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जिस व्रत का पुण्य कभी समाप्त नहीं होता

Sat, 11 May 2013 04:07 PM IST
पण्डित जयगोविंद शास्त्री
पण्डित जयगोविंद शास्त्री Updated Sat, 11 May 2013 04:07 PM IST
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akshay tritiya vrat

वैशाख शुक्लपक्ष तृतीया को 'अक्षय

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तृतीया' के रूप में मनाया जाता है। श्री श्वेतवाराहकल्प में वैवस्वत मन्वन्तर के बीच सतयुग के आरम्भ की इस पुण्यदायी तृतीया तिथि को पार्वती ने अमोघ फल देने की सामर्थ्य का आशीर्वाद दिया था।

उस आशीर्वाद के प्रभाव से इस तिथि को किया गया कोई भी काम कभी निष्फल नहीं होता। व्यापार आरंभ, गृहप्रवेश, वैवाहिक कार्य, सकाम अनुष्ठान, जप-तप, पूजा-पाठ, दान-पुण्य अक्षय रहता है अर्थात वह कभी नष्ट नहीं होता। इस दिन किए जाने वाले अनाचार, अत्याचार, दुराचार, धूर्तता आदि के कारण होने वाले पाप का कर्मफल भी इसी तरह अक्षुण्ण रहता है।

इसलिए शास्त्र कहते हैं कि लोगों को इस दिन बहुत सावधानी से संयम नियम के साथ रहना चाहिए। इस तिथि का महत्व समझाते हुए माता पार्वती कहती है कि कोई भी स्त्री, जो किसी तरह का सुख चाहती है उसे यह व्रत करते हुए नमक से पूरी तरह परहेज करना चाहिए। धर्मराज को समझाते हुए कहा है, कि यही व्रत करके मै भगवान शिव के साथ आनंदित रहती हूं। कन्याओं को भी उत्तम पति की प्राप्ति के लिए यह व्रत करना चाहिए।

जिनको संतान नहीं हो रही, वे भी इस व्रत से संतान सुख प्राप्त कर सकती हैं। देवी इंद्राणी इसी व्रत के पुण्यप्रताप से जयंत नामक पुत्र की मां बनी। देवी अरुंधति ने यही व्रत करके अपने पति महर्षि वसिष्ठ के साथ आकाश में सबसे ऊपर का स्थान प्राप्त किया। महाराज दक्ष की पुत्री रोहिणी इसी व्रत के कारण अपने पति चंद्र की सबसे प्रिय रानी रहीं।

उन्होंने बिना नमक खाए यह व्रत किया था। इसदिन किया गया पाप कभी नष्ट नहीं होता, और हर जन्म में जीव का पीछा करता रहता है। इस दिन जगतगुरु भगवान् नारायण की लक्ष्मी सहित गंध, चन्दन, अक्षत, पुष्प, धुप, दीप नैवैद्य आदि से पूजा करनी चाहिए। भगवान् विष्णु को गंगा जल और अक्षत से स्नान कराएं।
 
पीपल, आम, पाकड़, गूलर, बरगद, आंवला, बेल, जामुन अथवा अन्य फलदार वृक्ष लगाने से प्राणी सभी कष्टों से मुक्त होकर ऐश्वर्य भोगता है। जिस प्रकार 'अक्षयतृतीया' को लगाये गये वृक्ष हरे-भरे होकर पल्लवित- पुष्पित होते हैं उसी प्रकार इस दिन वृक्षारोपण करने वाला प्राणी भी प्रगतिपथ की और अग्रसर होता है।

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