Dattatreya Jayanti 2020: जानिए कौन है भगवान दत्तात्रेय, कैसे हुआ इनका जन्म
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मार्गशीर्ष माह (अगहन) में शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को भगवान दत्तात्रेय की जयंती मनाई जाती है। इस बार दत्तात्रेय जयंती 29 दिसंबर को मनाई जाएगी। दत्तात्रेय भक्तों के स्मरण करने मात्र से उनकी सहायता हेतु उपस्थित होते हैं। इन्हें तीनों देवो का अवतार माना जाता है। ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों देवों की शक्तियां भगवान दत्तात्रेय में समाहित हैं, इनकी छःभुजाएं और तीनमुख हैं। इनके पिता ऋषि अत्रि और माता अनुसूया हैं। भगवान दत्तात्रेय की जयंती पर मंदिरों में विशेष रूप से पूजा-अर्चना की जाती है। तो चलिए जानते हैं कि इनका जन्म कैसे हुआ।
एक बार नारद जी पार्वती जी के पास पहुंचे और अत्रि ऋषि की पत्नी देवी अनुसूया के पतिव्रत धर्म का गुणगान करने लगे। नारद जी देवियों का गर्व चूर करने के लिए बारी-बारी से तीनों देवियों के पास गए और देवी अनुसूया के पतिव्रत धर्म का गुणगान करन लगे। तीनों देवीयों को सती अनुसूया की प्रशंसा सुनना बिलकुल भी रास नहीं आया। अहंकार में आकर वे सती अनुसूया से इर्ष्या करने लगी। जब नारद जी वहां से चले गअ तब देवियां, सती अनुसूया के पतिव्रत धर्म को भंग करने की बात करने लगी। उन्होंने अपने पतियों, ब्रह्मा, विष्णु और महेश से अनुसूया का पतिव्रत तोड़ने को कहा। अतं में तीनों देवों को अपनी पत्नियों के सामने हार माननी पड़ी। जिसके बाद वह तीनों ही देवी अनुसूया की कुटिया के सामने एक साथ भिक्षुक का वेश धारण करके गए।
अपने द्वार पर भिक्षुक देखकर देवी अनुसूया उन्हें भिक्षा देने लगी। भिक्षुक का वेश धारण किए हुए देवों नें भिक्षा लेने से इंकार कर दिया। उन्होंने भोजन करने की इच्छा प्रकट की। देवी अनुसूया ने अतिथि सत्कार को अपना धर्म मानते हुए उनकी बात मान ली और उनके लिए प्रेम भाव से भोजन की थाली परोस लाई। तभी उनके पतिधर्म की परीक्षा लेने के लिए तीनों देवों ने भोजन करने से इन्कार करते हुए कहा कि जब तक आप नग्न होकर भोजन नहीं परोसेगी, तब तक हम भोजन नहीं करेगें। देवी अनुसूया यह सुनते ही पहले तो स्तब्ध रह गई और अत्यंति क्रोधित हो गई।
लेकिन अपने पतिव्रत धर्म के बल पर उन्होंने तीनो की मंशा जान ली। जिसके पश्चात देवी ने अपने पति ऋषि अत्रि के चरणों का जल तीनों देवों पर छिड़क दिया। जल छिड़कते ही तीनों बालरूप में आ गए। तीनों देवों के बालक बन जाने के बाद देवी अनुसूया नें उन्हें भरपेट भोजन कराया। जिसके बाद वे उन्हें पालने में लिटाकर अपने प्रेम-वात्सल्य से मां की तरह उन्हें पालने लगी। धीरे-धीरे करके दिन बीतने लगे। जब बहुत दिनों के पश्चात भी ब्रह्मा, विष्णु और महेश घर नहीं लौटे तब तीनों देवियों को अपने पतियों की चिन्ता सताने लगी।
तीनों देवियों को अपनी भूल का अहसास हुआ, जिसके बाद वह तीनों ही माता अनुसूया के समक्ष गई और अपनी भूल मानते हुए क्षमा मांगी, एवं उनके पतिव्रत को प्रणाम किया, लेकिन माता अनुसूया ने कहा कि इन तीनों ने मेरा दूध पीया है, इसलिए इन्हें बालरूप में ही रहना ही होगा। यह सुनने के पश्चात तीनों देवों ने अपने-अपने अंश को मिलाकर एक नया अंश पैदा किया। इसका नाम दत्तात्रेय रखा गया। इनके तीन सिर तथा छ: हाथ थे। तीनों देवों को एकसाथ बालरूप में दत्तात्रेय के अंश में पाने के बाद माता अनुसूया ने अपने पति अत्रि ऋषि के चरणों का जल तीनों देवो पर छिड़का और उन्हें पूर्ववत रुप प्रदान कर दिया।