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हजारों वर्षों बाद कामाख्याधाम में दुर्लभ कुंभ योग, असम में ब्रह्मपुत्र नदी में स्नान-ध्यान का योग

Sun, 12 Mar 2023 01:13 PM IST
विनोद शुक्ला धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला Published by: विनोद शुक्ला Updated Sun, 12 Mar 2023 01:13 PM IST
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kamakhya kumbh Rare Kumbh Yoga in Kamakhyadham And Imporatance
kumbh mela - फोटो : अमर उजाला

भारतीय संस्कृति लाखों वर्षों की निरंतरता का अप्रतिम उदाहरण है। सनातन संस्कृति ने जिस धर्म ध्वजा को अनेकानेक संकटों का सामना करते हुए भी सदैव ऊंचा रखा है उसमें कुंभ की परंपरा का विशिष्ट योगदान है। अखंड भारत में विस्तृत तीर्थ, पुरियों, ज्योतिर्लिंगों और शक्तिपीठों के साथ सनातन संस्कृति के महान आर्ष ऋषियों-मनीषियों ने कुंभ के ज्योतिषीय विधान की समाज में स्थापना की और देश की एकता-अखंडता, सौहार्द-समृद्धि, राष्ट्र की सुरक्षा और धर्म की स्थापना में अद्भुत योगदान दिया है। संभवतः कुंभ भारतीय संस्कृति का सबसे विस्तृत और प्रकट प्रारुप है। संपूर्ण पृथ्वी पर किसी एक विचार को लेकर इतनी विशाल संख्या में मानव समाज किसी और अवसर पर एकत्र नहीं होता है। यह जुटान पूरी दुनिया के लिए किसी अचरज से कम नहीं। 

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ज्योतिष में कुंभ का महत्व

  • ऐसे ही एक कुंभ में एक विदेशी पत्रकार ने जानना चाहा कि आखिर इतने लोगों को एक स्थान पर निमंत्रण देकर कैसे बुलाया जाता है। इसका उत्तर सुनकर पत्रकार महोदय अचरज में आ गए। ज्योतिष के जानकार एक विद्वान ने उन्हें बताया कि हमारे यहां कुछ पैसे का एक पतरा-पंचांग होता है जिसमें कुंभ की तिथि पहले ही लिख दी जाती है। सब उसी पंचांग को देखकर स्वंय ही नियत समय पर उल्लिखित स्थान पर आ जाते हैं। 
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  • यहां पंचांग और ज्योतिष का उल्लेख आया है तो यह जानना रोचक है कि शास्त्रों के अनुसार जब सूर्य, चंद्रमा और बृहस्पति एक ही राशि में आते हैं तो ज्योतिष में उसे कुंभ योग कहते हैं। इस अनुसार राशियां 12 हैं, सूर्य का भी 12 स्वरूप माना जाता है और महीने 12 हैं। इस हिसाब से सूर्य, चंद्रमा और वृहस्पति 12 वर्षों में 12 बार ऐसा योग बनाते हैं। 
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शास्त्रों में 12 जगहों पर कुंभ का वर्णन
  • शास्त्र प्रमाण हैं कि ज्योतिषीय गणना के अनुसार किसी समय भारत में 12 स्थानों पर कुंभ पर्व (आयोजन) की व्यवस्था थी। अब जैसे दक्षिण भारत के तमिलनाडु में स्थित कुंभकोणम में कुंभ लगा करता था और इसी कारण उसका नाम ही- 'कुंभकोणम' पड़ा। कुरुक्षेत्र में जब मां सरस्वती अपने वेग के साथ प्रवाहमान रही जब वहां भी कुंभ का आयोजन होता रहा। कालांतर में विदेशी आक्रांताओं के प्रभाव में पूरा देश अस्त-व्यस्त हुआ। सनातन को समाप्त करने की कुटिल चाल चली गयी लेकिन धर्म रूपी जीवनी शक्ति के प्रभाव में इसे समाप्त करना कभी संभव नहीं हुआ। हां इतना अवश्य है कि इसमें विकृति आती, कई परंपराएं लुप्त हुई। 
  • 12 स्थानों की कुंभ की परंपरा भी इन्हीं कारणों से लंबे समय तक लगभग हर स्थान पर गौण हो गयीं। जिन चार स्थानों आज कुंभ की मान्यता मानी जाती हैं - हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन और नासिक में भी कुंभ की परंपरा लगभग लुप्तप्राय हो गयी थी। प्रतापी राजा हर्षवर्धन ने लगभग 1500 वर्ष पूर्व इन स्थानों पर अपनी पूरी शक्ति लगाकर कुंभ की परंपरा को जागृत किया। लेकिन शेष आठ स्थानों पर यह परंपरा लुप्त ही रही। 
  • हजारों वर्षों के बाद मिथिलांचल, बिहार की भूमि के एक संत परंपात्री, अग्निहोत्री परमहंस स्वामी चिदात्मन जी महाराज ने विद्वतजनों से इसका उल्लेख किया तो इसके पुनर्जागरण को लेकर सभी की सहमति बनी। कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विधि, मिथिला विवि और काशी हिन्दू विवि के विद्वानों ने विवि के विद्वत परिषद की बैठक में 12 स्थानों पर कुंभ के पुनर्जागरण की संस्तुति प्रदान की। दरभंगा संस्कृत विवि पंचांग, वैदेही पंचांग, महावीर पंचांग एवं सर्वमंगला पंचांग में कुंभ के शास्त्रोक्त उल्लेख के बाद जन सामान्य को इसकी जानकारी हुई। 

  • आगम शास्त्र के विशिष्ट ग्रंथ रुद्रयामल तंत्र में कुंभ के 12 स्थानों होने का स्पष्ट उल्लेख है। धर्म सम्राट करपात्री जी महाराज ने प्रसिद्ध ग्रंथ 'कुंभ पर्व निर्णय' में  .....12 कुंभों की बात कही है। ज्योतिष की गणना और शास्त्रों का आधार लेकर द्वादश कुंभ पुनर्जागरण अभियान के तहत सर्वप्रथम गंगा तट पर स्थित सिमरियाधाम में वर्ष 2011 में अर्धकुंभ का आयोजन हुआ जो बहुत सफल रहा। यह जानना भी रोचक है कि समुद्र मंथन की केन्द्रीय भूमि के रूप में मिथिलांचल की पुनर्प्रतिष्ठा हुई है। यह भी मान्यता है कि समुद्र मंथन के बाद सिमरियाधाम में ही अमृत का वितरण हुआ। 
  • कुंभ पुनर्जागरण की इसी कड़ी में वर्ष 2013 में जगन्नाथपुरी, 2014 में द्वारिकापुरी, 2016 में रामेश्वरम, 2017 में सिमरियाधाम में महाकुंभ, 2018 में कुरूक्षेत्र में कुंभ, 2019 में गंगासागर, 2020 कुंभकोणम, 2021 ... द्वादश कुंभ पुनर्जागरण के प्रेरणा पुरुष करपात्री अग्निहोत्री परमहंस स्वामी चिदात्मन जी महाराज के आशीर्वाद से यथाशक्ति इन स्थानों पर कुंभ परंपरा के पुनर्जागरण का पावन प्रयास किया गया। इस सभी स्थानों पर स्थानीय विद्वानों और धार्मिक समाज का सुंदर सहयोग प्राप्त हुआ। 
  • इस वर्ष 2023 के चैत्र मास में ऐसा ही योग शक्तिपीठों में सर्वोपरि मां कामाख्याधाम में ब्रह्मपुत्र नदी के समीप है। ढाई दिनों का यह विशेष योग ...... बन रहा है। यह योग ज्योतिषीय गणना पर आधारित और शास्त्रोक्त है। इस योग में जलराशि में स्नान का बड़ा महत्व बताया गया है। यह समय है कि हम अपनी सनातन संस्कृति को फिर से उसके मूल स्वरूप में जागृत करें। धर्मप्रेमी, राष्ट्रप्रेमी और सनातन प्रेमी बंधु-भगिनी राष्ट्र के गौरव की पुनर्स्थापना में अपना अमूल्य योगदान दें यही आह्वान है।          
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