जानें बौद्ध धर्म से क्या है योग का सम्बन्ध?
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योग भारतवर्ष में प्राचीनतम विधा है। यह विश्व को भारत की अमूल्य देन है। बौद्ध धर्म का जन्म और विकास भी भारत में ही हुआ। बौद्ध धर्म में साधना विधि का मुख्य रूप से वर्णन किया गया है। योग में भी मोक्ष प्राप्ति के लिए साधना ही मुख्य है। योग और बौद्ध धर्म दोनों ही जन्म-मरण के चक्र की समाप्ति मानते हैं। अतः योग और बौद्ध धर्म दोनों ही सिद्धांतों में समानता है। योग और बौद्ध धर्म दोनों में ही इस बात पर बल दिया है कि मानसिक प्रशिक्षण के लिए शारीरिक एवं स्वास्थ्य संबंधी अवस्थाओं का अनुकूल होना आवश्यक है। इस क्रिया से शरीर को वश में करना और ज्ञान की प्राप्ति के लिए तैयार करना है।
योग के अष्टांग योग की भांति, बौद्ध साधना में भी निर्वाण के लिए अष्टांग मार्ग का वर्णन है, जिसमें यम और नियम का भी समावेश है। बौद्ध साधना का अष्टांगिक मार्ग है, सम्मा-विठ्ठ (सम्यक दृष्टि) अर्थात आर्य-सत्य का ज्ञान। सम्मा-संकल्प (सम्यक संकल्प) अर्थात राग, द्वेष, हिंसा तथा संसारी विषयों के परित्याग के लिए दृढ़ निश्चय। सम्मा-वाचा (सम्यक वाक) अर्थात मिथ्या, अनुचित तथा दुर्वचनों का परित्याग एवं सत्य वचन की रक्षा। सम्मा-कम्पंत (सम्यक कर्मांत) अर्थात हिसां परद्रव्य का अपहरण, वासना-पूर्ति की इच्छा का परित्याग कर अच्छा कर्म करना। सम्मा-आजीव (सम्यक आजीव) अर्थात न्यायपूर्ण जीविका। सम्मा-वायाम (सम्यक व्यायाम) अर्थात बुराई का नाशकर अच्छे कर्म के लिए उद्यत रहना। सम्मा-सति (सम्यक स्मृति) अर्थात लोभ आदि को रोककर चित्तशुद्धि। सम्मा-समाधि (सम्यक समाधि) चित्त की एकाग्रता।
इन आठ अंगों का पालन करना आवश्यक है। इनके पालन से अन्तःकरण की शुद्धि होती है और ज्ञान का उदय होता है। यम और नियम के पश्चात योग में आसन का वर्णन है, जोकि स्थिरतापूर्वक शरीर की किसी स्थ्तिि का नाम है। बौद्ध-साधना में साधक ध्यान आदि के लिए किसी न किसी आसन का प्रयोग करता ही है। स्वयं भगवान बुद्ध की मूर्ति पदमासन में पाई जाती है। जहां तक प्राणायाम का प्रश्न है, तो बुद्ध ने भी ‘आनापान सति’ के रूप में प्राणायाम का उपदेश दिया था।
योग की वैराग्य और अनित्य अशुचि तथा दुःख की भावनाएं बौद्ध विपस्सना के ही समान हैं। ध्यान दोनों में एक मुख्य प्रकिया है। योग में ध्यान के बिना लक्ष्य की प्राप्ति ही असंभव है। बुद्ध के अनुसार, एकांत में ध्यान करना ही आध्यात्मिक शांति एवं अनासक्ति प्राप्त करने का एकमात्र साधन है। इसके अतिरिक्त बुद्ध धर्म में समाधि की भी चर्चा की गई है। बौद्ध धर्म के अनुसार, समाधि से चित्त एकाग्र हो जाने पर प्रज्ञा की प्राप्ति होती है। योग में भी कहा गया है कि समाधि मे सिद्ध होने से योगियों को आलौकिक ज्ञान का लाभ होता है।
योग में व्याधि, स्त्यान, संशय, प्रमाद, आलस्य, अविरति, भ्रांतिदर्शन, अलब्धभूमिकता और अनवस्थित नौ चित्त के विक्षेप माने गए हैं और दुख, दौर्मनस्य, अंगमेजयत्व, श्वास और प्रश्वास, ये विक्षेप के साथ उत्पन्न होते हैं। ये विक्षिप्त चित्त में ही होते हैं, समाहित चित्त में नहीं। ये बौद्ध मार्ग पर चलने वाले के लिए भी हैं। भेद केवल इतना है कि बौद्ध मार्ग में इन्हें या तो पांच निवारण यथा कामच्छंद, व्यापाद, स्त्यानमृद्ध, औद्धत्य, कौकृत्य और विचिकित्सा, शीतलव्रत, परामर्श, कामराग, रूप-राग अरूप-राग, मान, उद्धतता और अविद्या के रूप में देखकर उनसे बचने का प्रयत्न करना है। बौद्धों का गुह्य समाज नामक ग्रंथ भी है। इसमें बौद्धों के यहां प्रचलित साधनाओं तथा उद्देश्यों का वर्णन है। षडंग योग-प्रत्याहार, ध्यान, धारणा, प्राणायाम, अनुस्मृति और समाधि का वर्णन भी इस ग्रंथ में है। योग में साधक के लिए विभूतियों का चरम लक्ष्य की प्राप्ति में प्रायः बाधक ही माना गया है। बुद्ध ने भी अपने शिष्यों को चमत्कार प्रदर्शन से मना कर रखा था। बुद्ध स्वयं एक उच्च कोट के योगी थे।