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घर से जाओ खाके, तो बाहर मिले पकाके: आशाराम बापू

Sat, 16 Mar 2013 10:48 AM IST
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क।
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क। Updated Sat, 16 Mar 2013 10:48 AM IST
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asharam bapu pravachan

अंतर्यामी ईश्वर की शरण लेने से मनुष्य का अवश्य कल्याण होता है। उसके सहारे सब कार्य करने से मानव कार्य के बोझ से मुक्त हो जाता है। क्रिया का भार अपने ऊपर लेने से अहंकार की उत्पत्ति होती है, काम बिगड़ जाते हैं। जो सबसे बड़ा सहारा और पालनहार है, उस चैतन्य स्वरूप परमात्मा की शरण में जाने से किसी का सहारा नहीं लेना पड़ता।

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हर व्यक्ति अपने से किसी-न-किसी ऊँचे की शरण जाता है। बेल (लता) भी वृक्ष की शरण जाती है, तब ऊपर उठती है। अनपढ़ पठित की शरण जाता है तो विद्वान बनता है। हारा हुआ व्यक्ति हिम्मतवाले की शरण जाता है तो जीतता है। सब किसी-न-किसी का सहारा लेते ही हैं। छोटा नेता बड़े नेता के आगे-पीछे घूमता है और बड़ा नेता भी किसी और बड़े नेता के आगे-पीछे घूमता है और वह बड़ा नेता संत या देवी-देवता की शरण लेता है, फिर चाहे किसी महापुरुष की कृपा की शरण ले या भगवान की कृपा की शरण ले। जब शरण लेनी ही है तो भाई! आप सीधे परमात्मा की शरण दिलानेवाली भगवद्-साधना कर लो, ताकि इधर-उधर की शरण लेने की जरूरत न पड़े।
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कबीरा इह जग आयके बहुत से कीन्हे मीत।
जिन दिल बाँधा एक से वे सोये निश्चिंत॥
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बहुतों की शरण ली, बहुतों से मित्रता की कि ‘यह काम आयेगा, वह काम आयेगा, यह सेठ काम में आएगा, यह नेता काम में आएगा, यह फलाना भाई काम में आयेगा...’ ठीक है लेकिन आपका आत्मचैतन्य होगा तभी तो आप चल-फिर सकोगे और दूसरों के काम आओगे। जो सतत आपके काम आ रहा है, उसका पता सद्गुरु के सत्संग से पा लो, दीक्षा के द्वारा उससे नाता जोड़ लो तभी दूसरे कोई काम आएंगे। अगर उस चैतन्यस्वरूप परमात्मा से संबंध नहीं तो दूसरे कब तक काम आएंगे?

घर से जाओ भूखे तो बाहर मिलें धक्के।
घर से जाओ खाके तो बाहर मिले पकाके॥

इसलिए रोज सुबह आप गुरुमंत्र जपते हुए सात्त्विक श्रद्धापूर्वक अपने हृदय को भगवद्रस से भरो, भगवद्ध्यान से भरो, सत्संग की कोई पुस्तक पढ़कर या तो कैसेट, सीडी सुनकर सत्संग के पवित्र विचारों से भरो, परमेश्वरीय आनंद से भर दो। आप तृप्त होकर फिर व्यवहार करिये, भूखे पेट कब तक मजदूरी करेंगे? इतना तो मजदूर भी जानता है कि भले गरीबी है, फिर भी काम पर जाना है तो कुछ रोटी खाकर जाऊँ। ऐसे ही आपको भी जब बाहर किसी से मिलना है तो अंदर की एक-दो प्याली पीकर फिर जाइये। वह प्याली बोतल की नहीं; भगवद्ध्यान की, भगवद्-सत्संग की, भगवन्नाम-जप की, भगवद्-स्मृति की प्याली पीजिये।

जाम पर जाम पीने से क्या फायदा?
रात बीती सुबह को अभागी अल्कोहल उतर जायेगी।
तू हरिनाम की प्यालियाँ पिया कर,
तेरी सारी जिंदगी सुधर जायेगी, सुधर जायेगी॥
साभारः ‘ऋषि प्रसाद’ विभाग, संत श्री आशारामजी आश्रम

संत श्री आशारामजी बापू परिचय
संत श्री आशारामजी बापूजी न केवल भारत को अपितु सम्पूर्ण विश्व को अपनी अमृतमयी वाणी से तृप्त कर रहे हैं। संत श्री आसारामजी बापू का जन्म सिंध प्रान्त के नवाबशाह ज़िले में बेराणी गाँव में नगर सेठ श्री थाऊमलजी सिरुमलानी के घर 17 अप्रैल 1941 को हुआ। देश-विदेश में इनके 410 से भी अधिक आश्रम व 1400 से भी अधिक श्री योग वेदांत सेवा समितियाँ लोक-कल्याण के सेवाकार्यों में संलग्न हैं।

गरीब-पिछड़ों के लिए ‘भजन करो, भोजन करो, रोजी पाओ’ जैसी योजनाएं, निःशुल्क चिकित्सा शिविर, गौशालाएं, निःशुल्क सत्साहित्य वितरण, नशामुक्ति अभियान आदि सत्प्रवृत्तियां भी आश्रम व समितियों द्वारा चलायी जाती है। आशा राम बापू जी भक्तियोग, कर्मयोग व ज्ञानयोग की शिक्षा से सभी को स्वधर्म में रहते हुए सर्वांगीण विकास की कला सिखाते हैं।

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