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इस एकादशी के दिन बद्रीनाथ में जन्मी थी विष्णु की प्रिय देवी

Mon, 07 Dec 2015 08:40 AM IST
Updated Mon, 07 Dec 2015 08:40 AM IST
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utpanna ekadashi vrat katha

सभी व्रतों में एकादशी व्रत का बड़ा महत्व है। इनमें मार्गशीर्ष मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि का बड़ा महत्व है। इस एकादशी को उत्पन्ना एकादशी के नाम से जाना जाता है। यह एकादशी व्रत इस वर्ष 7 दिसंबर को है। ऎसी मान्यता है कि इसी तिथि से एकादशी व्रत की शुरुआत हुई थी।

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क्योंकि सतयुग में इसी एकादशी तिथि को भगवान विष्णु के शरीर से एक देवी का जन्म हुआ था। इस देवी ने भगवान विष्णु के प्राण बचाए जिससे प्रसन्न होकर विष्णु ने इन्हें एकादशी नाम दिया।

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इस कारण देवी हुई प्रकट

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शास्त्रों के अनुसार जो व्यक्ति इस एकादशी के दिन व्रत रखकर भगवान विष्णु के संग एकादशी देवी की पूजा करता है उसके कई जन्मों के पाप कट जाते हैं और व्यक्ति उत्तम लोक में स्थान पाने का अधिकारी बन जाता है।

इस संदर्भ में कथा है कि मुर नामक असुर से युद्ध करते हुए जब भगवान विष्णु थक गए तब बद्रीकाश्रम में गुफा में जाकर विश्राम करने लगे। मुर भगवान विष्णु का पीछा करता हुए बद्रीकाश्रम पहुंच गया। निद्रा में लीन भगवान को मुर ने मारना चाहा तभी विष्णु भगवान के शरीर से एक देवी का जन्म हुआ और इस देवी ने मुर का वध कर दिया।

इस तरह व‌िष्‍णु भगवान ने एकादशी व्रत की शुरुआत की

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देवी के कार्य से प्रसन्न होकर विष्णु भगवान ने कहा कि देवी तुम्हारा जन्म मार्गशीर्ष मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी को हुआ है इसलिए तुम्हारा नाम एकादशी होगा। आज से प्रत्येक एकादशी को मेरे साथ तुम्हारी भी पूजा होगी। जो भक्त एकादशी का व्रत रखेगा वह पापों से मुक्त हो जाएगा।

मार्गशीर्ष मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी को एकादशी देवी का अवतार हुआ था इसलिए सभी एकादशी में इसका बड़ा महत्व है। एकादशी देवी विष्णु की माया से प्रकट हुई थी।

शास्त्रों के अनुसार, जो व्यक्ति श्रद्धा भाव से उत्पन्ना एकादशी का व्रत रखता वह मोहमाया के प्रभाव से मुक्त हो जाता है, छल-कपट की भावना उसमें कम हो जाती है और अपने पुण्य के प्रभाव से व्यक्ति विष्णु लोक में स्थान पाने योग्य बन जाता है।

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एकादशी व्रत के न‌ियम

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जो लोग यह व्रत करना चाहते हैं उन्हें एकादशी के दिन प्रातः उठकर भगवान विष्णु एवं देवी एकादशी की पूजा करनी चाहिए। पूरे दिन निराहार रहकर संध्या पूजन के बाद फलाहार चाहिए।

परनिंदा, छल-कपट, लालच, द्वेष से भावना मन में न लाएं। द्वादशी के दिन ब्राह्मणों को भोजन करवाने के पश्चात स्वयं भोजन करें।

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