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Sawan 2026: कालकूट विष से जुड़ी है शिव पूजा की परंपरा, जानिए श्रावण में अर्पण का महत्व
Mon, 10 Aug 2026 07:21 PM IST
विनोद शुक्ला
धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला
Published by: विनोद शुक्ला
Updated Mon, 10 Aug 2026 07:21 PM IST
सार
Sawan 2026: सावन का महीना भगवान शिव की पूजा आराधना के लिए सबसे ज्यादा शुभ और पवित्र माना जाता है। इस माह में शिव जी की आराधना करने का विशेष महत्व होता है।
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सावन माह में शिव आराधना का महत्व
- फोटो : अमर उजाला AI
विस्तार
Sawan 2026: धर्मग्रंथों में कहा गया है‘श्रावणे पूजयेत् शिवम्’,अर्थात श्रावण मास में भगवान शिव की पूजा विशेष फलदायी मानी गई है। भोलेनाथ थोड़ी-सी भक्ति से प्रसन्न होने वाले देवता हैं, इसलिए उन्हें आशुतोष कहा जाता है। एक श्लोक में कहा गया है‘वेदः शिवः, शिवः वेदः’,अर्थात वेद ही शिव हैं और शिव ही वेद हैं। भगवान शिव को महाकाल कहा गया है और उनके रुद्र स्वरूप के बारे में कहा जाता है रुतं दुःखं द्रावयति इति रुद्रः, अर्थात जो दुखों का नाश करते हैं, वे रुद्र हैं। इसी कारण श्रावण में शिव आराधना का विशेष महत्व माना गया है।
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शिवलिंग में समाए हैं त्रिदेव
श्रीलिंग पुराण में शिवलिंग के स्वरूप की महिमा बताई गई है। इसके अनुसार शिवलिंग के मूल भाग में ब्रह्मा, मध्य में भगवान विष्णु और ऊपरी भाग में महादेव रुद्र का वास माना गया है। वहीं शिवलिंग की वेदी को माता अम्बिका का स्वरूप माना गया है। इस प्रकार शिवलिंग में शिव और शक्ति के साथ त्रिदेवों का भाव भी समाहित माना गया है। इसलिए श्रद्धापूर्वक शिवलिंग की पूजा करने से भगवान शिव और माता पार्वती की कृपा प्राप्त होने की मान्यता है।
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श्रावण में जलाभिषेक का विशेष महत्व
श्रावण में भगवान शिव का जलाभिषेक करने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। तीर्थ जल, गंगाजल और अन्य पवित्र जल से शिवलिंग का अभिषेक किया जाता है। इनमें गंगाजल से अभिषेक को विशेष महत्व दिया गया है। भक्त जल चढ़ाते हुए भगवान शिव से सुख, शांति और मंगल की कामना करते हैं। मान्यता है कि श्रावण में की गई शिव आराधना मन को शांति देने के साथ जीवन में सकारात्मकता लाती है।
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समुद्र मंथन से जुड़ी है अर्पण की परंपरा
भगवान शिव को जल, बेलपत्र, दूध, पुष्प आदि अर्पित करने के पीछे समुद्र मंथन से जुड़ी पौराणिक कथा भी बताई जाती है। समुद्र मंथन के दौरान जब कालकूट विष निकला तो उसके प्रभाव से तीनों लोकों में संकट उत्पन्न हो गया। लोककल्याण के लिए भगवान शिव ने उस विष को अपने कंठ में धारण कर लिया। विष के प्रभाव से उनका कंठ नीला पड़ गया और वे नीलकंठ कहलाए।
पौराणिक मान्यता के अनुसार विष की तीव्रता को शांत करने के लिए देवी-देवताओं और प्रकृति के विभिन्न स्वरूपों ने भगवान शिव को शीतलता प्रदान की। चंद्रमा ने शीतलता दी, गंगाजी ने उनके मस्तक पर जलधारा प्रवाहित की और शेषनाग उनके कंठ में विराजमान हुए। इसी प्रसंग से शिव को जल, गंगाजल, बेलपत्र और पुष्प अर्पित करने की परंपरा को जोड़ा जाता है।
बेलपत्र से लेकर धतूरे तक का महत्व
श्रावण में भगवान शिव को बेलपत्र अर्पित करने की विशेष परंपरा है। इसके साथ जल, गंगाजल, दूध, पुष्प, भांग और धतूरा भी चढ़ाया जाता है। भक्त इन वस्तुओं को केवल पूजा की सामग्री के रूप में नहीं, बल्कि अपनी श्रद्धा और समर्पण के भाव के साथ भगवान को अर्पित करते हैं।