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ऋषि पंचमी 2018: क्यों मनाई जाती है ऋषि पंचमी, जानिए इसका पौराणिक महत्व

Sat, 15 Sep 2018 09:48 AM IST
पूनम नेगी
पूनम नेगी Updated Sat, 15 Sep 2018 09:48 AM IST
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rishi panchami 2018 importance and significance

ऋषियों ने मानव जाति का जो कल्याण किया है, उसे हम कैसे भूल सकते हैं। उनके उपकारों को स्मरण करते हुए हर साल भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को ऋषि पंचमी का पर्व मनाकर उनका नमन-वंदन करते हैं।सही है कि आधुनिक विज्ञान निपट सत्य बनकर सामने है, लेकिन उसके अविष्कारों की सबसे बड़ी चूक आत्मिकी की उपेक्षा है। कमोबेश पेच यही है कि वह जितने समाधान जुटाता है, उससे कहीं अधिक समस्याएं पैदा हो जाती हैं। समस्याओं का समाधान एक ही है मानवीय चेतना का अध्ययन मनन। ऋषि मुनि इस विधा के मर्मज्ञ थे। "यत् ब्रह्माण्डे तत् पिण्डे" (जो कुछ भी इस विश्व ब्रह्मांड में है, वह सब कुछ हमारी देह में निहित है) के सूत्र पर काम करते हुए उन्होंने जाना और परखा कि चेतना का विस्तार असीम है। 

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वेदों में इस तरह के अनुसंधान और उसके निष्कर्षों का सार सूत्र संचित है। चारों वेदों में बीस हजार से ज्यादा मंत्र हैं। इन्हें गाया और रचा है सात ऋषियों और उनकी कुल परंपरा में हुए अन्य ब्रह्मवेत्ताओं ने। इस कुल परंपरा का आरंभ मूलत: सात ऋषियों से होता है। उन सात ऋषियों के नाम हैं वसिष्ठ, विश्वामित्र, कण्व, अत्रि, भारद्वाज, वामदेव और शौनक। उन दिनों जब दिशा बताने वाले यंत्र नहीं थे, तब समुद्री यात्रा के समय दिन में सूर्य और रात में ध्रुव तारे या सात ऋषियों के नाम से विख्यात तारामंडल से दिशा की पहचान की जाती थी। 
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राजा दशरथ के कुलगुरु ब्रह्मर्षि वसिष्ठ सप्तर्षि मंडल के प्रथम सदस्य हैं। कहते हैं कि उन्होंने सरस्वती नदी के किनारे ऋग्वेद के सौ सूक्तों की रचना की थी। ऋषि होने से पहले विश्वामित्र विश्वरथ नाम के राजा थे। कामधेनु गाय के लिए उनका ऋषि वसिष्ठ से युद्ध भी हुआ, लेकिन वह हार गए। हार ने उन्हें ऋषि विश्वामित्र बना दिया। अपनी तपस्या के बल पर उन्होंने त्रिशंकु को सशरीर स्वर्ग भेज दिया। तीसरे ऋषि कण्व ऋग्वेद के 103 सूक्त वाले आठवें मंडल के मंत्रों के रचयिता माने जाते हैं। उन्हीं ऋषि कण्व ने सोमयज्ञ की परंपरा शुरू की। राजा दुष्यंत की पत्नी शकुंतला और पुत्र भरत का पालन-पोषण इन्हीं के आश्रम में हुआ। ऋषि भारद्वाज देवगुरु बृहस्पति के पुत्र थे।
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ऋग्वेद के छठे मंडल के द्रष्टा भारद्वाज ऋषि हैं। उन्होंने 765 मंत्रों का साक्षात्कार किया। अथर्ववेद में भी 23 मंत्र इन्हीं के हैं। पंचम मंडल के द्रष्टा महर्षि अत्रि ने कृषि के विकास में योगदान दिया था। कहते हैं कि के अग्नि पूजकों के धर्म का सूत्रपात अत्रि से ही हुआ। वामदेव ने सामगान (अर्थात संगीत) दिया। वह ऋग्वेद के चौधे मंडल के सूत्र द्रष्टा और जन्मत्रयी के तत्ववेत्ता माने जाते हैं। भरत मुनि के लिखे भरत नाट्य शास्त्र सामवेद से ही प्रेरित है। सामवेद में संगीत और वाद्य यंत्रों की संपूर्ण जानकारी मिलती है। ऋषि शौनक ने दस हजार विद्यार्थियों का गुरुकुल चलाकर कुलपति का सम्मान हासिल किया। 


इन विभूतियों के अलावा के अलावा उपनिषद काल में अगस्त्य, अष्टावक्र, याज्ञवल्क्य, कश्यप, कात्यायन, ऐतरेय, कपिल, जेमिनी, गौतम, व्यास, चरक, सुश्रुत, जमदग्नि, याज्ञवल्क्य और नारद जैसे ऋषियों ने मनुष्य और विश्व वसुंधरा को गौरव गरिमा दी। संसार की विभिन्न  विद्याओं की खोज और उनके माध्यम से एक जागृत जीवंत व विकसित धर्म-पंरपरा की संरचना इन महान ऋषियों की बदौलत ही पूरी हो सकी। वैदिक वांग्मय में ज्ञान का सागर भरकर इन मंत्र द्रष्टा ऋषियों ने समूची मानव जाति का जो कल्याण किया है, उससे हम सब कभी उऋण नहीं हो सकते। उनके उपकारों का स्मरण करते हुए हर साल भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को ऋषि पंचमी का पर्व मनाकर नमन-वंदन करते हैं। पिता के ऋण से उऋण हुआ जा सकता है। उनकी वंश परंपरा आगे बढ़ाने के साथ ही उनके दायित्वों को पूरा कर लोग उऋण होते ही हैं। लेकिन ऋषि ऋण के बाबत कितने लोग ध्यान देते हैं? इस ऋण से उऋण होने का एक ही उपाय है कि उनकी विरासत अर्थात ज्ञान, परंपरा और संस्कृति साधना को दिनों-दिन बढ़ाया और समृद्ध किया जाए।

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