना जरूरी नहीं है कि भारतीय मानस वृक्षों में देवताओं का वास मानता है। इतना ही नहीं वह वृक्षों को देवशक्तियों के प्रतीक और स्वरूप के रूप मे भी देखता, समझता है। उदाहरण के लिए पीपल के वृक्ष में त्रिदेव यानी ब्रह्मा, विष्णु व शिव का वास होता है। इसी प्रकार आंवले के पेड़ में लक्ष्मीनारायण के विराजमान होने की परिकल्पना की गई है। इसके पीछे वृक्षों को संरक्षित रखने की भावना निहित है।
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इस तथ्य को स्मरण रखने के लिए ही हरियाली अमावस के मेलों का आयोजन किया जाता है। इसमें सभी वर्ग के लोगों के साथ युवा भी शामिल हो पर्व मनाते हैं। गुड़ व गेहूं की धानि का प्रसाद दिया जाता है। स्त्री-पुरुष इस दिन गेहूं, ज्वार, चना व मक्का की सांकेतिक बुआई करते हैं जिससे कृषि उत्पादन की स्थिति क्या होगी इसका अनुमान लगाया जाता है।
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मध्यप्रदेश में मालवा व निमाड़, राजस्थान के दक्षिण पश्चिम, गुजरात के पूर्वोत्तर क्षेत्रों, उत्तर प्रदेश के दक्षिण पश्चिमी इलाके, हरियाणा और पंजाब में हरियाली अमावस्या को इसी तरह पर्व के रूप में मनाया जाता है। सावन में अब भी कजरारे काले बादल उमड़ घुमड़ कर बरसते हैं, घटाएं छाती हैं पर गांवों में महिलाओं और युवतियों का झूले डालकर कजरी गाना कम हुआ है।


जब कभी यह सब उत्सव रूप में धूमधाम से होता था तब लोगों के कदम ठिठक जाया करते थे और वे कजरी गीत सुनने के लिए अपने को रोक नही पाते थे। चलन और स्वरूप भले ही बदल गया हो, प्रकृति और वृक्ष वनस्पति के प्रति कृतज्ञता का भाव भी कुछ कम हो और वह संपदा के रूप में देखी जाने लगी हो, लेकिन उसका महत्व कम नहीं हुआ है। गाहे-बगाहे प्रकृति अपने होने का महत्व और उपेक्षा के दुष्परिणामों का बोध करा ही देती है। हरियाली अमावस प्रकृति के मातृरूप को समझने, अनुभव और अंगीकार करने का उत्सव है।

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