Navratri 2020: सात शक्तिपीठ यहां के दर्शन से हर मनोकामना होती है पूर्ण
भारतीय संस्कृति में मानव जीवन के लक्ष्य भौतिक सुख तथा आध्यात्मिक आनंद की प्राप्ति के लिए अनेक देवी देवताओं की पूजा-अर्चना का विधान है जिनमें माँ दुर्गा शक्ति की उपासना प्रमुख है। भगवती दुर्गा की पूजा वैदिक काल से चली आ रही है। विभिन्न युगों में विविध रूपों को धारण करने वाली भगवती दुर्गा के अवतरण का मुख्य उद्धेश्य समाज व राष्ट्र को अव्यवस्थित करने वाली आसुरी शक्तियों का दमन कर प्रजा के हदृय में दया, धर्म, धैर्य, विद्या, बुद्धि, क्षमा और अक्रोध रूपी धर्म को धारण कराना है।
देवी दुर्गा के नौ रूप है- शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री है। शास्त्रों में उल्लेख आता है कि जहाँ-जहाँ माता सती के अंग के टुकड़े, धारण किए वस्त्र या आभूषण गिरे, वहां-वहां 51 शक्तिपीठ अस्तित्व में आए। आप में से अधिकांश लोग माता के शक्तिपीठों का दर्शन कर चुके होंगे या पुराणों आदि के माध्यम से परिचित होंगे। कुछ लोगों ने नवरात्रि में या इसके बाद वहां दर्शन, अर्चना करके अपनी मनौती मांगी होगी। आइए जानते हैं शुरू के 7 शक्तिपीठों के बारे में...
1. किरीट शक्तिपीठ
देवीपुराण के अनुसार माता के पहले और जागृत शक्तिपीठ जिसे किरीट शक्तिपीठ के नाम से जाना जाता है पश्चिम बंगाल के हुगली नदी के तट के लालबाग कोट पर स्थित है। यहां सती माता का किरीट यानी शिराभूषण या मुकुट गिरा वही स्थल आज किरीट माता के शक्तिपीठ के नाम से जाना जाता है। यहां की शक्ति विमला अथवा भुवनेश्वरी तथा भैरव संवर्त है।
2. कात्यायनी शक्तिपीठ
वृन्दावन, मथुरा के भूतेश्वर में स्थित है कात्यायनी वृन्दावन शक्तिपीठ जहां सती का केशपाश गिरा था। यहां की शक्ति देवी कात्यायनी हैं तथा भैरव भूतेश है। यहां के दर्शन करने से अविवाहित कन्याओं को सुयोग्य वर की प्राप्ति होती है।
3 .करवीर शक्तिपीठ
यह शक्तिपीठ महाराष्ट्र के कोल्हापुर में स्थित है। यहाँ माता सती का 'त्रिनेत्र' गिरा था। यहाँ की शक्ति महिषासुरमर्दनी तथा भैरव क्रोधशिश हैं। यहां महालक्ष्मी का निज निवास माना जाता है। करवीर में स्थित महालक्ष्मी का यह मंदिर अति प्राचीन है, इसकी वास्तु रचना श्रीयंत्र पर है। मत्स्यपुराण के अनुसार इस शक्तिपीठ के दर्शन से ही सारे पाप धुल जाते हैं।
4 .श्री पर्वत शक्तिपीठ
यह शक्तिपीठ हिन्दुओं के प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों में से एक है। श्री पर्वत शक्तिपीठ जम्मू-कश्मीर के लद्दाख क्षेत्र में स्थित है। यह मंदिर माता दुर्गा को समर्पित है तथा इस मंदिर का नाम प्राचीन सिद्धपीठ में आता है। यहाँ देवी सती का दक्षिण तल्प यानि कनपटी गिरी थी। इस मंदिर में शक्ति को देवी सुन्दरी के रूप पूजा जाता है और भैरव को सुन्दरानन्द के रूप में पूजा जाता है।
विशालाक्षी शक्तिपीठ मंदिर उत्तर प्रदेश के वाराणसी शहर में काशी विश्वनाथ मंदिर से कुछ दूरी पर पतित पावनी गंगा के तट पर स्थित मीरघाट( मणिकर्णिका घाट) पर है।मान्यता है कि जब भगवान शिव वियोगी होकर सती के मृत शरीर को अपने कंधे पर रखकर इधर-उधर घूम रहे थे, तब भगवती के दाहिने कान की मणि इसी स्थान पर गिरी थी। इसलिए इस जगह को 'मणिकर्णिका घाट' भी कहते हैं। यहां की शक्ति विशालाक्षी तथा भैरव कालभैरव हैं।
6 .गोदावरी तट शक्तिपीठ
प्रसिद्ध 'गोदावरी तट शक्तिपीठ' आन्ध्र प्रदेश के 'कुब्बूर' में गोदावरी नदी के तट पर स्थित है। यह शक्तिपीठ जहां पर सती के "वामगण्ड" (बायाँ गाल) का निपात हुआ था। इस शक्तिपीठ की शक्ति 'विश्वेश्वरी' या 'रुक्मिणी' तथा शिव 'दण्डपाणि' हैं।
7 .शुचीन्द्रम शक्तिपीठ
यह शक्तिपीठ तमिलनाडु में कन्याकुमारी के 'त्रिसागर' संगम स्थल पर स्थित है। यहाँ सती के 'ऊर्ध्वदंत' गिरे थे। यहाँ की शक्ति 'नारायणी' तथा भैरव 'संहार या 'संकूर' हैं। मान्यता है कि यहाँ देवी अब तक तपस्यारत हैं। शुचींद्रम क्षेत्र को ज्ञानवनम् क्षेत्र भी कहते हैं। महर्षि गौतम के शाप से इंद्र को यहीं मुक्ति मिली थी, वह शुचिता (पवित्रता) को प्राप्त हुए, इसीलिए इसका नाम शुचींद्रम पड़ा।