Kartik Maas Katha: कार्तिक मास में जरूर पढ़ें यह कथा, मिलेगी भगवान विष्णु और लक्ष्मी की अपार कृपा
Kartik Maas 2025: कार्तिक मास में विष्णु पूजा, तुलसी सेवा और दीपदान से सुख-समृद्धि मिलती है। प्रतिदिन कथा पाठ से भगवान की कृपा बनी रहती है और घर में खुशहाली आती है।
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Kartik Maas Ki Katha: कार्तिक मास भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी को प्रसन्न करने का सबसे शुभ समय माना जाता है। इस मास में सुबह-सुबह स्नान करके भगवान विष्णु और भगवान श्रीकृष्ण की विधिपूर्वक पूजा करने का विशेष महत्व है। तुलसी की पूजा और दीपदान करने से भी घर में सकारात्मक ऊर्जा और शांति का वातावरण बनता है। यह मास अपने आप में आध्यात्मिक ऊर्जा का खजाना है, जो भक्तों को जीवन में सुख-शांति और समृद्धि प्रदान करता है।
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कार्तिक मास में कथा पढ़ना भी अत्यंत आवश्यक होता है क्योंकि इससे भगवान की कृपा बनी रहती है और परिवार में खुशहाली आती है। जैसे ही यह मास 7 अक्टूबर से शुरू हो रहा है, सभी को रोजाना पूजा में इस पावन कथा का पाठ अवश्य करना चाहिए। ऐसा करने से पूरे वर्ष आपके घर में धन-वैभव और सौभाग्य का वास होता है, जिससे जीवन के हर पहलू में उन्नति होती है।
कार्तिक मास की कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक नगर में एक ब्राह्मण दंपत्ति रहता था। वे रोजाना गंगा और यमुना नदियों तक सात कोस दूर स्नान करने जाते थे। इतनी दूरी तय करने से ब्राह्मणी बहुत थक जाती थी। एक दिन उसने अपने पति से कहा कि यदि उनका कोई पुत्र होता तो कितना अच्छा होता, क्योंकि बेटे की बहू घर के काम संभालती और उनके आने पर खाना बना कर रखती। पति ने उसकी बात सुनकर कहा कि वह उसके लिए बहू लेकर आता है। उसने एक पोटली में आटा और कुछ मोहरे रखवा कर उसे दिया और वह यात्रा पर निकल पड़ा।
रास्ते में ब्राह्मण को यमुना के किनारे खेलती हुई सुंदर लड़कियां दिखीं, जिनमें से एक ने कहा कि वह अपना घर रखना चाहती है। ब्राह्मण ने उसे बहू बनाने का निश्चय किया और उससे कहा कि कार्तिक मास चल रहा है इसलिए वह खाना उसके घर ही खाएगा, पर उसकी मां से कहे कि वह उसके लिए आटा छानकर रोटी बनाए। लड़की की मां ने आटा छाना शुरू किया तो मोहरे आटे में निकल आए। यह देखकर वह सोचने लगी कि जिनके आटे में मोहरे हैं, उनके घर में भी धन-समृद्धि होगी। इसके बाद ब्राह्मण ने उस लड़की से शादी कर घर ले आया।
ब्राह्मणी को बहू देखकर पहले शक हुआ, लेकिन बहू ने घर के सारे काम बड़े प्यार से किए। उसने चूल्हे की आग बुझने नहीं दी और मटके में पानी रखा। एक दिन आग बुझ गई, तो बहू घबराकर पड़ोसन के पास गई, जिसने उसे गलत सलाह दी। पड़ोसन के कहने पर बहू ने सास-ससुर का आदर न किया और घर का काम ठीक से नहीं किया। तब सास-ससुर ने उससे नाराज होकर सातों कोठों की चाबी मांग ली।
जब बहू ने कोठे खोले तो वहां अन्न, धन और बर्तन भरे हुए मिले, साथ ही शिवजी, पार्वती माता, गणेशजी, लक्ष्मी माता, तुलसी, गंगा-यमुना और कई देवी-देवता विराजमान थे। एक लड़का चंदन की चौकी पर माला जप रहा था। बहू ने उससे पूछा, तो वह बोला कि वह उसका पति है और उसे दरवाजा तभी खोलना जब उसके माता-पिता आएं। बहू ने उन्हें सम्मान से सत्कार किया।
सास ने बहू से कहा कि गंगा-यमुना घर पर नहीं बहती, तो बहू ने सातवें कोठे का दरवाजा खोला और उन्हें वहां देवताओं, पवित्र तुलसी और बहती गंगा-यमुना के दर्शन कराए। मां ने बेटे को पहचानने के लिए एक कठिन परीक्षा की, जिसमें बेटे ने पूरी ईमानदारी से निभाई। यह देखकर दोनों सास-ससुर बहुत खुश हुए।
यह कथा कार्तिक मास की महत्ता बताती है कि किस प्रकार सच्चे मन से की गई पूजा, कथा और भक्ति से भगवान कार्तिकदेव की कृपा से घर में सुख-शांति, समृद्धि और परिवार की खुशहाली बनी रहती है। कार्तिक मास में इस कथा का पाठ करने से भगवान की विशेष कृपा सभी पर बनी रहती है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह कथा लोक मान्यताओं और धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।