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भगवान दयालु है या न्याय करने वालाः आशाराम बापू

Sat, 25 May 2013 01:02 PM IST
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क।
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क। Updated Sat, 25 May 2013 01:02 PM IST
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god is merciful or judge

जो व्यक्ति दयालु होता है वह ठीक से न्याय नहीं कर सकता और जो न्यायप्रिय होता है वह दया नहीं कर सकता। तब कई बार मन में होता है कि भगवान दयालु हैं कि न्यायकारी? अगर दयालु हैं तो पापी पर भी दया करके उसको माफ कर देना चाहिए।

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अगर भगवान न्यायकारी हैं और हमारे कर्मों का ही फल हमको देते हैं तो फिर हम उनकी भक्ति क्यों करें? अगर भगवान
दया नहीं कर सकते तो हम उनका भजन क्यों करें? और भगवान यदि न्याय नहीं कर सकते तो अन्यायी हमारा क्या भला करेगा? अगर हमारा भला करेगा तो दूसरे का बुरा होगा।
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अगर सजा देते हैं तो वे दयालु नहीं हैं। तो बताओ भगवान दया करते हैं कि न्याय करते हैं?  सच तो यह है कि भगवान दया भी करते हैं और न्याय भी करते हैं। यह कैसे हो सकता है? जो दया करेगा वह न्याय में कहीं-न-कहीं ऊपर नीचे जरूर करेगा। तो क्या भगवान न्याय में पक्षपात करने वाला है।
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भगवान न्यायकारी हैं, ऐसा मानोगे तो कर्म सिद्धांतवाले आपकी पीठ ठोकेंगे कि ठीक समझे- करम प्रधान बिस्व करि राखा। जो जस करइ सो तस फलु चाखा॥ (श्री रामचरित. अयो.कां. : 218.2) और दयाप्रियवाले पक्ष में बैठोगे तो भक्त आपकी पीठ ठोकेंगे। अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः। सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं संतरिष्यसि॥

‘यदि तू अन्य सब पापियों से भी अधिक पाप करनेवाला है तो भी तू ज्ञानरूप नौका द्वारा निःसंदेह सम्पूर्ण पाप-समुद्र से भलीभाँति तर जायेगा।’ (गीता : 4.36)

भाई देखो, एक कर्म-सिद्धांत होता है, दूसरा भगवदीय सिद्धांत होता है। जो पापकर्म करते हैं और पाप को पाप नहीं मानते, ऐसे लोगों के लिए भगवान न्यायकारी हैं। जो एकदम अड़ियल होते हैं, गलती को ढ़कने के लिए तर्क देते हैं उनको तो न जाने कितने कँटीले वृक्षों की योनियों में, सुअर की, भैंसे की योनि में जा-जाकर डण्डे खाने पड़ेंगे, तब कहीं उनका कल्याण होगा।

ऐसे लोगों के लिए भगवान न्यायकारी हैं, उनको दण्ड देकर उनका भला करते हैं। अपराधी व्यक्ति के साथ तो न्याय किया जाय, दण्ड दिया जाय ताकि वह अपराध से बचे। अपराधी पर दया करके छोड़ दोगे तो वह अपराध से नहीं बचेगा। इसीलिए अपराधी के साथ न्याय किया जाता है लेकिन जो पाप को पाप मानते हैं, गलती को गलती मानते हैं प्रायश्चित्त करके छटपटाते हैं और भगवान की शरण जाते हैं उन पर भगवान दया करते हैं।

जैसे आपने बदपरहेजी की, गलती करने से बीमार हुए और वैद्य के पास गये तो वैद्य आपको सजा नहीं देता, आपका उपचार करके बीमारी मिटाकर आपको तंदुरुस्त कर देता है, ऐसे ही भगवान हमारी बुद्धि के, हमारे कर्मों के दोष मिटाकर हमें शुद्ध करते हैं यह भगवान की दया है। एक होते हैं अपराधी वृत्ति के व्यक्ति और दूसरे होते हैं रुग्ण वृत्ति के व्यक्ति। अपराधी के साथ न्याय किया जाता है और रुग्ण पर दया की जाती है क्योंकि जो रोगी है, लाचार है उसको सहानुभूति की जरूरत है।

माँ अति उद्दण्ड बच्चे को दण्ड देती है, यह माँ की कृपा है और दूसरा बच्चा जो स्नेह का पात्र है उस पर दया करती है, उसे खिलाती-पिलाती है, दुलार करती है। माँ तो दोनों का मंगल चाहती है। ऐसे ही भगवान माताओं की माता और पिताओं के पिता हैं, भगवान हमारा मंगल ही चाहते हैं। भगवान न्याय भी करते हैं और दया भी करते हैं। भगवान न्यायकारी हैं यह एक पक्ष हो गया और दयालु हैं यह दूसरा पक्ष हो गया लेकिन वास्तव में भगवान प्राणिमात्र के परम सुहृद हैं। भगवान के वचन हैं:

सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति। ‘मेरा भक्त मुझको सम्पूर्ण भूत-प्राणियों का सुहृद अर्थात् स्वार्थरहित दयालु और प्रेमी, ऐसा तत्त्व से जानकर शांति को प्राप्त होता है।’ (गीता : 5.29)

यह अपनी कमजोरी है कि न चाहने पर भी काम-विकार में गिर जाते हैं, न चाहने पर भी क्रोध आ जाता है, न चाहने पर भी लोभ में फँस जाते हैं और पुरानी आदतों में फिसल जाते हैं। यदि वे आदतें खटकती हैं तो आप भगवान को पुकारो: ‘हे अच्युत! हे गोविंद! हे अनंत! माधव!...’ वे आपकी मदद करेंगे क्योंकि भगवान दयालु हैं।

भगवान का नाम और सत्संग ये दो साधन हैं, ये आपके ऊपर दया की वृष्टि करा देंगे। यदि वे आदतें आपको नहीं खटकती हैं और आप भगवान को मानते ही नहीं हैं तो न्यायकारी भगवान का दण्डचक्र घूमेगा। दण्ड आकर पाप का फल भुगताकर चला जायेगा, दया आकर पुण्य का फल देकर चली जायेगी लेकिन भगवान उतने ही नहीं हैं, भगवान प्राणिमात्र के परम सुहृद हैं।

एक बात खास याद रखना कि भगवान ने आपको खुशामदखोर बनने के लिए धरती पर जन्म नहीं दिया है। यह वहम घुस गया है कि हम जरा भगवान की पूजा करें, खुशामद करें तो भगवान खुश होंगे, जैसे अफसर की, नेता की खुशामद करके लोग अपना काम बनाते हैं। इस प्रकार की मानसिकता बहुत तुच्छ है। भगवान आपको दास बनाकर, खुशामद कराके आपका भला करनेवालों में से नहीं हैं।

भगवान ने आपको खुशामदखोरी के लिए पैदा नहीं किया है, आपको अपने स्वरूप का अमृत देने के लिए पैदा किया है। भगवान ने आपको अपना दोस्त बनाने के लिए पैदा किया है। तस्माद्योगी भवार्जुन। (गीता : 6.46)

‘इसलिए तू योगी हो’ अर्थात् मेरे से योग कर, मेरे से मिल। गुलाम को मिलाया जाता है क्या? नहीं... अपने से सजातीय को मिलाया जाता है। (जीव और ईश्वर की जाति एक है।) ईस्वर अंस जीव अबिनासी। चेतन अमल सहज सुख रासी॥

अतः भगवान सुहृद भी हैं। जो अपनी गलती को ढूँढ़ता है, स्वीकारता है और निकालने का प्रयास करता है, उस पर भगवान की दया होती है। जो अपने अपराध को मानता है, पश्चात्ताप करता है और प्रायश्चित्त के लिए छटपटाता है उस पर भी भगवान दया करते हैं।


जो अपने अपराध को अपराध नहीं मानता, भूल को भूल नहीं मानता, उसके लिए भगवान न्यायकारी हो जाते हैं। गलतियाँ करोगे तो भगवान हृदय की धड़कनें बढ़ा देंगे। अगर प्रायश्चित्त करोगे और मार्गदर्शन मांगोगे तो निर्भयता मिलेगी। अतः भगवान दयालु भी हैं, न्यायप्रिय भी हैं और परम सुहृद भी हैं।


साभारः ‘ऋषि प्रसाद’ विभाग, संत श्री आसारामजी आश्रम

संत श्री आशारामजी बापू परिचय
संत श्री आशारामजी बापूजी न केवल भारत को अपितु सम्पूर्ण विश्व को अपनी अमृतमयी वाणी से तृप्त कर रहे हैं। संत श्री आसारामजी बापू का जन्म सिंध प्रान्त के नवाबशाह ज़िले में बेराणी गाँव में नगर सेठ श्री थाऊमलजी सिरुमलानी के घर 17 अप्रैल 1941 को हुआ। देश-विदेश में इनके 410 से भी अधिक आश्रम व 1400 से भी अधिक श्री योग वेदांत सेवा समितियाँ लोक-कल्याण के सेवाकार्यों में संलग्न हैं।

गरीब-पिछड़ों के लिए ‘भजन करो, भोजन करो, रोजी पाओ’ जैसी योजनाएं, निःशुल्क चिकित्सा शिविर, गौशालाएं, निःशुल्क सत्साहित्य वितरण, नशामुक्ति अभियान आदि सत्प्रवृत्तियां भी आश्रम व समितियों द्वारा चलायी जाती है। आशा राम बापू जी भक्तियोग, कर्मयोग व ज्ञानयोग की शिक्षा से सभी को स्वधर्म में रहते हुए सर्वांगीण विकास की कला सिखाते हैं।

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