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Sawan Mangala Gauri Vrat 2024: सावन का चौथा और आखिरी मंगला गौरी व्रत आज, जानिए पूजाविधि और कथा
Mon, 12 Aug 2024 04:47 PM IST
विनोद शुक्ला
धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला
Published by: विनोद शुक्ला
Updated Mon, 12 Aug 2024 04:47 PM IST
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मंगला गौरी व्रत
- फोटो : अमर उजाला
पंचांग के अनुसार, चौथा मंगला गौरी व्रत आज, 13 अगस्त को है। सावन माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि पर चौथा मंगला गौरी व्रत पड़ रहा। सनातन धर्म में इस व्रत को बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। यह पर्व मां गौरी की पूजा के लिए समर्पित है। मंगला गौरी व्रत के दिन विवाहित महिलाएं वैवाहिक जीवन को खुशहाल बनाए रखने के लिए मां गौरी की पूजा-अर्चना करती हैं। इस व्रत को करने से वैवाहिक जीवन में चल रही समस्याओं का निवारण होता है और अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मंगला गौरी का व्रत रखने से व्यक्ति की कुंडली में मंगल दोष दूर होता है। इस दौरान भोलेनाथ और मां पार्वती की पूजा एक साथ करने से जीवन में सुख-समृद्धि बनी रहती है।
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व्रत के नियम और विधि
इस दिन व्रत रखने वाले को सूरज उगने से पहले उठकर स्नान करना चाहिए और पवित्र व सुंदर वस्त्र पहनकर मंगला गौरी की पूजा करनी चाहिए। पूजा में विशेष रूप से मिट्टी की मूर्ति या चित्र का पूजन किया जाता है और देवी को फूल, फल, और मिठाइयां अर्पित की जाती हैं। इसके बाद घी का दीपक जलाएं और आरती करें। इस बात ध्यान रखें कि पूजा के लिए सभी सामग्रियों जैसे पान, सुपारी, लौंग, इलायची, फल, पान, लड्डू सुहाग की सामग्री और चूड़ियां आदि की संख्या 16 होनी चाहिए। पूजा सामग्रियों को अर्पित करने के बाद मंगला गौरी की व्रत कथा सुनें। पूजा के बाद पति की लंबी आयु और सुखमय दांपत्य जीवन की कामना करें। यह व्रत उनके जीवन में प्रेम, समर्पण और भक्ति का प्रतीक है, जो उनके परिवार की समृद्धि और सुख-शांति को सुनिश्चित करता है।
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मंगला गौरी पूजा के मंत्र
1. सर्वमंगल मांगल्ये, शिवे सर्वार्थ साधिके. शरणनेताम्बिके गौरी नारायणी नमोस्तुते ।।
2. ह्रीं मंगले गौरि विवाहबाधां नाशय स्वाहा ।।
मंगला गौरी व्रत कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, एक समय की बात है एक शहर में धर्मपाल नाम का एक व्यापारी रहता था। उसकी पत्नी बहुत खूबसूरत थी और उसके पास काफी संपत्ति थी लेकिन, उनके कोई संतान नहीं होने के कारण वे काफी दुखी रहा करते थे। भगवान की कृपा से उन्हें एक पुत्र की प्राप्ति हुई लेकिन, वह अल्पायु था। उनके पुत्र को श्राप मिला था कि 16 वर्ष की आयु में सांप के काटने से उसकी मौत हो जाएगी।
संयोग से उसकी शादी 16 वर्ष से पहले ही एक युवती से हुई जो माता मंगला गौरी व्रत किया करती थी। मान्यता है कि इस व्रत के पुण्य से वह जीवन में विधवा नहीं हुई और उसके पति को जीवनदान मिल गया। तभी से सावन में पड़ने वाले हर मंगलवार को मंगला गौरी व्रत करने की शुरुआत हुई।