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जीवन का अर्थ बताती है अर्थी
राकेश/इंटरनेट डेस्क।
Updated Tue, 25 Dec 2012 11:30 AM IST
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जीवन भर व्यक्ति इसी सोच में उलझा रहता है कि
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उसका परिवार है, बीबी बच्चे हैं। इनके लिए धन जुटाने और सुख-सुविधाओं के इंतजाम में
हर वह काम करने के लिए तैयार रहता है जिससे अधिक से अधिक धन और वैभव अर्जित कर सके।
अपने स्वार्थ के लिए व्यक्ति दूसरों को नुकसान पहुंचाने के लिए भी तैयार रहता है।
जबकि हर व्यक्ति के शरीर में आत्मा रूप में बसा ईश्वर गलत तरीके से, दूसरों को अहित
पहुंचाकर लाभ पाने के लिए मना करता है।
लेकिन जब व्यक्ति आत्मा की बात नहीं सुनता है तो आत्मा मौन धारण कर लेती है। आत्मा को उस दिन का इंतजार रहता है जब व्यक्ति अर्थी पर पहुंचता है। इस समय व्यक्ति को जीवन का अर्थ और आत्मा की कही बातें याद आती है। लेकिन इस समय पश्चाताप के अलावा कुछ और नहीं बचता है। सब कुछ मिट्टी में मिल चुका होता है।
आपने मृत व्यक्ति को बांस की फट्ठियों पर लेकर जाते हुए कभी न कभी जरूर देखा होगा। बांस की फट्ठियों पर जिस पर शव को लिटाया जाता है इसे अर्थी कहते हैं। अर्थी को उठाने के लिए चार कंधों की जरूरत पड़ती है। जब व्यक्ति की अर्थी उठायी जाती है उस समय आत्मा मृत व्यक्ति से कहती है देखो, तुम्हारी यही औकात है।
तुम्हें खुद सहारे की जरूरत है, तुम झूठा अहंकार करते रहे कि तुम लोगों को आश्रय दे रहे हो। जिन लोगों के लिए तुम दिन रात धन-वैभव जुटाने में लगे रहे। आज वह संगी साथी परिवार तुम्हें विराने में ले जाकर अग्नि में समर्पित कर देगा। जीवन का मात्र यही अर्थ है। इसलिए अर्थी को जीवन का अर्थ बताने वाला कहा गया है।
अर्थी ले जाते समय लोग जोर-जोर से नारे लगाते हैं 'राम नाम सत्य है, सब की यही गत्य है।' नारे लगाने वाले लोग मृत व्यक्ति को और दुनियां को यह बताता है कि वास्तविक सत्य 'राम का नाम है। अंत में सभी की यही गति होनी है।' इसलिए प्रभु का नाम भजते हुए ईमानदारी और सहृदयता के साथ जीवन जीना चाहिए।
जरूरतमंदों की सहायता से कभी पीछे नहीं हटना चाहिए। गीता के ग्यारहवें अध्याय का महात्म्य बताते हुए भगवान शिव ने कहा है कि जो व्यक्ति जरूरत के समय व्यक्ति से नज़र फेर लेता है वह नीच योनियों में जन्म लेता है। जरूरत के समय दूसरों की सहायता करने वाला व्यक्ति कई पापों से मुक्त हो जाता है। इसलिए व्यक्ति को परमार्थी होना चाहिए। मनुष्य का जन्म ही इस उद्देश्य के लिए हुआ। जो व्यक्ति इस अर्थ को नहीं समझता उसे अर्थी पर जाकर ही जीवन का अर्थ ज्ञात होता है।
लेकिन जब व्यक्ति आत्मा की बात नहीं सुनता है तो आत्मा मौन धारण कर लेती है। आत्मा को उस दिन का इंतजार रहता है जब व्यक्ति अर्थी पर पहुंचता है। इस समय व्यक्ति को जीवन का अर्थ और आत्मा की कही बातें याद आती है। लेकिन इस समय पश्चाताप के अलावा कुछ और नहीं बचता है। सब कुछ मिट्टी में मिल चुका होता है।
आपने मृत व्यक्ति को बांस की फट्ठियों पर लेकर जाते हुए कभी न कभी जरूर देखा होगा। बांस की फट्ठियों पर जिस पर शव को लिटाया जाता है इसे अर्थी कहते हैं। अर्थी को उठाने के लिए चार कंधों की जरूरत पड़ती है। जब व्यक्ति की अर्थी उठायी जाती है उस समय आत्मा मृत व्यक्ति से कहती है देखो, तुम्हारी यही औकात है।
तुम्हें खुद सहारे की जरूरत है, तुम झूठा अहंकार करते रहे कि तुम लोगों को आश्रय दे रहे हो। जिन लोगों के लिए तुम दिन रात धन-वैभव जुटाने में लगे रहे। आज वह संगी साथी परिवार तुम्हें विराने में ले जाकर अग्नि में समर्पित कर देगा। जीवन का मात्र यही अर्थ है। इसलिए अर्थी को जीवन का अर्थ बताने वाला कहा गया है।
अर्थी ले जाते समय लोग जोर-जोर से नारे लगाते हैं 'राम नाम सत्य है, सब की यही गत्य है।' नारे लगाने वाले लोग मृत व्यक्ति को और दुनियां को यह बताता है कि वास्तविक सत्य 'राम का नाम है। अंत में सभी की यही गति होनी है।' इसलिए प्रभु का नाम भजते हुए ईमानदारी और सहृदयता के साथ जीवन जीना चाहिए।
जरूरतमंदों की सहायता से कभी पीछे नहीं हटना चाहिए। गीता के ग्यारहवें अध्याय का महात्म्य बताते हुए भगवान शिव ने कहा है कि जो व्यक्ति जरूरत के समय व्यक्ति से नज़र फेर लेता है वह नीच योनियों में जन्म लेता है। जरूरत के समय दूसरों की सहायता करने वाला व्यक्ति कई पापों से मुक्त हो जाता है। इसलिए व्यक्ति को परमार्थी होना चाहिए। मनुष्य का जन्म ही इस उद्देश्य के लिए हुआ। जो व्यक्ति इस अर्थ को नहीं समझता उसे अर्थी पर जाकर ही जीवन का अर्थ ज्ञात होता है।