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Kalashtami 2019 : काशी के कोतवाल हैं भगवान भैरव, दर्शन मात्र से ही बन जाते हैं बिगड़े काम

Tue, 25 Jun 2019 08:51 AM IST
Madhukar Mishra धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला Published by: Madhukar Mishra Updated Tue, 25 Jun 2019 08:51 AM IST
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pm modi nomination and religious importance of kal bhairav temple in Varanasi
Kalashtami 2019
सत्ता की चुनावी जंग जीतने निकले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब अपने संसदीय क्षेत्र में जाएंगे तो वहां वह सबसे पहले बाबा विश्वनाथ का दर्शन आशीर्वाद मांगेंगे, लेकिन नामांकन से पहले वह काशी के कोतवाल के सामने हाजिरी लगाने जाएंगे। उसी काशी के कोतवाल के सामने जहां हाल ही में भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह ने भी पहुंच कर सत्ता में दोबारा वापसी के लिए साधना—आराधना की थी। आइए जानते हैं आखिर वाराणसी में आने वाले किसी भी व्यक्ति को बाबा विश्वनाथ के दर्शन के बावजूद क्यों काशी के कोतवाल यानी काल भैरव मंदिर में टेकना पड़ता है मत्था...
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भगवान शिव का अवतार माने जाने वाले बाबा कालभैरव का संबंध काशी से है। इन्हें काशी का कोतवाल कहते हैं। काशी में इनकी नियुक्ति स्वयं भगवान महादेव ने की थी। मान्यता है कि काशी में रहने के लिए हर व्यक्ति को यहां के कोतवाल यानी बाबा भैरव की आज्ञा लेनी पड़ती है। 
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बनारस में मान्यता है कि बाबा विश्वनाथ काशी के राजा हैं और काल भैरव इन प्राचीन नगरी के कोतवाल। यही कारण है कि भगवान भैरव का दर्शन किये बगैर बाबा विश्वनाथ का दर्शन अधूरा माना जाता है। 


काल भैरव को काशी के कोतवाल कहे जाने के पीछे एक अत्यंत रोचक कथा है। शिवपुराण के अनुसार एक बार ब्रह्मा जी और विष्णु जी में बड़ा कौन को लेकर विवाद पैदा हो गया। इसी बीच ब्रह्माजी ने भगवान शंकर की निंदा कर दी, जिसके चलते भगवान शिव बहुत क्रोधित हो गए और उनके क्रोध से ही भगवान काल भैरव का प्राकट्य हुआ। इसके बाद भगवान शिव की आज्ञा पर काल भैरव ने अपने नाखूनों से ब्रह्माजी का पांचवा सिर काट दिया। इससे उन्हें ब्रह्रा हत्या का पाप लगा।

ब्रह्रा हत्या के पाप से मुक्ति के लिए भगवान शंकर ने काल भैरव को पृथ्वी पर जाकर प्रायश्चित करने के लिए कहा। देवाधिदेव शिव ने उन्हें बताया कि जब ब्रह्रमा जी का कटा हुआ सिर उनके हाथ से गिर जाएगा, उसी समय वे ब्रह्रा हत्या के पाप से मुक्त हो जाएंगे। मान्यता है कि पृथ्वी पर उनकी यह यात्रा काशी में जाकर समाप्त हुई। इसके बाद भगवान भैरव यहीं स्थापित हो गए और काशी के कोतवाल कहलाए।
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