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Dev Uthani Ekadashi 2025: चार महीने की योगनिद्रा के बाद विष्णु भगवान का दिव्य जागरण, जानिए महत्व और पूजाविधि
Sat, 01 Nov 2025 11:54 AM IST
विनोद शुक्ला
धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला
Published by: विनोद शुक्ला
Updated Sat, 01 Nov 2025 11:54 AM IST
सार
Dev Uthani Ekadashi 2025: देवउठनी एकादशी को न केवल भगवान विष्णु के जागरण का दिन माना गया है, बल्कि इसे शुभता और समृद्धि की शुरुआत का प्रतीक भी कहा गया है।
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देवउठनी एकादशी का महत्व
- फोटो : adobe
विस्तार
Dev Uthani Ekadashi 2025: कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को देवउठनी एकादशी या देव प्रबोधिनी एकादशी के रूप में मनाया जाता है। इसे हरि प्रबोधिनी, देवोत्थान या देव जागरण एकादशी भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु चार महीनों की योगनिद्रा से जागते हैं और सृष्टि के कार्यों को पुनः आरंभ करते हैं। इस प्रकार यह दिन शुभ कार्यों के आरंभ का प्रतीक बन जाता है। इस तिथि से ही विवाह, गृहप्रवेश और अन्य मांगलिक कार्यों की शुरुआत करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
देवउठनी एकादशी का पौराणिक महत्व
पौराणिक कथाओं के अनुसार, आषाढ़ शुक्ल एकादशी को भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शैय्या पर योगनिद्रा में चले जाते हैं। यह चार माह का समय चातुर्मास कहलाता है, जिसमें शुभ कार्य स्थगित रहते हैं। कार्तिक शुक्ल एकादशी को जब भगवान विष्णु की निद्रा समाप्त होती है, तब मांगलिक कार्य पुनः आरंभ होते हैं। इसी कारण इस तिथि को देव जागरण तिथि कहा गया है। यह दिन सृष्टि में शुभता और सकारात्मक ऊर्जा के पुनः आगमन का प्रतीक माना जाता है।
देवउठनी एकादशी की पूजा विधि
देवउठनी एकादशी के दिन प्रातःकाल स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण करें और भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र को पूजास्थल पर स्थापित करें। इसके बाद भगवान को पंचामृत से स्नान कराएं, पीले फूल, तुलसी दल, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें। व्रती इस दिन व्रत का संकल्प लेकर निर्जला या फलाहार रहकर पूजा करते हैं। संध्या के समय भगवान विष्णु का जागरण समारोह मनाया जाता है, जिसे देव उठाने की परंपरा कहा जाता है। इसमें विष्णु भगवान के चरणों में दीप जलाकर शंख, घंटा और घड़ियाल बजाकर उनका जागरण किया जाता है। इस दिन का एक विशेष भाग तुलसी विवाह भी है, जिसमें भगवान विष्णु का विवाह तुलसी माता से संपन्न कराया जाता है। यह विवाह धार्मिक दृष्टि से अत्यंत शुभ माना जाता है और इसे करने से दांपत्य जीवन में सुख-शांति आती है। रात्रि में दीपदान करने और भगवान के भजन-कीर्तन का विशेष महत्व बताया गया है।
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देवउठनी एकादशी को न केवल भगवान विष्णु के जागरण का दिन माना गया है, बल्कि इसे शुभता और समृद्धि की शुरुआत का प्रतीक भी कहा गया है। शास्त्रों में उल्लेख है कि जो व्यक्ति इस दिन श्रद्धा और भक्ति से व्रत करता है, उसे समस्त पापों से मुक्ति मिलती है और जीवन में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस दिन तुलसी विवाह करवाने से घर में सौभाग्य और समृद्धि आती है। यह एकादशी व्यक्ति के जीवन में जागृति और नई ऊर्जा का संचार करती है, जिससे जीवन में सकारात्मकता बढ़ती है।
देवउठनी एकादशी का व्रत करने वाले व्यक्ति को पूर्ण सात्विकता बनाए रखनी चाहिए। इस दिन प्याज, लहसुन, मांस, मदिरा और तामसिक आहार का त्याग करना चाहिए। व्रती को मन, वचन और कर्म से शुद्ध रहना चाहिए तथा दिनभर भगवान विष्णु के नाम का स्मरण करते रहना चाहिए।
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देवउठनी एकादशी का पौराणिक महत्व
पौराणिक कथाओं के अनुसार, आषाढ़ शुक्ल एकादशी को भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शैय्या पर योगनिद्रा में चले जाते हैं। यह चार माह का समय चातुर्मास कहलाता है, जिसमें शुभ कार्य स्थगित रहते हैं। कार्तिक शुक्ल एकादशी को जब भगवान विष्णु की निद्रा समाप्त होती है, तब मांगलिक कार्य पुनः आरंभ होते हैं। इसी कारण इस तिथि को देव जागरण तिथि कहा गया है। यह दिन सृष्टि में शुभता और सकारात्मक ऊर्जा के पुनः आगमन का प्रतीक माना जाता है।
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देवउठनी एकादशी की पूजा विधि
देवउठनी एकादशी के दिन प्रातःकाल स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण करें और भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र को पूजास्थल पर स्थापित करें। इसके बाद भगवान को पंचामृत से स्नान कराएं, पीले फूल, तुलसी दल, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें। व्रती इस दिन व्रत का संकल्प लेकर निर्जला या फलाहार रहकर पूजा करते हैं। संध्या के समय भगवान विष्णु का जागरण समारोह मनाया जाता है, जिसे देव उठाने की परंपरा कहा जाता है। इसमें विष्णु भगवान के चरणों में दीप जलाकर शंख, घंटा और घड़ियाल बजाकर उनका जागरण किया जाता है। इस दिन का एक विशेष भाग तुलसी विवाह भी है, जिसमें भगवान विष्णु का विवाह तुलसी माता से संपन्न कराया जाता है। यह विवाह धार्मिक दृष्टि से अत्यंत शुभ माना जाता है और इसे करने से दांपत्य जीवन में सुख-शांति आती है। रात्रि में दीपदान करने और भगवान के भजन-कीर्तन का विशेष महत्व बताया गया है।
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देवउठनी एकादशी का महत्वदेवउठनी एकादशी को न केवल भगवान विष्णु के जागरण का दिन माना गया है, बल्कि इसे शुभता और समृद्धि की शुरुआत का प्रतीक भी कहा गया है। शास्त्रों में उल्लेख है कि जो व्यक्ति इस दिन श्रद्धा और भक्ति से व्रत करता है, उसे समस्त पापों से मुक्ति मिलती है और जीवन में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस दिन तुलसी विवाह करवाने से घर में सौभाग्य और समृद्धि आती है। यह एकादशी व्यक्ति के जीवन में जागृति और नई ऊर्जा का संचार करती है, जिससे जीवन में सकारात्मकता बढ़ती है।
Devuthani Ekadashi 2025: देवउठनी एकादशी आज, यहां जानें पूजन विधि से लेकर शुभ मुहूर्त तक सबकुछ
व्रत के नियमदेवउठनी एकादशी का व्रत करने वाले व्यक्ति को पूर्ण सात्विकता बनाए रखनी चाहिए। इस दिन प्याज, लहसुन, मांस, मदिरा और तामसिक आहार का त्याग करना चाहिए। व्रती को मन, वचन और कर्म से शुद्ध रहना चाहिए तथा दिनभर भगवान विष्णु के नाम का स्मरण करते रहना चाहिए।
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