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नहीं जानते होंगे, आखिर लोग भंडारा क्यों करवाते हैं?

Wed, 19 Nov 2014 03:44 PM IST
राकेश झा/टीम डिजिटल
राकेश झा/टीम डिजिटल Updated Wed, 19 Nov 2014 03:44 PM IST
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why people offering bhandara meaning

आपने देखा होगा कि जागरण हो या कोई भी शुभ अवसर लोग पूजा-पाठ करवाने के बाद अंत में भंडारा करवाते हैं। भंडारे में लोग अपनी श्रद्घा और क्षमता के अनुसार भोजन बांटते हैं।

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अमीर-गरीब हर कोई भंडारे के भोजन को प्रसाद के तौर पर ग्रहण करते हैं। लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि लोग भंडारा क्यों करवाते हैं। आखिर इसके पीछे क्या कारण और उद्देश्य है।
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पं. जयगोविंद शास्त्री बताते हैं कि भंडारे की परंपरा भारत में प्राचीन काल से चली आ रही है। हालांकि अब इसका स्वरुप बदल गया है। प्राचीन काल में यह अन्नदान के रुप में जाना जाता है।
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अन्नदान का उल्लेख शास्त्रों और पुराणों में कई स्थानों पर किया गया है। राजे-महाराजे यज्ञ, हवन और धार्मिक अनुष्ठान करवाते रहते थे। इनमें गरीबों और जरुरतमंदों को भोजन और वस्त्र बांटा करते थे। आज वही परंपरा भंडारे के रुप में विकसित हो गई।

अन्न दान और भंडारे का महत्व

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शास्त्रों में बताय गया है कि संसार में सबसे बड़ा दान अन्न दान है। अन्न से ही यह संसार बना है और अन्न से इसका पालन हो रहा है। अन्न से शरीर और आत्मा दोनों की ही संतुष्टि होती हैं। इसलिए अन्न दान सभी प्रकार के दान से उत्तम है।

पद्मपुराण के सृष्टिखंड में एक कथा का उल्लेख किया गया है। इसमें ब्रह्मा जी और विदर्भ के राजा श्वेत के बीच हुए संवाद से पता चलता है कि जो व्यक्ति अपने जीवन काल में जो भी दान करता उसे वही वस्तु मृत्यु के बाद परलोक में प्राप्त होता है। राजा श्वेत तपस्या के बल पर ब्रह्मलोक पहुंच गए लेकिन अन्न दान नहीं करने के कारण उन्हें भोजन नहीं मिला।

एक अन्य कथा के अनुसार एक बार भगवान शिव पृथ्वी पर पधारे और एक कंजूस विधवा स्त्री से दान मांगा। स्त्री उस समय उपले बना रही थी। उसने कहा की वह अभी अन्न नहीं दे सकती क्योंकि वह उपले बना रही है।

ब्राह्मण ने हठ किया तो स्त्री ने गोबर उठाकर ब्राह्मण को दान दे दिया। मृत्यु के बाद जब वह स्त्री परलोक पहुंची तो उसे भोजन के लिए गोबर मिला। जब स्त्री ने इसका कारण पूछा तो पता चला कि उसने जो दान में गोबर दिया था यह उसी का परिणाम है।

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