लक्ष्मी चंचला है, वह हमेशा किसी के पास नहीं रहती, इसलिए हमेशा कुछ न कुछ दान करते रहना चाहिए। इस शिक्षा को जीवन में उतारने वाले लोग, देने की आदत के कारण अपने आपको बड़ा और दूसरों से खास समझते रहते हैं। स्वीडन के मनोवैज्ञानिक, आर्थर बुए ने ऐसे लोगों को सावधान किया है कि गर्व न करें। दान देकर वह औरों का भला करने से ज्यादा, अपना ही भंडार भर रहे हैं। आत्म-विकास के गुर सिखाने वाले लोग अक्सर बताते हैं कि प्रेम और सद्भाव या विद्या ही नहीं, धन और अवसर भी देने से ही बढ़ते हैं। नहीं देगें, तो यह चीजें पड़े-पड़े ही नष्ट हो जाएंगी। कंजूस लोगों के यहां संतान नहीं होने या कम होने और आगे चलकर बिगड़ जाने की घटनाएं अक्सर देखने को मिलती हैं। आर्थर बुए के अनुसार, संचित करते रहने वाले अभिभावकों की संतान खर्चीली या अपनी नादानियों से धन उजाड़ने वाली निकलती हैं। इस तरह की संतानों को वह बिगड़े बच्चों की श्रेणी में अस्सी फीसदी तक स्थान देते हैं। आर्थर निःसंतान रह जाने वाले कंजूस लोगों का प्रतिशत, सड़सठ प्रतिशत तक मानते हैं। बाकी तैंतीस प्रतिशत लोगों का निःसंतान होना वह स्वास्थ्य संबंधी बताते हैं। यानी सड़सठ प्रतिशत लोग तो पूरी तरह स्वस्थ और समर्थ होते हुए भी बिना बाल बच्चों के रह जाते हैं। बुए का कहना है कि दान करते रहना प्रकृति का नियम है। देते और बरसते रहने वाले बादलों को समुद्र निरंतर पानी से भरते रहते हैं। पर बेचवे के लिए खोदे गए गड्ढ़ों में खारा पानी ही भरते हैं, वह भी थोड़ी सी मात्रा में। धर्मशास्त्रों के मुताबिक ही नहीं, विज्ञानियों और गुरुओं के मुताबिक भी देते रहना मुनाफे का सौदा है।