क्यों चढ़ाया जाता है शनि देव को तेल, जानें इससे जुड़ी पौराणिक कथा
शनि को न्याय का देवता कहा जाता है। वे सभी को उनके कर्मों के अनुसार फल प्रदान करते हैं। शनिदेव की वक्रदृष्टि से मनुष्य के साथ देवता भी भयभीत हो जाते हैं। अन्य ग्रहों की तरह शनि भी एक राशि से दूसरी राशि में भ्रमण करते हैं, परंतु मंद गति के कारण ये अपना एक चक्र ढाई वर्ष में पूर्ण करते हैं। शनि की साढ़ेसाती या ढैय्या से बचने और शनिदेव को प्रसन्न करने के लिए भी तेल से अभिषेक किया जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि शनिदेव को तेल चढ़ाने से वे प्रसन्न क्यों होते हैं। इसके पीछे दो पौराणिक कथाएं मिलती हैं लेकिन दोनों ही कथाएं हनुमान जी से जुड़ी हुई हैं। चलिए जानते हैं...
कथा के अनुसार शनिदेव को भी एक बार अपने पराक्रम और बल पर अभिमान हो गया था। वह रामायण काल का समय था। हनुमान जी के बल और यश की कीर्ति चारों ओर फैली थी। शनि को जब इस बारे में ज्ञात हुआ तो उन्होंने हनुमान जी को युद्ध के लिए ललकारा परंतु हनुमान जी उस समय प्रभु श्री राम की भक्ति में लीन थे। इसलिए उन्होंने युद्ध करने से इंकार कर दिया पर शनिदेव के बार-बार ललकारने पर अंततः दोनों के बीच घमासान युद्ध हुआ। लेकिन शनिदेव युद्ध में पराजित हो गए। युद्ध में हनुमान जी द्वारा किए गए प्रहारों के कारण शनिदेव को तीव्र पीड़ा हो रही थी। तब हनुमान जी से उन्हें तेल लगाने को दिया जिससे उनकी पीड़ा शांत हो गई। कहते हैं कि तभी से शनिदेव को तेल अर्पित करने से वे प्रसन्न होते हैं।
इस संबंध में एक और कथा मिलती है जिसके अनुसार जब भगवान श्री राम की सेना ने सागर पर सेतु बना लिया। तब उसे कोई राक्षस हानि न पहुंचाए इसलिए राम जी ने सेतु की देखभाल की जिम्मेदारी पवनसुत हनुमान को सौंपी। उस समय हनुमान जी राम जी का ध्यान कर रहे थे। तभी वहां पर शनि देव ने हनुमान जी के बल को ललकारते हुए उनसे युद्ध करने को कहा। हनुमान जी ने विनम्रता पूर्वक कहा कि मैं इस समय अपने प्रभु का ध्यान कर रहा हूं कृप्या विघ्न मत उत्पन्न कीजिए। अतः आप यहां से चले जाइए। परंतु शनि देव की हठ के कारण हनुमान जी ने उन्हें अपनी पूंछ में लेपट कर कस दिया और सेतु के पत्थरों पर पूंछ को पटकना आरंभ कर दिया जिसके कारण शनिदेव का शरीर लहुलूहान हो गया और उन्हें पीड़ा होने लगी। तब शनिदेव ने हनुमान जी से बंधन मुक्त करने की प्रार्थनी की। हनुमान जी ने उनकी पीड़ा को दूर करने के लिए तेल दिया। जिससे उनके घावों की पीड़ा शांत हो गई।