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Sankashti Chaturthi 2025: संकष्टी चतुर्थी पर करें गणेश चालीसा का पाठ, संतान की लंबी उम्र का मिलेगा आशीर्वाद

Thu, 12 Jun 2025 11:20 AM IST
मेघा कुमारी धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: मेघा कुमारी Updated Thu, 12 Jun 2025 11:20 AM IST
सार

Sankashti Chaturthi June 2025: इस साल 14 जून को संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखा जा रहा है। इस दिन उत्तराषाढा नक्षत्र और ब्रह्म योग का संयोग बन रहा है। ऐसे में गणेश चालीसा का पाठ करना और भी कल्याणकारी हो सकता है। 

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Sankashti Chaturthi June 2025 know ganesh chalisa and benefits in hindi disprj
Sankashti Chaturthi June 2025 - फोटो : freepik

विस्तार

Sankashti Chaturthi 2025: पंचांग के मुताबिक हर माह की चतुर्थी तिथि पर संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखा जाता है। यह दिन भगवान गणेश की पूजा-अर्चना को समर्पित है। मान्यता है कि चतुर्थी तिथि पर गजानन की उपासना के साथ-साथ उपवास रखने पर कार्यों में आ रही बाधाएं दूर होती हैं। धार्मिक ग्रंथों के मुताबिक संकष्टी चतुर्थी का अर्थ है 'संकटों को हरने वाली चतुर्थी' यानी इस दिन प्रभु की सच्चे भाव से आराधना करने से सभी कष्टों और बाधाओं से मुक्ति मिलती हैं।

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हिंदू धर्म में गणेश जी को प्रथम पूज्य देवता माना गया है। यदि किसी भी कार्य की शुरुआत गणेश पूजन से की जाए, तो उसमें लाभ की संभावनाएं कई गुना बढ़ जाती हैं, इसलिए संकष्टी चतुर्थी को भगवान गणेश को प्रसन्न और उनकी कृपा प्राप्ति का अवसर माना जाता है। इस दिन उन्हें केवल मोदक का भोग लगाने से संतान की लंबी उम्र और उज्ज्वल भविष्य के योग का निर्माण होता है। इस साल 14 जून को संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखा जा रहा है। इस दिन उत्तराषाढा नक्षत्र और ब्रह्म योग का संयोग बन रहा है। ऐसे में गणेश चालीसा का पाठ करना और भी कल्याणकारी हो सकता है। इससे घर में सुख-समृद्धि और शुभता का आगमन होता है। आइए इस चालीसा के बारे में जानते हैं।

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श्री गणेश जी की चालीसा

दोहा
जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

चौपाई
जय जय जय गणपति गणराजू।
मंगल भरण करण शुभ काजू॥
जय गजबदन सदन सुखदाता।
विश्व विनायक बुद्घि विधाता॥
वक्र तुण्ड शुचि शुण्ड सुहावन।
तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन॥
राजत मणि मुक्तन उर माला।
स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला॥
पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलं।
मोदक भोग सुगन्धित फूलं॥
सुन्दर पीताम्बर तन साजित।
चरण पादुका मुनि मन राजित॥
धनि शिवसुवन षडानन भ्राता।
गौरी ललन विश्व-विख्याता॥
ऋद्धि-सिद्धि तव चंवर सुधारे।
मूषक वाहन सोहत द्घारे॥
कहौ जन्म शुभ-कथा तुम्हारी।
अति शुचि पावन मंगलकारी॥
एक समय गिरिराज कुमारी।
पुत्र हेतु तप कीन्हो भारी॥
भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा।
तब पहुंच्यो तुम धरि द्घिज रुपा॥
अतिथि जानि कै गौरि सुखारी।
बहुविधि सेवा करी तुम्हारी॥
अति प्रसन्न है तुम वर दीन्हा।
मातु पुत्र हित जो तप कीन्हा॥
मिलहि पुत्र तुहि, बुद्धि विशाला।
बिना गर्भ धारण, यहि काला॥
गणनायक, गुण ज्ञान निधाना।
पूजित प्रथम, रुप भगवाना॥
अस कहि अन्तर्धान रुप है।
पलना पर बालक स्वरुप है॥
बनि शिशु, रुदन जबहिं तुम ठाना।
लखि मुख सुख नहिं गौरि समाना॥
सकल मगन, सुखमंगल गावहिं।
नभ ते सुरन, सुमन वर्षावहिं॥
शम्भु, उमा, बहु दान लुटावहिं।
सुर मुनिजन, सुत देखन आवहिं॥
लखि अति आनन्द मंगल साजा।
देखन भी आये शनि राजा॥
निज अवगुण गुनि शनि मन माहीं।
बालक, देखन चाहत नाहीं॥
गिरिजा कछु मन भेद बढ़ायो।
उत्सव मोर, न शनि तुहि भायो॥
कहन लगे शनि, मन सकुचाई।
का करिहौ, शिशु मोहि दिखाई॥
नहिं विश्वास, उमा उर भयऊ।
शनि सों बालक देखन कहाऊ॥
पडतहिं, शनि दृग कोण प्रकाशा।
बोलक सिर उड़ि गयो अकाशा॥
गिरिजा गिरीं विकल हुए धरणी।
सो दुख दशा गयो नहीं वरणी॥
हाहाकार मच्यो कैलाशा।
शनि कीन्हो लखि सुत को नाशा॥
तुरत गरुड़ चढ़ि विष्णु सिधायो।
काटि चक्र सो गज शिर लाये॥
बालक के धड़ ऊपर धारयो।
प्राण, मंत्र पढ़ि शंकर डारयो॥
नाम गणेश शम्भु तब कीन्हे।
प्रथम पूज्य बुद्धि निधि, वन दीन्हे॥
बुद्धि परीक्षा जब शिव कीन्हा।
पृथ्वी कर प्रदक्षिणा लीन्हा॥
चले षडानन, भरमि भुलाई।
रचे बैठ तुम बुद्घि उपाई॥
धनि गणेश कहि शिव हिय हरषे।
नभ ते सुरन सुमन बहु बरसे॥
चरण मातु-पितु के धर लीन्हें।
तिनके सात प्रदक्षिण कीन्हें॥
तुम्हरी महिमा बुद्धि बड़ाई।
शेष सहसमुख सके न गाई॥
मैं मतिहीन मलीन दुखारी।
करहुं कौन विधि विनय तुम्हारी॥
भजत रामसुन्दर प्रभुदासा।
जग प्रयाग, ककरा, दुर्वासा॥
अब प्रभु दया दीन पर कीजै।
अपनी भक्ति शक्ति कछु दीजै॥
श्री गणेश यह चालीसा।
पाठ करै कर ध्यान॥
नित नव मंगल गृह बसै।
लहे जगत सन्मान॥

दोहा
सम्वत अपन सहस्त्र दश, ऋषि पंचमी दिनेश।
पूरण चालीसा भयो, मंगल मूर्ति गणेश॥


 
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