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Pitru Paksha 2022: ब्रह्मकपाल तीर्थ यहां शिवजी को ब्रह्महत्या के पाप से मिली थी मुक्ति

Thu, 15 Sep 2022 09:38 AM IST
विनोद शुक्ला धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: विनोद शुक्ला Updated Thu, 15 Sep 2022 09:38 AM IST
सार

पितरों की मुक्ति के लिए बद्रीनाथ धाम में स्थित ब्रह्मकपाल में पिंड दान किया जाता है। स्कन्द पुराण के अनुसार इस पवित्र स्थान को गया से आठ गुना अधिक फलदाई पितृ कारक तीर्थ कहा गया है। यहां विधिपूर्वक पिंडदान करने से पितरों को नरक लोक से मोक्ष मिल जाता है।

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pitru paksha shradh 2022 know importance of badrinath dham brahma kapal for pind daan
pitru paksha 2022: धार्मिक मान्यता है कि पितृ दोष के कारण व्यक्ति के जीवन में सदैव परेशानी,संकट और जीवन में संघर्ष बने रहते हैं। इसलिए इस दोष का निवारण बहुत आवश्यक बताया गया है। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

सनातन धर्म में श्राद्धपक्ष का बहुत महत्व है। पितरों के लिए समर्पित ये पक्ष भाद्रपद मास की पूर्णिमा से लेकर आश्विन मास की अमावस्या तक मनाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि इन दिनों पितृ,पितृलोक से मृत्यु लोक में अपने वंशजों से सूक्ष्मरूप में मिलने आते हैं और हम उनके सम्मान में अपनी सामर्थ्यनुसार उनका स्वागत-सत्कार करते हैं। इसके परिणामस्वरूप सभी पितृ अपनी पसंद का भोजन व सम्मान पाकर प्रसन्न व संतुष्ट होकर परिवार के सदस्यों को स्वास्थ्य, दीर्घायु, वंशवृद्धि व अनेक प्रकार के आशीर्वाद देकर पितृलोक लौट जाते हैं। धार्मिक मान्यता है कि पितृ दोष के कारण व्यक्ति के जीवन में सदैव परेशानी, संकट और जीवन में संघर्ष बने रहते हैं। इसलिए इस दोष का निवारण बहुत आवश्यक बताया गया है।

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पितरों के मोक्ष के लिए ब्रह्मकपाल तीर्थ
पितरों की मुक्ति के लिए बद्रीनाथ धाम में स्थित ब्रह्मकपाल में पिंड दान किया जाता है। स्कन्द पुराण के अनुसार इस पवित्र स्थान को गया से आठ गुना अधिक फलदाई पितृ कारक तीर्थ कहा गया है। यहां विधिपूर्वक पिंडदान करने से पितरों को नरक लोक से मोक्ष मिल जाता है। साथ ही परिजनों को भी पितृदोष मुक्ति मिल जाती है। इसीलिए ब्रह्मकपाल को पितरों की मोक्ष प्राप्ति का सर्वोच्च तीर्थ कहा गया है। ग्रंथों में उल्लेख है कि ब्रह्मकपाल में पिंडदान करने के बाद फिर कहीं पिंडदान की जरूरत नहीं रह जाती।
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ऐसे हुई पिंडदान की शुरुआत
पुराणों के अनुसार ब्रह्माजी जब स्वयं के द्वारा उत्पन्न सरस्वती के सौंदर्य पर मोहित हो गए तो शिवजी को भयंकर क्रोध आ गया और उन्होंने अपने त्रिशूल से ब्रह्माजी का पांचवां सिर धड़ से अलग कर दिया। ब्रह्मा का यह सिर शिव के त्रिशूल पर चिपक गया और उन्हें ब्रह्म हत्या का पाप भी लग गया। ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्ति के लिए भगवान शिव अनेक तीर्थ स्थलों पर गए,लेकिन उन्हें ब्रह्म हत्या के घोर पाप से मुक्ति नहीं मिली,निराश होकर वह अपने धाम कैलास लौटने लगे। इसी दौरान जब भोलेनाथ  बद्रिकाश्रम के पास अलकनंदा नदी में स्नान करने के बाद,बद्रीनाथ धाम की ओर बढ़ रहे थे तो वहां से कुछ दूर पहले अचानक एक चमत्कार हुआ। ब्रह्माजी का पांचवां सिर उनके हाथ से वहीं गिर गया। जिस स्थान पर वह सिर गिरा,वही स्थान ब्रह्मकपाल कहलाया और इसी स्थान पर शंकरजी को ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्ति मिली।
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पांडवों को गोत्र हत्या के पाप से मिली मुक्ति
श्रीमदभागवत महापुराण में उल्लेख है कि महाभारत के युद्ध अपने ही बंधु-बांधवों की हत्या करने पर पांडवों को गोत्र हत्या का पाप लगा था। गोत्र हत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए स्वर्गारोहिणी यात्रा पर जाते हुए पांडवों ने ब्रह्मकपाल में ही अपने पितरों को तर्पण किया था। अलकनंदा नदी के तट पर ब्रह्माजी के सिर के आकार की शिला आज भी विद्यमान है।

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