रामलला प्राण प्रतिष्ठा: रामचरितमानस में छिपा है सतत विकास का सार
काले वर्षति पर्जन्य: सुभिक्षंविमला दिश:
ह्रष्टपुष्टजनाकीर्ण पुरू जनपदास्तथा।
नकाले म्रियते कश्चिन व्याधि: प्राणिनां तथा।
नानर्थो विद्यते कश्चिद् पाने राज्यं प्रशासति।
यानी जिस शासन में बादल समय से बरसते हों। सदा सुभिक्ष रहता हो सभी दिशाएँ निर्मल हों। नगर और जनपद ह्रष्ट पुष्ट मनुष्यों से भरे हों। वहॉं अकाल मृत्यु न होती हो, प्राणियों में रोग न होता हो। किसी प्रकार का अनर्थ न हो। पूरी धरा पर एक समन्वय और सरलता का वातावरण हो। प्रकृति के साथ तादात्म्य ही रामराज्य है। इतना ही नहीं 16वीं सदी तुलसीदास भी कह गए हैं-
“राम राज्य: नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना, नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना”
राम राज्य में कोई दरिद्र, दुखी और दीनहीन नहीं था| न कोई मूर्ख है और न शुभ लक्षणों से हीन ही था|
दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा
सब नर करहिं परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती
'राम राज्य' में किसी को दैहिक, दैविक और भौतिक तकलीफ नहीं थी। सब मनुष्य परस्पर प्रेम करते थे और वेदों में बताई हुई नीति (मर्यादा) में तत्पर रहकर अपने-अपने धर्म का पालन करते हैं।
फूलहिं फरहिं सदा तरु कानन।
रहहिं एक सँग गज पंचानन॥
खग मृग सहज बयरु बिसराई।
सबन्हि परस्पर प्रीति बढ़ाई॥
वनों में वृक्ष सदा फूलते और फलते हैं। हाथी और सिंह (वैर भूलकर) एक साथ रहते हैं। पक्षी और पशु सभी ने स्वाभाविक वैर भुलाकर आपस में प्रेम बढ़ा लिया है॥
तुलसी बाबा ने रामचरितमानस में विकसित व्यवस्था के जिस शिखर का जिक्र किया है उसके आगे यूएन के सतत विकास लक्ष्य कहीं नहीं ठहरते हैं॥ रामचरितमानस में इन लक्ष्यों का सिलसिलेवार ब्यौरा है॥
सतत विकास लक्ष्य (SDGs) विश्वव्यापी प्रगति के लिए एक नीति-निर्धारण का कार्यक्रम है, जिसमें सामाजिक, आर्थिक, और पर्यावरणीय संतुलन पर जोर दिया गया है। इसी प्रकार, तुलसीदास की 'रामचरितमानस' भी इन्हीं प्रकार की विचारधाराओं को आगे बढ़ाती है, जिसमें प्राचीन भारतीय समाज की जीवनशैली और मूल्यों का गहन चित्रण है।
लक्ष्य 1: गरीबी का अंत
"तुम्ह दीन बन्धु दुःख त्यागू, तुम रक्षक काकु न डरायऊ।" (बालकांड)
इस चौपाई के माध्यम से भगवान राम की गरीबों के प्रति करुणा और संरक्षण की भावना को दर्शाया गया है, जो SDG 1 के अनुरूप है। यहां राम का चरित्र गरीबी के खिलाफ संघर्ष का प्रतीक है।
जातरूप मनि रचित अटारीं। नाना रंग रुचिर गच ढारीं॥
पुर चहुँ पास कोट अति सुंदर। रचे कँगूरा रंग रंग बर॥2॥
(दिव्य) स्वर्ण और रत्नों से बनी हुई अटारियाँ हैं। उनमें (मणि-रत्नों की) अनेक रंगों की सुंदर ढली हुई फर्शें हैं। नगर के चारों ओर अत्यंत सुंदर परकोटा बना है, जिस पर सुंदर रंग-बिरंगे कँगूरे बने हैं
लक्ष्य 2: शून्य भूख
"जौं मैं भूखन फल मूलहि खाई।" (अयोध्याकांड)
भरत की तपस्वी जीवनशैली और सादगी इस लक्ष्य के साथ सामंजस्य स्थापित करती है। यह दिखाता है कि किस प्रकार सादगी और स्वल्पाहार से भूख और कुपोषण से मुकाबला किया जा सकता है।
लता बिटप मागें मधु चवहीं। मनभावतो धेनु पय स्रवहीं॥
ससि संपन्न सदा रह धरनी। त्रेताँ भइ कृतजुग कै करनी॥3॥
बेलें और वृक्ष माँगने से ही मधु (मकरन्द) टपका देते हैं। गायें मनचाहा दूध देती हैं। धरती सदा खेती से भरी रहती है। त्रेता में सत्ययुग की करनी (स्थिति) हो गई
लक्ष्य 3: स्वास्थ्य और कल्याण
"राम कृपा भये सब काजू। स्वस्थ देह धरि धीर अजू।।" (सुंदरकांड)
हनुमान का दुष्कर कार्यों को संपन्न करने की क्षमता और स्वस्थ जीवनशैली, SDG 3 के साथ गहरा संबंध रखती है। यह दर्शाता है कि स्वास्थ्य और कल्याण कैसे समाज के प्रत्येक सदस्य के लिए महत्वपूर्ण हैं।
लक्ष्य 4: गुणवत्तापूर्ण शिक्षा
"गुरु गृह गई पढ़न रघुराई।" (बालकांड)
यह चौपाई शिक्षा के महत्व को दर्शाती है, जहां गुरुकुल में शिक्षा प्राप्त कर राम जीवन के लिए आवश्यक ज्ञान और कौशल सीखते हैं।
लक्ष्य 5: लैंगिक समानता
"जानकी सहित राम कर दुलारी।" (सुंदरकांड)
सीता की प्रतिष्ठा और उनके चरित्र की मजबूती, लैंगिक समानता और महिलाओं के सशक्तिकरण के SDG लक्ष्य 5 की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
लक्ष्य 6-15: पर्यावरण और सामाजिक लक्ष्य
"नगर फल फूल नाना बिधि खाई।" (अरण्यकांड)
यहाँ वर्णित प्राकृतिक सौंदर्य और संसाधनों का संतुलित उपयोग, SDGs के तहत पर्यावरण और सामाजिक लक्ष्यों के साथ मेल खाता है।
लक्ष्य 16: शांति और न्याय
"धर्म हेतु सागर तरि करि।" (युद्धकांड)
यहाँ राम के धर्म और न्याय के लिए किए गए संघर्ष का वर्णन है, जो SDG 16 के उद्देश्यों से मेल खाता है।
लक्ष्य 17: लक्ष्यों के लिए साझेदारी
"रघुकुल रीति सदा चलि आई।" (बालकांड)
राम की विभिन्न राजाओं, ऋषियों, और जीव-जंतुओं के साथ साझेदारी, SDG 17 की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
लेखक: सौरभ राय, सीईओ अराहास टेक्नोलॉजीज