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भक्त के घर जलावन पहुंचाती थीं मॉं भवानी

Fri, 01 Feb 2013 12:16 PM IST
राकेश/इंटरनेट डेस्क।
राकेश/इंटरनेट डेस्क। Updated Fri, 01 Feb 2013 12:16 PM IST
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story of swami ramanandacharya

पूरा जीवन जप-तप में लगाने के बाद भी बड़े-बड़े योगियों एवं संयासियों मां भवानी के दर्शन नहीं हो पाते हैं। लेकिन एक ऐसा भक्त भी था जिसकी सादगी और प्रेम भाव से प्रसन्न होकर माता ने दर्शन दिये और प्रतिदिन जलावन के लिए लकड़ी पहुंचाने का वचन भी दिया। इस महान भक्त का नाम था स्वामी रामानंदाचार्य। कबीरदास, रैदास, श्री सुखानंद जी एवं तुलसीदास के गुरू नरहरिदास इनके शिष्य थे।

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रामांनंदाचार्य के विषय में कथा है कि एक बार बरसात के मौसम में इनके आश्रम में साधुओं की एक टोली पहुंची। जलवान के लिए इकट्ठा की गयी सारी लकड़ियां गिली हो चुकी थी। साधुओं के लिए भोजन का प्रबंध करने के लिए स्वामी जी को सूखी लकड़ियों की आवश्यकता पड़ी। कहीं से सूखी लकड़ी का प्रबंध का उपाय न देखकर स्वामी जी ने निश्चय किया कि आश्रम में मौजूद मां भवानी के मंदिर को तोड़कर उसकी लकड़ियों से भोजन बनाएंगे।
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स्वामी रामानंदाचार्य मां भवानी के मंदिर में पहुंचे और मंदिर को तोड़ना शुरू कर दिया। मंदिर को टूटता देखकर मां भवानी प्रकट हो गयी और मंदिर नहीं तोड़ने का आग्रह करने लगी। इस पर स्वामी जी ने कहा कि साधुओं की सेवा के लिए भोजन का प्रबंध करना है। बिना मंदिर तोड़े सूखी लकड़ियां प्राप्त नहीं होगी। मैं साधुओं को भूखा नहीं रख सकता है इसलिए मंदिर तोड़ना आवश्यक है।
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स्वामी जी की बातों को सुनकर माता ने कहा कि सूखी लकड़ियों का प्रबंध मैं कर दूंगी और प्रतिदिन सूखी लकड़ियों का एक गट्ठर तुम्हारे आश्रम में पहुंचाउंगी। माता ने अपने वचन को पूरा किया और प्रतिदिन लकड़ियां पहुंचाने लगी। इस घटना की खब़र एक अन्य व्यक्ति को लग गयी। वह भी स्वामी जी की तरह मंदिर तोड़ने पहुंच गया। क्रोधित होकर माता प्रकट हुई और उस व्यक्ति की खूब पिटाई की। क्षमा याचना करने पर माता ने उस व्यक्ति को छोड़ दिया और स्वामी जी के आश्रम में सूखी लकड़ियां पहुंचाने का काम उसे सौंप दिया।

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