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महसूस करो खुद में ईश्वर की झलक मिलेगीः आशाराम बापू
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क।
Updated Sat, 04 May 2013 01:44 PM IST
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तकलीफें यदि सदा-सदा के लिए मिटानी हैं तो दर्दशामक गोलियों (पेनकिलर्स) से नहीं
मिटेंगी, उसके लिए किन्हीं ऐसे महापुरुष के पास जाना होगा जो अपने निजस्वरूप,
‘सोऽहम्’ स्वभाव में स्वयं टिके हुए हों और दूसरों को टिकाने का सामर्थ्य रखते हों।
अपने ‘सोऽहम्’ स्वरूप में टिकने की साधना मोक्ष की साधना है, दुःखों की आत्यंतिक निवृत्ति और परमानंदप्राप्ति की साधना है, ईश्वरप्राप्ति की साधना है। श्वास अंदर जाता है उसमें मिला दो ‘सोऽऽऽ’ और बाहर आता है उसमें मिला दो ‘हम्’ और भावना करो: ‘जिसकी सत्ता से आँख देखती है, वह चैतन्य मैं हूँ। जिसकी सत्ता से हाथ उठते हैं, वह चैतन्य मैं हूँ। मरने के बाद भी जो रहता है, वह मैं हूँ।
मैं शांत आत्मा हूँ, चैतन्य आत्मा हूँ, सुखस्वरूप हूँ, अमर हूँ, ईश्वर का अविभाज्य अंश हूँ। जिस ‘सोऽहम्’ स्वभाव में गोता लगाकर मेरे गुरुजी शांत, आनंदित और समर्थ हुए, उसी में गोता लगाकर मैं शांतात्मा हो रहा हूँ। मैं अपने गुरुस्वभाव से, गुरुदेव से मिल रहा हूँ। सोऽहम्, चैतन्योऽहम्, शाश्वतोऽहम्, इष्टसन्तानोऽहम्, सोऽहम्... अब हम दुर्जनों से दबेंगे नहीं।
सद्गुरु और परमात्मा को दूर नहीं मानेंगे, पराया नहीं मानेंगे। सोऽहम्...’ यह मोक्ष की कुंजी है; ‘मास्टर की’ है मोक्ष की, दुःखों को भगाने की। रोगों को मिटाने में भी यह आनंदरस काम देगा।
रात्रि को सावधानी से ‘सोऽहम्’ जपते-जपते सो जाएं। सुबह जगें तो जो श्वास चल रहा है उसमें ‘सोऽहम्’ को देखें। श्वास अंदर जाता है तो ‘सोऽऽऽ’, बाहर आता है तो ‘हम्...’। इस प्रकार जप सदा चलता ही रहता है, केवल हम भूल गये। अभ्यास करो तो यह भूल हटे। चौबीसों घंटे यह जीव ‘अजपा जप’ करता रहता है। उसको यह पता चल जाय तो निहाल हो जाय।
मानसिक जप सतत चलने लगा तो प्रो. तीर्थराम में से स्वामी रामतीर्थ हो गये। सबसे उत्तम, सभी लोग कर सकें ऐसी सरल साधना है- मंत्रजप, भगवन्नाम-जप। जपते-जपते ऐसी आदत पड़ जाय कि होंठ हिलें नहीं, जीभ चले नहीं, फिर भी हृदय में जप चलता रहे। मंत्र के अर्थ में मन गमन करता रहे। जप करते-करते उसके अर्थ में ध्यान लगे और मन को स्वाद आ जाय तो फिर उसमें मन लगता रहेगा व परमात्मा तो अपना आत्मा होकर चमचम चमकेगा।
ईश्वर की तरफ से देर नहीं है। हँसते-खेलते ईश्वर का आनंद, ईश्वर का माधुर्य और ईश्वर की प्रेरणा मिलेगी। पैसा कमाना मना नहीं है, औषध खाना मना नहीं है, हास्य करना मना नहीं है। मैं तो कहता हूँ विषाद करना भी मना नहीं है, दुःखी होना मना नहीं है लेकिन दुःख को योग बना दो। विषाद को योग बना दो।
चिपको मत... किसी चीज में चिपको मत। धन में चिपको मत, वह रहेगा नहीं। काम में, क्रोध में, प्रशंसा में, निंदा में चिपको नहीं। ये सब आने-जानेवाले हैं, तुम सदा रहनेवाले हो। शरीर में चिपको नहीं, यह बूढ़ा होनेवाला है, मरनेवाला है। तुम अमर हो इस प्रकार का दृढ़ ज्ञान रखो तो तुम्हारे लिए संसार आनंदवन बन जायेगा, सुखालय हो जायेगा।
वे मनुष्य धनभागी हैं जो आत्मारामी संत-महापुरुषों के सान्निध्य में जाकर सत्संग-श्रवण करके इस प्रकार की जीवनोपयोगी कुंजियां पा लेते हैं और उनका अभ्यास करके अपने जीवन को रसमय बना लेते हैं। इससे उनके जीवन में लौकिक उन्नति तो होती ही है, साथ-साथ आध्यात्मिक उन्नति भी होती है। वे देर-सवेर अपने साक्षीस्वरूप परब्रह्म-परमात्मा का साक्षात्कार कर लेते हैं, अपने ‘सोऽहम्’ स्वभाव में जग जाते हैं।
साभारः ‘ऋषि प्रसाद’ विभाग, संत श्री आशारामजी आश्रम
संत श्री आशारामजी बापू परिचय
संत श्री आशारामजी बापूजी न केवल भारत को अपितु सम्पूर्ण विश्व को अपनी अमृतमयी वाणी से तृप्त कर रहे हैं। संत श्री आसारामजी बापू का जन्म सिंध प्रान्त के नवाबशाह ज़िले में बेराणी गाँव में नगर सेठ श्री थाऊमलजी सिरुमलानी के घर 17 अप्रैल 1941 को हुआ। देश-विदेश में इनके 410 से भी अधिक आश्रम व 1400 से भी अधिक श्री योग वेदांत सेवा समितियाँ लोक-कल्याण के सेवाकार्यों में संलग्न हैं।
गरीब-पिछड़ों के लिए ‘भजन करो, भोजन करो, रोजी पाओ’ जैसी योजनाएं, निःशुल्क चिकित्सा शिविर, गौशालाएं, निःशुल्क सत्साहित्य वितरण, नशामुक्ति अभियान आदि सत्प्रवृत्तियां भी आश्रम व समितियों द्वारा चलायी जाती है। आशा राम बापू जी भक्तियोग, कर्मयोग व ज्ञानयोग की शिक्षा से सभी को स्वधर्म में रहते हुए सर्वांगीण विकास की कला सिखाते हैं।
अपने ‘सोऽहम्’ स्वरूप में टिकने की साधना मोक्ष की साधना है, दुःखों की आत्यंतिक निवृत्ति और परमानंदप्राप्ति की साधना है, ईश्वरप्राप्ति की साधना है। श्वास अंदर जाता है उसमें मिला दो ‘सोऽऽऽ’ और बाहर आता है उसमें मिला दो ‘हम्’ और भावना करो: ‘जिसकी सत्ता से आँख देखती है, वह चैतन्य मैं हूँ। जिसकी सत्ता से हाथ उठते हैं, वह चैतन्य मैं हूँ। मरने के बाद भी जो रहता है, वह मैं हूँ।
मैं शांत आत्मा हूँ, चैतन्य आत्मा हूँ, सुखस्वरूप हूँ, अमर हूँ, ईश्वर का अविभाज्य अंश हूँ। जिस ‘सोऽहम्’ स्वभाव में गोता लगाकर मेरे गुरुजी शांत, आनंदित और समर्थ हुए, उसी में गोता लगाकर मैं शांतात्मा हो रहा हूँ। मैं अपने गुरुस्वभाव से, गुरुदेव से मिल रहा हूँ। सोऽहम्, चैतन्योऽहम्, शाश्वतोऽहम्, इष्टसन्तानोऽहम्, सोऽहम्... अब हम दुर्जनों से दबेंगे नहीं।
सद्गुरु और परमात्मा को दूर नहीं मानेंगे, पराया नहीं मानेंगे। सोऽहम्...’ यह मोक्ष की कुंजी है; ‘मास्टर की’ है मोक्ष की, दुःखों को भगाने की। रोगों को मिटाने में भी यह आनंदरस काम देगा।
रात्रि को सावधानी से ‘सोऽहम्’ जपते-जपते सो जाएं। सुबह जगें तो जो श्वास चल रहा है उसमें ‘सोऽहम्’ को देखें। श्वास अंदर जाता है तो ‘सोऽऽऽ’, बाहर आता है तो ‘हम्...’। इस प्रकार जप सदा चलता ही रहता है, केवल हम भूल गये। अभ्यास करो तो यह भूल हटे। चौबीसों घंटे यह जीव ‘अजपा जप’ करता रहता है। उसको यह पता चल जाय तो निहाल हो जाय।
मानसिक जप सतत चलने लगा तो प्रो. तीर्थराम में से स्वामी रामतीर्थ हो गये। सबसे उत्तम, सभी लोग कर सकें ऐसी सरल साधना है- मंत्रजप, भगवन्नाम-जप। जपते-जपते ऐसी आदत पड़ जाय कि होंठ हिलें नहीं, जीभ चले नहीं, फिर भी हृदय में जप चलता रहे। मंत्र के अर्थ में मन गमन करता रहे। जप करते-करते उसके अर्थ में ध्यान लगे और मन को स्वाद आ जाय तो फिर उसमें मन लगता रहेगा व परमात्मा तो अपना आत्मा होकर चमचम चमकेगा।
ईश्वर की तरफ से देर नहीं है। हँसते-खेलते ईश्वर का आनंद, ईश्वर का माधुर्य और ईश्वर की प्रेरणा मिलेगी। पैसा कमाना मना नहीं है, औषध खाना मना नहीं है, हास्य करना मना नहीं है। मैं तो कहता हूँ विषाद करना भी मना नहीं है, दुःखी होना मना नहीं है लेकिन दुःख को योग बना दो। विषाद को योग बना दो।
चिपको मत... किसी चीज में चिपको मत। धन में चिपको मत, वह रहेगा नहीं। काम में, क्रोध में, प्रशंसा में, निंदा में चिपको नहीं। ये सब आने-जानेवाले हैं, तुम सदा रहनेवाले हो। शरीर में चिपको नहीं, यह बूढ़ा होनेवाला है, मरनेवाला है। तुम अमर हो इस प्रकार का दृढ़ ज्ञान रखो तो तुम्हारे लिए संसार आनंदवन बन जायेगा, सुखालय हो जायेगा।
वे मनुष्य धनभागी हैं जो आत्मारामी संत-महापुरुषों के सान्निध्य में जाकर सत्संग-श्रवण करके इस प्रकार की जीवनोपयोगी कुंजियां पा लेते हैं और उनका अभ्यास करके अपने जीवन को रसमय बना लेते हैं। इससे उनके जीवन में लौकिक उन्नति तो होती ही है, साथ-साथ आध्यात्मिक उन्नति भी होती है। वे देर-सवेर अपने साक्षीस्वरूप परब्रह्म-परमात्मा का साक्षात्कार कर लेते हैं, अपने ‘सोऽहम्’ स्वभाव में जग जाते हैं।
साभारः ‘ऋषि प्रसाद’ विभाग, संत श्री आशारामजी आश्रम
संत श्री आशारामजी बापू परिचय
संत श्री आशारामजी बापूजी न केवल भारत को अपितु सम्पूर्ण विश्व को अपनी अमृतमयी वाणी से तृप्त कर रहे हैं। संत श्री आसारामजी बापू का जन्म सिंध प्रान्त के नवाबशाह ज़िले में बेराणी गाँव में नगर सेठ श्री थाऊमलजी सिरुमलानी के घर 17 अप्रैल 1941 को हुआ। देश-विदेश में इनके 410 से भी अधिक आश्रम व 1400 से भी अधिक श्री योग वेदांत सेवा समितियाँ लोक-कल्याण के सेवाकार्यों में संलग्न हैं।
गरीब-पिछड़ों के लिए ‘भजन करो, भोजन करो, रोजी पाओ’ जैसी योजनाएं, निःशुल्क चिकित्सा शिविर, गौशालाएं, निःशुल्क सत्साहित्य वितरण, नशामुक्ति अभियान आदि सत्प्रवृत्तियां भी आश्रम व समितियों द्वारा चलायी जाती है। आशा राम बापू जी भक्तियोग, कर्मयोग व ज्ञानयोग की शिक्षा से सभी को स्वधर्म में रहते हुए सर्वांगीण विकास की कला सिखाते हैं।