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Shabari Jayanti 2020: शबरी ने पशु बलि के खिलाफ उठाया था ये बड़ा कदम

धर्म डेस्क, अमर उजाला Updated Thu, 13 Feb 2020 03:46 PM IST
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Shabari Jayanti 2020
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शबरी जयंती 15 फरवरी को है। हिन्दू पंचांग के अनुसार शबरी जयंती प्रति वर्ष फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि को मनाई जाती है। रामायण काल में शबरी ने ही प्रभु श्रीराम को जूठे बेर खिलाए थे। इसी कारण शबरी को मोक्ष की प्राप्ति हुई थी। 
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शबरी माला देवी की होती है पूजा
शबरीमाला मंदिर में इस दिन खासतौर पर मेला लगता है एवं पूजन-अर्चना होती है। शबरी को देवी का स्थान प्राप्त हुआ एवं साथ ही साथ मोक्ष की प्राप्ति भी हुई। शबरी जंयती के दिन शबरी को देवी स्वरूप में पूजा जाता है, यह जयंती श्रद्धा एवं भक्ति द्वारा मोक्ष प्राप्ति का प्रतीक है। शबरी देवी की पूजा करने से वैसे ही भक्ति भाव की कृपा मिलती है जैसे शबरी ने भगवान राम से प्राप्त की थी।

पैर की धूल से तालाब में आ गया पानी
एक दिन शबरी आश्रम के पास के तालाब में जल लेने गई, वहीं, पास में एक ऋषि तपस्या में लीन थे। जब उन्होंने शबरी को जल लेते देखा तो उसे अछूत कहकर उस पर एक पत्थर मारा और उसकी चोट से बहते रक्त की एक बूंद से तालाब का सारा पानी रक्त में बदल गया। ऋषि द्वारा उसमें गंगा, यमुना सभी पवित्र नदियों का जल डाला गया लेकिन रक्त जल में नहीं बदला। कई वर्षों बाद, जब भगवान राम सीता की खोज में वहां आए तब लोगों ने भगवान राम से आग्रह किया कि वे तालाब के रक्त को जल में बदल दें। भगवान राम ने ऋषि से तालाब का इतिहास पूछा तब ऋषि ने शबरी और तालाब की कथा सुनाई। भगवान राम ने दुखी होकर कहा, हे गुरुवर, यह रक्त उस देवी शबरी का नहीं मेरे ह्रदय का है जिसे आपने अपशब्दों से घायल किया है। भगवान राम का नाम सुनते ही शबरी दौड़ी चली आती हैं। ‘राम मेरे प्रभु’ कहती हुई जब वो तालाब के समीप पहुंचती हैं तब उसके पैर की धूल तालाब में चली जाती है और तालाब का सारा रक्त अपने आप जल में बदल जाता है। तब भगवान राम कहते हैं, देखिए गुरुवर शबरी के पैरों की धूल से रक्त जल में बदल गया।

नहीं चढ़ने दी जानवरों की बलि
शबरी एक आदिवासी भील की पुत्री थी। देखने में बहुत साधारण पर दिल से बहुत कोमल थी। इनके पिता ने इनका विवाह निश्चित किया लेकिन आदिवासियों की एक प्रथा थी की किसी भी अच्छे कार्य से पहले निर्दोष जानवरों की बलि दी जाती थी। इसी प्रथा को पूरा करने के लिए इनके पिता शबरी के विवाह के एक दिन पूर्व सौ भेड़ बकरियां लेकर आए। शबरी को जब पता चला तो वह इन पशुओं को बचाने की जुगत लगाने लगी। एकाएक शबरी के मन में ख्याल आया और वह सुबह होने से पूर्व ही घर से भागकर जंगल चली गई, जिससे वो उन निर्दोष जानवरों को बचा सके। शबरी को भली भांति पता था कि एक बार इस प्रकार जाने के बाद वह कभी अपने घर वापसी नहीं कर पाएगी, लेकिन उसने पहले उने भेड़-बकरियों के बारे में सोचा। शबरी भगवान राम की भक्त थीं और उन्हीं के भक्ति भाव के कारण ही भगवान राम ने शबरी के झूठे बेर खाए थे। ऐसा माना जाता है कि इसी दिन भगवान राम ने इनके झूठे बेर खाए थे।

मतंग ऋषि ने दिया था आशीर्वाद
घर से भागने के बाद अकेली शबरी जंगल में भटक रही थी, तब उसने शिक्षा प्राप्ति के उद्देश्य से कई गुरुवरों के आश्रम में दस्तक दी, लेकिन शबरी तुच्छ जाति की थी, इसलिए उसे सभी ने धुत्कार के निकाल दिया। अंत में मतंग ऋषि के आश्रम में शबरी को स्थान और शिक्षा मिली। मतंग ऋषि शबरी की गुरु भक्ति से बहुत प्रसन्न थे। देह छोड़ने से पहले मतंग ऋषि ने शबरी को आशीर्वाद दिया कि एक दिन भगवान राम स्वयं शबरी से मिलने आएंगे। उस दिन उसका उद्धार होगा और उसे मोक्ष की प्राप्ति होगी।
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