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भगवान को उलाहना दिया करो: आशाराम बापू

Sun, 21 Apr 2013 07:12 PM IST
नई दिल्ली/ इन्टरनेट डेस्क
नई दिल्ली/ इन्टरनेट डेस्क Updated Sun, 21 Apr 2013 07:12 PM IST
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asharam bapu pravachan

'विष्णुसहस्रनाम' के 64वें श्लोक में भगवान का एक नाम दिया गया है 'अविज्ञाता' अर्थात् अनजान। भगवान सबके आत्मा बनकर बैठे हैं तो सब कुछ जानते हैं लेकिन बड़े अनजान भी हैं। कैसे ? इसकी व्याख्या करते हुए भक्तजन बोलते हैं कि 'भक्तों के दोष देखने में भगवान अनजान हैं।'

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भक्तों ने जो व्याख्या की है हम उसका विरोध नहीं करते, उनको धन्यवाद देते हैं लेकिन मेरी व्याख्या भी उसमें जोड़ दो कि 'भक्त का, मनुष्य का, प्राणियों का अहित करने में भगवान अनजान हैं। जैसे माँ बच्चे का अहित नहीं कर सकती, ऐसे ही भगवान हमारा अहित नहीं कर सकते।
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भक्त के दोष देखने में भगवान अनजान रहेंगे तो उसके दोष निकलेंगे कैसे? वह निर्दोष कैसे बनेगा? किसीका अमंगल करने का ज्ञान भगवान में नहीं है, दण्ड देंगे तो भी मंगल के लिए। जैसे- माँ चपत लगायेगी तो भी मंगल के लिए और मिठाई खिलायेगी तो भी मंगल के लिए।
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भगवान को उलाहना दिया करो, उनसे छेड़खानी कर लिया करो कि 'महाराज! हम चाहे अज्ञानी हैं, अनजान हैं लेकिन आप भी अनजान हैं। हमारा अहित करने में आप अनजान हैं। है क्या ताकत आपमें हमारा अहित करने की, बोलो?' ऐसे आप भगवान को भी चुनौती (चैलेंज) दिया करो। भगवान वहाँ हार जायेंगे।

जैसे- एक बच्चे ने माँ को चुनौती दी कि "माँ ! तू हमारा अमंगल नहीं कर सकती। हिम्मत है तो करके दिखा।" तो माँ बोली: "इधर आ दिखाती हूँ!" बच्चा बोला: "कुछ भी हो माँ ! तू अमंगल नहीं कर सकती।" माँ बोली: "अरे नटखट ! इधर आ तेरे को दिखाती हूँ। "ऐसा करके कान पकड़कर धीरे-से तमाचा लगाया। बोली: "देख, मैंने तेरे को ठीक कर दिया न! "बच्चा बोला: "हाँ, अहंकार से हम बेठीक हो गये थे, आपने तमाचा मारकर ठीक ही तो किया माँ ! अमंगल तो नहीं किया! मैया रे मैया... प्रभु रे प्रभु... हा हा हा...!"

ऐसे ही ठाकुरजी जो भी करेंगे हमारे हित के लिए ही करेंगे। भगवान किसी का अमंगल नहीं कर सकते। जैसे- हम हमारे शरीर के किसी अंग का अमंगल नहीं करेंगे, चाहे उसको कटवा दें फिर भी अमंगल नहीं करेंगे, भलाई के लिए थोड़ा हिस्सा कटवायेंगे। भगवान कहते हैं:

सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति।
'मेरा भक्त मुझको सम्पूर्ण भूत-प्राणियों का सुहृद अर्थात् स्वार्थरहित दयालु और प्रेमी, ऐसा तत्त्व से जानकर शांति को प्राप्त होता है।'
(गीता : 5.29)

एक बार नारायण बापू (पूज्य बापूजी के मित्र संत) किसी बात पर आ गये तो मैं खूब हँसा। उन्होंने थोड़ा दम मारा तो मैं और हँसा। बोले:"क्यों हँसते हो" मैं बोला: "तुम्हारी ताकत नहीं है... ! " महाराज पहुँचे हुए थे, अदृश्य होने की सिद्धियाँ थीं उनके पास और जो भी संकल्प करते थे सफल होता था, यह भी मैं जानता था। नल गुफा में हमारे साथ रहते थे।

सिद्धपुरुष थे लेकिन उनको मैंने दम मार दिया। मैंने कहाः "आपकी ताकत नहीं है... ! "तो मेरी ओर देखने लगे। वे जानते थे कि मैं उनकी ताकत को जानता हूँ। मैंने कहा: "आप अहित कर ही नहीं सकते। "फिर वे हँसने लगे। ऐसे आप भी कभी-कभी भगवान को चुनौती दिया करो कि 'महाराज! आप हमारा अमंगल करने में अनजान हैं, आपकी ताकत नहीं कि हमारा बुरा कर सको।
साधु ते होइ न कारज हानी।
(श्री रामचरित. सुं.कां. : 5.2)
आपके साधु भी हमारे कार्य की हानि नहीं कर सकते तो आप क्या कर सकते हो? आप तो संतों के संत हैं। प्रभु! आप हमारा अहित कैसे कर सकते हो।

साभारः ‘ऋषि प्रसाद’ विभाग, संत श्री आशारामजी आश्रम
संत श्री आशारामजी बापू परिचय
संत श्री आशारामजी बापूजी न केवल भारत को अपितु सम्पूर्ण विश्व को अपनी अमृतमयी वाणी से तृप्त कर रहे हैं। संत श्री आसारामजी बापू का जन्म सिंध प्रान्त के नवाबशाह ज़िले में बेराणी गाँव में नगर सेठ श्री थाऊमलजी सिरुमलानी के घर 17 अप्रैल 1941 को हुआ। देश-विदेश में इनके 410 से भी अधिक आश्रम व 1400 से भी अधिक श्री योग वेदांत सेवा समितियाँ लोक-कल्याण के सेवाकार्यों में संलग्न हैं।


गरीब-पिछड़ों के लिए ‘भजन करो, भोजन करो, रोजी पाओ’ जैसी योजनाएं, निःशुल्क चिकित्सा शिविर, गौशालाएं, निःशुल्क सत्साहित्य वितरण, नशामुक्ति अभियान आदि सत्प्रवृत्तियां भी आश्रम व समितियों द्वारा चलायी जाती है। आशा राम बापू जी भक्तियोग, कर्मयोग व ज्ञानयोग की शिक्षा से सभी को स्वधर्म में रहते हुए सर्वांगीण विकास की कला सिखाते हैं।


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