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जैसी होगी भावना वैसा ही फल मिलेगाः आशाराम बापू

Sat, 30 Mar 2013 12:29 PM IST
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क।
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क। Updated Sat, 30 Mar 2013 12:29 PM IST
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asharam bapu emotion affects result

आप भगवान का स्मरण करोगे तो भगवान आपका स्मरण करेंगे क्योंकि वे चैतन्य स्वरूप हैं। आप पैसों का, बँगले का स्मरण करोगे तो जड़ पैसों को, जड़ बँगले को तो पता नहीं है कि आप उनका स्मरण कर रहे हो।

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आप गाड़ी का स्मरण करोगे तो वह अपने-आप नहीं मिलेगी लेकिन भगवान का स्मरण करोगे तो वे स्वयं आकर मिलेंगे।

शबरी ने भगवान का स्मरण किया तो वे पूछते-पूछते शबरी के द्वार पर आ गये। भावग्राही जनार्दनः... मीरा ने स्मरण किया तो जहर अमृत हो गया।

वह हृदयेश्वर आपके भाव के अनुसार किसी भी रूप में कहीं भी मिलने में सक्षम है, अगर सोऽहंस्वरूप में मिलना चाहो तो सोऽहंस्वरूप में भी अपना अनुभव कराने में समर्थ है। केवल अपनी बुद्धि में उसके प्रति भाव होना चाहिए।
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देवी-देवता का, मूर्ति का आदर-पूजन, माता-पिता अथवा गुरु का आदर-पूजन यह हमारी बुद्धि में भगवद्भाव को, भगवद्ज्ञान को, भगवद्रस को प्रकट करने का मार्ग है।

भाव की बड़ी भारी महिमा है। मान लो, एक सुपारी है। एक का उसे खाने का भाव है, दूसरे का उससे कमाने का भाव है, तीसरे का उसे पूजने का भाव है।

तो फायदा ज्यादा किसने लिया? खाने वाले ने, कमाने वाले ने कि पूजने वाले ने? सुपारी तो जड़ है, प्रकृति की चीज है, उसमें भगवद्बुद्धि करने से भगवद्भाव पैदा होता है और खाने की भावना करते हैं तो तुच्छ लाभ होता है।
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बेचकर कमाने की भावना करते हैं तो ज्यादा लाभ होता है लेकिन उसमें गणेशजी का भाव करके पूजा करते हैं तो और ज्यादा लाभ होता है।

सुपारी तो वही-की-वही है परंतु खाना है तो भोग, कमाना है तो लोभ और पूज्यभाव, भगवद्भाव है तो भगवद्रस देके भगवान के समीप कर देगी।

अब सुपारी को खा के मजा लो, बेच के मजा लो या उसका पूजन करके मजा लो तुम्हारी मर्जी।

खाके मजा लिया तो भोगी, बेच कर मजा लिया तो लोभी और सुपारी में गणपति-बुद्धि की तो आप उपासक हो गये, भक्त हो गये और सुपारी का तत्त्व जान के अपना तत्त्व और सुपारी का तत्त्व ‘एकमेव अद्वितीयं’ कर दिया तो हो गये ब्रह्म!

ऐसे ही अगर आप गुरु से संसारी फायदा लेते हैं तो यह भोग बुद्धि हुई लेकिन गुरु चिन्मय हैं, दिव्य हैं, ब्रह्मस्वरूप हैं, ज्ञानस्वरूप हैं, तारणहार हैं, व्यापक हैं, सबके अंतरात्मा, भूतात्म स्वरूप हैं, प्राणि मात्र के हितैषी हैं, सुहृद हैं- ऐसा अहोभाव करते हैं और उनके वचनों में विश्वास करते हैं, उनके अनुसार चलते हैं तो कितना फायदा होता है!

आप सुपारी में गणपति का भाव करो तो आपके अपने भाव के अनुसार अंतःकरण की वृत्ति बनेगी लेकिन गुरु के प्रति भगवद्भाव, ब्रह्मभाव, अहोभाव करोगे तो गुरुदेव के अंतःकरण से भी आपके उद्धार के लिए शुभ संकल्प की, विशेष कृपा की वर्षा होने लगेगी, उनके द्वारा ऊँचा सत्संग मिलेगा, आनंद-आनंद हो जायेगा।

सुपारी वही-की-वही लेकिन नजरिया बदलने से लाभ बदल जाता है। गुरु वही-के-वही लेकिन नजरिया बदलने से लाभ बदल जाता है। कर्मों में भी अलग-अलग भाव अलग-अलग फल देते हैं।

जहाँ राग से, द्वेष से सोचा जाता है, वहाँ कर्म बंधन कारक हो जाता है। जहाँ करने का राग मिटाने के लिए सबकी भलाई के, हित के भाव से सोचा और किया जाता है, वहाँ कर्म बंधन से छुड़ाने वाला हो जाता है।

जैसे कोई दुष्ट है, धर्म का, संस्कृति का, मानवता का हनन कर-करके अपना कर्म बंधन बढ़ाने वाले दुष्कर्म में लिप्त है और न्यायाधीश उसकी भलाई के भाव से उसे फाँसी देता है तो न्यायाधीश को पुण्य होता है।

‘हे प्रभुजी! अब इस शरीर में यह सुधरेगा नहीं, इसलिए मैं इसे फाँसी दे दूँ यह आपकी सेवा है’- इस भाव से अगर न्यायाधीश फाँसी देता है तो उसका अंतःकरण ऊँचा हो जायेगा लेकिन ‘यह फलाने पक्ष का है, अपने पक्ष का नहीं है... इसलिए फाँसी दे दो’ - ऐसा भाव है तो फिर न्यायाधीश का फाँसी देना अथवा सजा देना बंधन हो जायेगा।

आपके कर्मों में हित की भावना है, समता है तो आपके कर्म आपको बंधनों से मुक्त करते जाएंगे। अगर स्वार्थ, अधिकार और सत्ता पाने की या द्वेष की भावना है तो आपके कर्म आपको बाँधते जाएंगे।

अपने शुद्ध कर्म से किसी को लाभ मिलता है तो संसार की आसक्ति मिटती है, दूसरे की भलाई का, हृदय की उदारता का आनंद आता है लेकिन दूसरे का हक छीना तो संसार की आसक्ति और कर्मबंधन बढ़ता है।

आप जैसा देते हैं, वैसा ही आपको वापस मिल जाता है। आप जो भी दो, जिसे भी दो भगवद्भाव से, प्रेम से और श्रद्धा से दो।

हर कार्य को ईश्वर का कार्य समझकर प्रेम से करो, सब में परमेश्वर के दर्शन करो तो आपका हर कार्य भगवान का भजन हो जायेगा।

साभारः ‘ऋषि प्रसाद’ विभाग, संत श्री आशारामजी आश्रम
संत श्री आशारामजी बापू परिचय
संत श्री आशारामजी बापूजी न केवल भारत को अपितु सम्पूर्ण विश्व को अपनी अमृतमयी वाणी से तृप्त कर रहे हैं। संत श्री आसारामजी बापू का जन्म सिंध प्रान्त के नवाबशाह ज़िले में बेराणी गाँव में नगर सेठ श्री थाऊमलजी सिरुमलानी के घर 17 अप्रैल 1941 को हुआ। देश-विदेश में इनके 410 से भी अधिक आश्रम व 1400 से भी अधिक श्री योग वेदांत सेवा समितियाँ लोक-कल्याण के सेवाकार्यों में संलग्न हैं।


गरीब-पिछड़ों के लिए ‘भजन करो, भोजन करो, रोजी पाओ’ जैसी योजनाएं, निःशुल्क चिकित्सा शिविर, गौशालाएं, निःशुल्क सत्साहित्य वितरण, नशामुक्ति अभियान आदि सत्प्रवृत्तियां भी आश्रम व समितियों द्वारा चलायी जाती है। आशा राम बापू जी भक्तियोग, कर्मयोग व ज्ञानयोग की शिक्षा से सभी को स्वधर्म में रहते हुए सर्वांगीण विकास की कला सिखाते हैं।

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