फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Spirituality ›   Religion ›   know why muslims celebrate eid milad un nabi

ईद-ए-मिलाद-उन-नबी 2018 : जानें अल्लाह के पैगंबर की याद में क्यों मनाया जाता है ये पर्व

Tue, 20 Nov 2018 01:56 PM IST
प्रो. अख्तरुल वासे
प्रो. अख्तरुल वासे Updated Tue, 20 Nov 2018 01:56 PM IST
विज्ञापन
know why muslims celebrate eid milad un nabi
ईद-ए-मिलाद-उन-नबी

रबी उल अव्वल इस्लामी कैलेंडर का वो महीना है, जिसकी 12 तारीख को पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब का मक्के में बनी हाशिम के परिवार में जन्म हुआ। उनकी मां का नाम बीबी आमिना था और पिता का नाम अब्दुल्लाह था। उनके पिता का देहांत उनके जन्म से पूर्व ही हो गया था। इसलिए उनकी देखरेख उनकी मां ने की। इसके बाद उनकी मां का भी जल्दी देहांत हो जाने के कारण उनके दादा ने उनको पाला पोसा।

विज्ञापन


कम उम्र में उठ गया था अपनों का साया
दादा भी उनकी कम आयु में इस दुनिया से चले गये और उनके चाचा अबु तालिब ने उन्हें अपने संरक्षण में ले लिया। बचपन से ही हजरत मोहम्मद एक निहायत शरीफ, संयम से काम लेने वाले और बुरी बातों से दूर रहने वाले बच्चों में जाने गये। बड़े होकर भी पूरे मक्के के समाज में उनको सादिक और अमीन के नाम से जाना और पहचाना गया। जब वो 25 साल के थे, तो मक्के की बड़ी व्यवसायी और उनसे उम्र में 15 साल बड़ी हजरत ख़दीजा ने विवाह का प्रस्ताव दिया, जो उन्होंने कुबूल कर लिया और इस तरह वो दोनों पति—पत्नी के रिश्ते में बंध गये।
विज्ञापन


जब ईश्वर ने उन्हें अपना बनाया देवदूत
40 साल की आयु में उन्हें ईश्वर ने अपना दिव्यदूत बना दिया और उस समय जब उन्हें ये संदेश मिला और उपाधि दी गई तो उस वक्त मक्के से थोड़ी दूर नूरनामी पहाड़ पर स्थित हिरा नामी गुफा में ध्यान-ज्ञान में लगे हुए थे। उन पर जो पहला दिव्य संदेश (पहली वही) ईश्वर की तरफ से अवतरित हुई थी, वो थी — ''पढ़ो अपने पैदा करने वाले के नाम से, जिसने तुम्हें पैदा किया, खून की एक फुटकी से। तुम्हारा पैदा करने वाला बहुत बड़ाई वाला है। उसने तुम्हें ज्ञान और कलम दिया और वो सिखाया जो तुम नहीं जानते थे।'' जैसा कि हमने देखा इस पहले दिव्य संदेश में मोहम्मद साहब को सबसे ज्यादा जिस बात पर ईश्वर की तरफ से बल दिया गया, वो पढ़ने-पढ़ाने पर यानी शिक्षा की प्राप्ति है।
विज्ञापन
विज्ञापन


इन्होंने सबसे पहले कुबूल किया मोहम्मद साहब का संदेश
मोहम्मद साहब ने जब एक ईश्वरवाद और मानवता के एक होने का संदेश दिया तो उनका जबरदस्त विरोध हुआ। लेकिन ये नि:संदेह बड़ी उपलब्धि थी कि जो मोहम्मद साहेब के जितने निकट था, उसने उतने ही जल्दी उनके दिये संदेश को कुबूल किया और उन पर ईमान लाया। जिसमें सबसे पहले उनकी पत्नी बीबी ख़दीजा, उनके बचपन से चले आ रहे मित्र अबू बक्र, उनके चचेरे भाई हजरत अली, जो बचपन से उनके संरक्षण में थे और उनके सेवक जैद शामिल थे।

इस तरह पाई मक्का पर विजय
मक्के वालों का जब अत्याचार बढ़ा तो 13 साल के बाद मोहम्मद साहेब यसरब यानी वर्तमान में मदीना वालों का निमंत्रण पर, वहां चले गये। हालांकि, वहां पर भी मक्के वालों ने उन्हें चैन से बैठने नहीं दिया और कई बार मदीने पर आक्रमण किया और हर बार पराजित ही हुये। ये कम दिलचस्प बात नहीं कि जितनी जंगे हुईं वो मदीने के करीब और सुलह और शांति की संधि मक्के के निकट हुई। इससे पता चलता है कि मोहम्मद साहेब किसी तरह जंग नहीं चाहते थे। तकरीबन मदीने में 8 साल रहने के बाद मोहम्मद साहब ने मक्के का रुख किया और उस पर विजय पा ली, लेकिन बगैर किसी हिंसा, बदले की भावना या अपने विरोधियों को किसी तरह की यातना दिये बगैर यह सब कुछ किया।

मोहम्मद साहब का संदेश
मोहम्मद साहब ने जो मूल संदेश दिया और जो उन्हें मुख्यत: अल्लाह की तरफ से वही के रूप में प्राप्त हुआ था, वो था अल्लाह एक है और उसके सिवा कोई पूजा, अर्चना और उपासना के योग्य नहीं है। कुरान अल्लाह का अंतिम दिव्य संदेश है। हम सबको एक दिन मरने के बाद फिर जिंदा होना है और अपने पैदा करने वाले के सामने अपने कर्मों का लेखा-जोखा पेश करना होगा। जिसके आधार पर स्वर्ग और नर्क का फैसला किया जाएगा। कुरान का यह संदेश हमें हजरत मोहम्मद के द्वारा ईश्वर ने दिया कि अल्लाह समस्त सृष्टि का रचयिता, हमारा पैदा करने वाला और पालनहार है। अल्लाह अतिकृपाशील और दयावान है। मोहम्मद साहब सारी सृष्टि के लिए और समस्त मानवता के लिए कृपाशील हैं।

मानवता पर दिया जोर
इसमें बताया गया कि धर्म में कोई जोर-जबरदस्ती नहीं है। कुरान ने ये भी ऐलान किया कि तुम्हारा धर्म तुम्हारे लिए है और मेरा धर्म मेरे लिये है। पुरुष और महिला दोनों में समानता है। दोनों एक दूसरे के लिए लिबास की तरह हैं। कुरान में यह भी कह दिया गया कि किसी के खुदाओं को बुरा मत कहो एवं किसी एक निर्दोष या असहाय व्यक्ति की जान लेना सारी मानवता को मार देने के बराबर है और किसी एक निर्दोष व्यक्ति की जान बचाना सारी मानवता की जान बचाने की बराबर है। ऐसे में हजरत मोहम्मद साहब का जन्मदिन किसी प्रकार के बल के प्रदर्शन के लिए नहीं बल्कि उनके उस संदेश को जो समस्त मानवता के हित में है, शालीनता के साथ प्रचार-प्रसार करते हुए लोगों तक पहुंचाने के लिए है।


- लेखक जाकिर हुसैन, इंस्टीट्यूट आफ इस्लामिक स्टडी, जामिया मिल्लिया इस्लामिया दिल्ली के पूर्व निदेशक और वर्तमान में जोधपुर, मौलाना आजाद विश्वविद्यालय के अध्यक्ष हैं। 

विज्ञापन
विज्ञापन
सबसे विश्वसनीय हिंदी न्यूज़ वेबसाइट अमर उजाला पर पढ़ें आस्था समाचार से जुड़ी ब्रेकिंग अपडेट। आस्था जगत की अन्य खबरें जैसे पॉज़िटिव लाइफ़ फैक्ट्स,स्वास्थ्य संबंधी सभी धर्म और त्योहार आदि से संबंधित ब्रेकिंग न्यूज़।
 
रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें अमर उजाला हिंदी न्यूज़ APP अपने मोबाइल पर।
Amar Ujala Android Hindi News APP Amar Ujala iOS Hindi News APP
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed