Lord Ganesha Puja: भगवान गणेश की पूजा में दूर्वा घास क्यों है जरूरी? जानिए कथा और महत्व
- भगवान गणेश की पूजा-आराधना में दूर्वा चढ़ाने से सभी तरह के सुख और संपदा में वृद्धि होती है। बिना दूर्वा के भगवान गणेश की पूजा अधूरी मानी जाती है।
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विस्तार
हिंदू धर्म शास्त्रों के अनुसार सप्ताह के सात दिन किसी न किसी देवी या देवता की पूजा-आराधना का दिन होता है। बुधवार का दिन विघ्नहर्ता भगवान गणेश की पूजा अर्चना करने का विधान है। धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान गणेश की पूजा करने से सभी दुख दूर हो जाते हैं। गणेश पूजा से सुख,समृद्धि और बुद्धि की प्राप्ति होती है। भगवान गणेश को भोग में मोदक और दूर्वा विशेष रूप से चढ़ाई जाती है। बिना दूर्वा के भगवान गणेश की पूजा को अधूरा माना जाता है। आइए जानते हैं आखिर क्यों भगवान गणेश को दूर्वा चढ़ाया जाता है। क्या है इसके पीछे की कथा...
क्या है कथा
पौराणिक कथा के अनुसार अनलासुर नाम का एक राक्षस हुआ करता था। अनलासुर चारो तरफ आतंक फैला रखा था। इस दैत्य के आंतक से सारे देवी-देवता और ऋषि-मुनि बहुत ही परेशान थे। अनलासुर के सामने जो पड़ता वह उनको सीधे निगल जाता। कोई भी देवता या मुनि अनलासुर को मार नहीं पा रहे थे। तब सभी देवता मिलकर अनलासुर के आंतक से त्रस्त होकर भगवान गणेश की शरण में गए। भगवान गणेश ने अनलासुर को युद्ध में हराकर उसे निगल लिया था। अनलासुर को निगलने के कारण भगवान गणेशजी के पेट में बहुत जलन होने लगी थी। उनकी इस जलन को शांत करने के लिए मुनियों ने उन्हें खाने के लिए 21 गांठ की दूर्वा घास खाने में दी। इसे खाते ही भगवान गणेश के पेट की जलन शांत हो गई। तभी से भगवान गणेश की पूजा में उन्हें दूर्वा चढ़ाई जाने लगी।
भगवान गणेश की पूजा-आराधना में दूर्वा चढ़ाने से सभी तरह के सुख और संपदा में वृद्धि होती है। बिना दूर्वा के भगवान गणेश की पूजा अधूरी मानी जाती है। पूजा में दूर्वा का जोड़ा बनाकर भगवान को चढ़ाया जाता है। दूर्वा घास के 11 जोड़ों को भगवान गणेश को चढ़ाना चाहिए। दूर्वा को चढ़ाने के लिए किसी साफ जगह से ही दूर्वा घास को तोड़ना चाहिए। गंदी जगहों से कभी भी दूर्वा घास को नहीं तोड़ना चाहिए। दूर्वा चढ़ाते समय गणेशजी के 11 मंत्रों का जाप करना चाहिए।
ऊँ गं गणपतेय नम: ,ऊँ गणाधिपाय नमः , ऊँ उमापुत्राय नमः ,ऊँ विघ्ननाशनाय नमः ,ऊँ विनायकाय नमः , ऊँ ईशपुत्राय नमः , ऊँ सर्वसिद्धिप्रदाय नमः , ऊँएकदन्ताय नमः , ऊँ इभवक्त्राय नमः, ऊँ मूषकवाहनाय नमः, ऊँ कुमारगुरवे नमः