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Kashi Vishwanath Temple: काशी में विराजते हैं शिव-पार्वती, स्पर्श और दर्शन पूजन से मिलता है राजसूय यज्ञ का फल

Mon, 26 Feb 2024 01:06 PM IST
विनोद शुक्ला अनीता जैन ,वास्तुविद
अनीता जैन ,वास्तुविद Published by: विनोद शुक्ला Updated Mon, 26 Feb 2024 01:06 PM IST
सार

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार श्रीकाशी विश्वनाथ दो भागों में है। दाहिने भाग में शक्ति के रूप में मां पार्वती विराजमान हैं ,दूसरी ओर भगवान शिव वाम रूप में विराजमान है।

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shri kashi vishwanath temple history know puja importance and the interesting story
काशी विश्वनाथ मंदिर - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

काशी विश्वनाथ का द्वादश ज्योतिर्लिंगों में नौंवा स्थान है। काशी अनंतकाल से बाबा विश्वनाथ के जयकारों से गूंज रही है। शिवभक्त यहां मोक्ष की कामना से आते हैं। यह भी माना गया है कि काशी नगरी शिवजी के त्रिशूल पर टिकी हुई है व जिस जगह ज्योतिर्लिंग स्थापित है वह जगह कभी भी लोप नहीं होती। स्कन्द पुराण के अनुसार जो प्रलय में भी लय को प्राप्त नहीं होती। आकाश मंडल से देखने में ध्वज के आकार का प्रकाश पुंज दिखती है वह काशी अविनाशी है।  पौराणिक मान्यताओं के अनुसार श्रीकाशी विश्वनाथ दो भागों में है। दाहिने भाग में शक्ति के रूप में मां पार्वती विराजमान हैं ,दूसरी ओर भगवान शिव वाम रूप में विराजमान है।

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दोबारा जन्म नहीं होता
भगवान शिव के दर्शन के लिए देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु यहाँ पहुंचते हैं। कहा गया है-''काश्यां मरणांमुक्ति'' अर्थात काशी में देह त्यागने से मुक्ति मिल जाती है और प्राणी दोबारा गर्भ में नहीं आता। भगवान शिव खुद यहां तारक मंत्र देकर भक्तों को तारते हैं।
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दर्शन से मनोकामना होती है पूरी
मंदिर के गुंबद में श्रीयंत्र लगा हुआ है,यहां के लोगों में विश्वास है कि इस गुंबद की तरफ देखकर जो भी मुराद मांगी जाती है वह बाबा विश्वनाथ की कृपा से अवश्य पूरी होती है। मंत्र साधना के लिए भी यह प्रमुख स्थान है। गर्भगृह के चार द्वार भी तंत्र की दृष्टि से महत्वपूर्ण माने गए हैं। पहला शांति द्वार,दूसरा कला द्वार,तीसरा प्रतिष्ठा द्वार और चौथा निवृत्त द्वार। इन चारों द्वारों युक्त गर्भगृह की पांच परिक्रमा करने से भक्तों को ऊपरी बाधाओं से मुक्ति मिलती है।
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महत्व
काशीखण्ड में वर्णिंत है-' कि इस ज्योतिर्लिंग के स्पर्श मात्र से राजसूय यज्ञ का फल प्राप्त होता है व दर्शन मात्र से ज्ञान रुपी प्रकाश प्राप्त होता है। काशी में एक तिल भूमि भी लिंग से रहित नहीं है'। ऐसा भी माना गया है कि एक बार बाबा विश्वनाथ मंदिर के दर्शन करने और पवित्र गंगा में स्नान कर लेने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। आदि शंकराचार्य, संत एकनाथ, रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद ,महर्षि दयानन्द,गोस्वामी तुलसीदास जैसे दिग्गजों ने बाबा के धाम में आकर शीश नवाया है।


हमेशा विराजते हैं शिव-पार्वती
कल्पभेद के अनुसार विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग के सम्बन्ध में कई कथाएं प्रचलित हैं। एक कथा के अनुसार जब भगवान शंकर पार्वती से विवाह करने के पश्चात कैलाश पर्वत पर रहने लगे तब पार्वती जी इस बात से नाराज़ रहने लगीं। उन्होंने अपने मन की इच्छा भगवान शिव के सम्मुख रख दी। माता पार्वती की यह बात सुनकर भगवान शिव कैलाश पर्वत को छोड़कर देवी पार्वती के साथ काशी नगरी में आकर रहने लगे। इस प्रकार भोलेनाथ काशीपुरी में आकर ज्योतिर्लिंग के रूप में सदा के लिए स्थापित हो गए। तभी से काशी नगरी में विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग ही भगवान शिव का निवास स्थान बन गया। पांच कोस (पंचक्रोशी) के क्षेत्रफल वाले काशी क्षेत्र को शिव और पार्वती ने प्रलयकाल में भी कभी त्याग नहीं किया। यही वजह है कि यह क्षेत्र 'अविमुक्त' क्षेत्र कहा गया है।
 

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