मंदिर के तालाब या नदी में आखिर सिक्के क्यों फेंकते हैं लोग?
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दिल्ली का अक्षर धाम मंदिर हो या गंगा घाट। आपने देखा होगा कि लोग मंदिर प्रांगण में बने जलाशय में सिक्के फेंकते हैं। गंगा नदी में भी श्रद्घालु स्नान करने के बाद पैसे फेंकते हैं। बहुत से ऐसे लोग हैं जो इस तरह पानी में पैसा फेंकने वाले को अंधविश्वासी समझते हैं।
जबकि पानी में सिक्का फेंकने वालों का मानना है कि ऐसा करने से उनके जीवन में चल रहा नकारात्मक प्रभाव दूर होता है। ईश्वर की कृपा प्राप्त होती है और जीवन में खुशहाली आती है।
ऐसे में प्रश्न उठता है कि सही किसे माना जाए, वह जो पानी में सिक्का फेंकना अंधविश्वास मानते हैं या उन्हें जो इसे ईश्वर की कृपा पाने का साधन मानते हैं।
इसलिए पानी में फेंकते हैं सिक्के
जबकि वैज्ञानिक दृष्टि यह कहती है कि, पानी में सिक्का फेंकने की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। उन दिनों तांबे के सिक्के हुआ करते थे। तांबा को शुद्घ धातु माना जाता है इसलिए इनका इस्तेमाल पूजा-पाठ में किया जाता है। तांबा सूर्य का धातु माना जाता है और यह हमारे शरीर के लिए भी आवश्यक तत्व है।
तांबे का सिक्का पानी में फेंककर हम सूर्य देव और अपने पितरों को यह बताते हैं कि हे देव और हे पितर हमने जल के माध्यम से अपने शरीर की रक्षा योग्य तांबा ग्रहण कर लिया है। हमें यह आपके माध्यम से प्राप्त हुआ है इसलिए आभार स्वरुप आप भी जल के माध्यम से तांबा ग्रहण करें।
लाल किताब में भी सूर्य और पितरों को प्रसन्न करने के लिए तांबे को बहते जल में प्रवाहित करने का विधान बताया गया है। हालांकि अब तांबे के सिक्के नहीं होते हैं। स्टेनलेस स्टील के सिक्कों को उसी परंपरा के तौर पर अब लोग में पानी में फेंकते हैं।