Sawan Purnima: 01 अगस्त को सावन अधिक मास की पूर्णिमा, जानिए महत्व, पूजाविधि और दान का फल
अधिकमास की पूर्णिमा का यह व्रत सुख-सौभाग्य में वृद्धि करता है और सभी मनोकामनाओं की पूर्ति कर धन, संपत्ति, सुख, वैभव और ऐश्वर्य में वृद्धि करता है।
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वैसे तो हर एक पूर्णिमा पर भगवान सत्यनारायण, देवी लक्ष्मी और चंद्रदेव की पूजा-अर्चना का विधान है, परन्तु पुरुषोत्तम मास भगवान विष्णु का अतिप्रिय होने से इस महीने की पूर्णिमा का महत्व और भी बढ़ जाता है। शास्त्रीय मान्यता के अनुसार इस दिन लक्ष्मीनारायण व्रत करने का विधान है। जिस चन्द्र वर्ष में सूर्य संक्रांति नहीं पड़ती उसे मलमास, अधिकमास या पुरुषोत्तम मास कहा गया है। पुरुषोत्तम मास में शादी-विवाह, नववधू, गृह प्रवेश, यज्ञोपवीत संस्कार आदि करना निषेध बताया गया है किंतु,आपातकाल की स्थिति में सकाम अनुष्ठान, जीवन रक्षक मंत्रों का भी सकाम जप एवं समाज सेवा से संबंधित अन्य सभी उपक्रम किए जा सकते हैं।
अधिक मास की पूर्णिमा का महत्व
अधिकमास की पूर्णिमा का यह व्रत सुख-सौभाग्य में वृद्धि करता है और सभी मनोकामनाओं की पूर्ति कर धन, संपत्ति, सुख, वैभव और ऐश्वर्य में वृद्धि करता है। यदि इस व्रत को कुंवारी कन्याएं करें तो उन्हें श्री हरि एवं मां लक्ष्मी की कृपा से सुयोग्य वर प्राप्त होता है और यदि युवक करें तो उन्हें सुशील पत्नी प्राप्त होती है। चंद्रमा का संबंध मन से होने के कारण भी यह व्रत मन की पवित्रता और चित्त की शांति के लिए किया जाता है। इससे जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है औरआध्यात्मिकता का विकास होता है। पूर्णिमा को स्नान अर्घ्य, तर्पण, जप-तप, पूजन, कीर्तन एवं दान-पुण्य करने से स्वयं भगवान विष्णु, प्राणियों को ब्रह्मघात और अन्य कृत्या-कृत्य पापों से मुक्त करके जीव को शुद्ध कर देते हैं। शास्त्रों में इस मास की पूर्णिमा के दिन भगवान विष्णु का पूजन कई गुना फलदाई बताया गया है।
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पूजाविधि
इस दिन स्नानादि से निवृत होकर पूजा स्थान में पूर्वाभिमुख होकर बैठें। ईशान कोण में चौकी पर लाल या पीले रंग का कपड़ा बिछाकर, भगवान विष्णु एवं माता लक्ष्मी की तस्वीर या प्रतिमा स्थापित करके उनका गंगाजल, कुमकुम, हल्दी, अक्षत, रोली, चंदन, अष्टगंध,फल-मिठाई पीले और लाल पुष्प से पूजन करें। मखाने की खीर और शुद्ध घी से बने मिष्ठान्न का नैवेद्य लगाएं एवं श्री लक्ष्मीनारायण व्रत की कथा सुनकर कपूर और घी के दीपक से आरती करें। रात्रि में पूर्णिमा के चांद का दर्शन-पूजन करें। भगवान विष्णु के व्रत में नियम, संयम ,वाणी,कर्म और आचरण की पवित्रता का ध्यान रखना जरूरी है।
पुण्य प्राप्ति के लिए ये करें
परमेश्वर श्री नारायण द्वारा वरदान प्राप्त पुरुषोत्तम मास की अवधि के मध्य श्रीमद्भागवत का पाठ, कथा का श्रवण, श्रीविष्णु सहस्त्रनाम, श्री राम रक्षास्तोत्र, पुरुष सूक्त का पाठ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॐ नमो नारायणाय जैसे मंत्रों का जप करके मनुष्य श्रीविष्णु की कृपा का पात्र बनता है। इस मास में निष्काम भाव से किए गए जप-तप पूजा-पाठ, दान-पुण्य, अनुष्ठान आदि का महत्व सर्वाधिक रहता है। परमार्थ सेवा, असहाय लोगों की मदद करना, बुजुर्गों की सेवा करना, वृद्ध आश्रम में अन्न वस्त्र व दवाइयों का दान करना, विद्यार्थियों को पुस्तक का दान कथा संत महात्माओं को धार्मिक ग्रंथों का दान करना पुण्यकारी माना गया है। इस मास में किए गए जप-तप, दान पुण्य का लाभ जन्म जन्मांतर तक दान करने वाले के साथ रहता है। घर के मंदिर में रखे लड्डू-गोपाल तथा विष्णुजी के अन्य स्वरूप वाली मूर्तियों पर भी तुलसी मंजरी अवश्य अर्पित करनी चाहिए। यदि आप पूरे माह यह नहीं कर पाएं तो अधिक मास की पूर्णिमा के दिन दान-पुण्य करके पुण्य का फल कई गुना प्राप्त कर सकते है।