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Sawan 2025: शिव आराधना के बाद शिवपिंडी की परिक्रमा कैसे करें ?

Thu, 24 Jul 2025 06:56 PM IST
विनोद शुक्ला धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला Published by: विनोद शुक्ला Updated Thu, 24 Jul 2025 06:56 PM IST
सार

शिवजी की परिक्रमा चंद्रकला के समान अर्थात सोम सूत्री होती है। सूत्र का अर्थ है, नाला। परिक्रमा बाई ओर से आरंभ कर जलप्रणालिका के दूसरे छोर तक जाते हैं। उसे न लांघते हुए मुडकर पुनः जलप्रणालिका तक आते हैं। ऐसा करने से एक परिक्रमा पूर्ण होती है

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sawan 2025 Know how to shiva linga puja shivpindi after shiv aradhana
सावन माह में शिव आराधना का महत्व - फोटो : adobe stock

विस्तार

शिवजी को श्वेत रंग के पुष्प ही चढाएं : उनमें रजनीगंधा, जाही, जुही और बेला के पुष्प अवश्य हों। ये पुष्प दस अथवा दस की गुना में हों। तथा इन पुष्पों को चढाते समय उनका डंठल शिवजी की ओर रखकर चढाएं। पुष्पों में धतूरा, श्वेत कमल, श्वेत कनेर, आदि पुष्पों का चयन भी कर सकते हैं।
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श्वेत अक्षत - शिव पूजा का महत्त्वपूर्ण घटक :  श्वेत अक्षत वैराग्य के, अर्थात निष्काम साधना के द्योतक हैं। श्वेत अक्षत की ओर निर्गुण से संबंधित मूल उच्च देवताओं की तरंगें आकृष्ट होती हैं। शिवजी एक उच्च देवता हैं और वे अधिकाधिक निर्गुण से संबंधित है। इसलिए श्वेत अक्षत पिंडी के पूजन में प्रयुक्त होने से शिवतत्त्व का अधिक लाभ मिलता है। पूजा के उपरांत देवता की परिक्रमा करते हैं। शिवजी की परिक्रमा करने की पद्धति अन्य देवताओं की परिक्रमा से भिन्न है।
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शिवपिंडी की परिक्रमा कैसे करें ? 
शिवजी की परिक्रमा चंद्रकला के समान अर्थात सोम सूत्री होती है। सूत्र का अर्थ है, नाला। परिक्रमा बाई ओर से आरंभ कर जलप्रणालिका के दूसरे छोर तक जाते हैं। उसे न लांघते हुए मुडकर पुनः जलप्रणालिका तक आते हैं। ऐसा करने से एक परिक्रमा पूर्ण होती है। यह नियम केवल मानव स्थापित अथवा मानव निर्मित शिवलिंग के लिए ही लागू होता है। स्वयंभू लिंग या चल अर्थात पूजा घर में स्थापित लिंग के लिए नहीं। जल प्रणालिका से शक्तिस्रोत प्रक्षेपित होता है। उसे लांघते समय पैर फैलने से वीर्यनिर्मिति एवं पांच अंतस्थ वायुओं पर विपरीत परिणाम होता है। और इस स्रोत से शिव की तम प्रधान लयकारी तरंगें पृथ्वी तथा तेज तत्वों के प्राबल्य के साथ प्रक्षेपित होती रहती है। इसलिए ऐसे शिवलिंग की अर्ध गोलाकार पद्धति से परिक्रमा करते हैं ।

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शिवपिंडी में शिव का निर्गुण, निर्गुण-सगुण तत्त्व, तारक तथा मारक तत्त्वों का संगम होता है। उचित पद्धति से पूजा करने से दर्शनार्थी को आवश्यक तत्त्व का लाभ होता है। शिवपिंडी द्वारा मारक शक्ति प्रक्षेपित होते समय वहां के तापमान में वृद्धि होती है। वहां आनंद अनुभव होता है। तारक शक्ति प्रक्षेपित होते हुए वहां का वातावरण शीतल हो जाता है। साथ ही आनंद एवं शांति की अनुभूति होती है। इस श्रावण माह में भगवान शिव हमसे शास्त्र में बताए अनुसार भावपूर्ण पूजा करवा लें, तथा अपनी भक्ति का वरदान दें ऐसी प्रार्थना करते हैं। 

सन्दर्भ  : सनातन संस्था का ग्रन्थ ' शिव '
श्रीमती कृतिका खत्री  
सनातन संस्था , दिल्ली  

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