{"_id":"6526454ea263db61ba0e2d73","slug":"shardiya-navratri-2023-know-importance-of-shri-yantra-puja-during-navratri-2023-10-11","type":"story","status":"publish","title_hn":"Shardiya Navratri 2023: नवरात्रि में 'श्रीयंत्र' पूजा से कार्य-व्यापार में मिलती है सफलता","category":{"title":"Religion","title_hn":"धर्म","slug":"religion"}}
Shardiya Navratri 2023: नवरात्रि में 'श्रीयंत्र' पूजा से कार्य-व्यापार में मिलती है सफलता
Wed, 11 Oct 2023 12:19 PM IST
विनोद शुक्ला
पं.जयगोविंद शास्त्री, ज्योतिषाचार्य
पं.जयगोविंद शास्त्री, ज्योतिषाचार्य
Published by: विनोद शुक्ला
Updated Wed, 11 Oct 2023 12:19 PM IST
सार
श्रीयंत्र का वर्णन करते हुए शास्त्र कहते हैं कि सृष्टि में जो कुछ भी दृश्यादृश्य है उन सबका मूल स्थान 'श्रीयंत्र' ही है। 'श्रयते या सा श्री:, अर्थात् जो परब्रह्म का आश्रयण करती है वही श्री है।
विज्ञापन
नवयज्ञ पर्व की अवधि में प्राणी मां श्रीमहाकाली, श्रीमहालक्ष्मी और श्रीमहासरस्वती की पूजा आराधना करके अपने अभीष्ट फल प्राप्त करता है।
विस्तार
शक्ति आराधना का पावन पर्व नवरात्रि 15 अक्तूबर, रविवार को चित्रा नक्षत्र और तुला राशि के चंद्रमा के गोचर काल में आरम्भ हो रहा है जो 23 अक्तूबर, सोमवार को श्रवण नक्षत्र और मकर राशि के चन्द्रमा के गोचरकाल में संपन्न होगा। इस नवयज्ञ पर्व की अवधि में प्राणी मां श्रीमहाकाली, श्रीमहालक्ष्मी और श्रीमहासरस्वती की पूजा आराधना करके अपने अभीष्ट फल प्राप्त करता है। इसी काल में यदि मां श्रीमहालक्ष्मी का स्वरूप श्रीयंत्र की भी स्थापना पूजादि किया जाय तो वह और भी लाभदायक और उन्नति कारक रहता है।
विज्ञापन
श्रीयंत्र का वर्णन करते हुए शास्त्र कहते हैं कि सृष्टि में जो कुछ भी दृश्यादृश्य है उन सबका मूल स्थान 'श्रीयंत्र' ही है। 'श्रयते या सा श्री:, अर्थात् जो परब्रह्म का आश्रयण करती है वही श्री है। यंत्रम का अर्थ है, गृह, वास अथवा निवास। अतः जहां परब्रह्म परमेश्वरी 'श्री' का वास है वही गृह है, इससे सिद्ध होता है कि परब्रह्म एवं उनकी शक्ति का सम्यक रूप ही 'श्रीयंत्र' है। पौराणिक मान्यताओं में भी 'यंत्र' शब्द गृह के लिए प्रयोग होता है अतः यह विश्व ही श्री विद्या का गृह है जिसमें ब्रह्म एवं उनकी शक्ति परमेश्वरी एकाकार रूप में विद्यामान रहते हैं।
विज्ञापन
'न शिवेन बिना देवी न देव्या च बिना शिवः'। अर्थात् परब्रह्म शिव से उनकी शक्ति अभिन्न है न शिव के बिना शक्ति हैं और न ही शक्ति के बिना शिव। दोनों प्रकृति एवं पुरुष ॐकार हैं इसीलिए 'श्रीयंत्र' रूप त्रिपुरसुंदरी का गृह, जाग्रत, स्वप्न, सुसुप्ति तथा प्रमाता, प्रमेय, प्राणरूपसे त्रिपुरात्मक एवं सूर्य-चन्द्र-अग्नि भेद से त्रिखंडात्मक कहलाता है। चतुर्भिः शिवचक्रैश्च शक्तिचक्रैश्च पंचिभिः। शिवशक्त्यात्मकं ज्ञेयं श्रीचक्रम शिवयोर्वपु:।| के अनुसार मूलरूप से श्रीयंत्र के नौ चक्रों में जिनमें पाँच शक्ति के और चार शिव के हैं, से बना हुआ तेजस्रयात्मक है, जिनमें त्रिकोण, अष्टार, अन्तर्दशार, बहिर्दशार और चतुर्दशार ये पाँच अधोमुख त्रिकोण शक्तिचक्र हैं। बिंदु, अष्टदल, षोडशदल और चतुरस्र ये चार ऊद्धर्मुख त्रिकोण शिव के हैं। 'यतपिंडे तत् ब्राह्मांडे' अर्थात जो पिंड में है वही ब्रह्माण्ड में है। पिंड यानी शरीर में इनका स्थान भ्रूमध्य-आज्ञाचक्र, लम्बिका-इन्द्र्योनी, कंठ-बिशुद्धि, ह्रदय-अनाहत, नाभि-मणिपुर, वस्ति-स्वाधिष्ठान, मूलाधार-मूलाधार तथा तदधोदेश-कुल हैं। इन्हें ही सृष्टिकर्ता, पालन एवं प्रलयकर्ता माना गया है इनमें बिन्दुचक्र शिव की मूल प्रकृति से बना होने के कारण प्राकृत स्वरूप है।
विज्ञापन
15 अक्तूबर से नवरात्रि आरंभ, जानिए नवरात्रि स्थापना के दिन देवी जिस वाहन पर आती है उसके पीछे के संकेत
शेष आठ चक्र प्रकृति-विकृति उभयात्मक हैं। विन्दु, त्रिकोण एवं अष्टार ये सृष्टिकर्ताचक्र हैं। अन्तर्दशार, बहिर्दशार एवं चतुर्दशार पालनकर्ता चक्र है तथा अष्टदल, षोडशदल और सहस्रदल (भुपुर) ये संहारकर्ता चक्र हैं। विंदुचक्र शिववास है। जहां शिव विश्राम करते हैं इस प्रकार ही सम्पूर्ण श्रीयंत्र है। इन्हीं विन्दुचक्र में सृष्टि की समस्त शक्तियाँ निहित हैं जिनमें सभी कलाएं, सभी तत्व, पंचकोश, पञ्चवायु, पुरुषार्थ चतुष्टय, सभी ग्रह, उपग्रह, सभी रिद्धियाँ-सिद्धिंयाँ आदि वास करती हैं।
शास्त्रों के अनुसार जितने भी यंत्र हैं उन सभी का प्रादुर्भाव श्रीयंत्र से ही हुआ है अतः श्रीयंत्र की पूजा-आराधना करने से सभी यंत्रों का फल एकसाथ मिल जाता है इनकी पूजा के पश्च्यात फिर किसी यंत्र की साधना शेष नही रहती। उससे भी बड़ी बात यह है कि इस यंत्र की आराधना निष्फल नहीं रहती। यंत्र के इसी प्रभाव को ध्यान में रखकर स्वयं ब्रह्म ज्ञानियों ने इन्हें 'यंत्रराज' कहा है। शारदीय नवरात्र पर श्रीयंत्र की विधि प्रकार पूजा-आराधना करके स्फटिक अथवा कमलगट्टे की माला से ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्मयै नमः। मंत्र का जप प्रतिदिन करने से माँ श्रीशक्ति की असीम कृपा प्राप्त होती है।