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भगवान विष्णु की कृपा पाने के लिए आज ऐसे करें पूजा और पढ़ें परिवर्तिनी एकादशी व्रत कथा

Tue, 22 Sep 2026 04:51 AM IST
विनोद शुक्ला धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला Published by: विनोद शुक्ला Updated Tue, 22 Sep 2026 04:51 AM IST
सार

भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को परिवर्तिनी एकादशी कहते हैं। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा और कथा सुनने से जीवन में सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। 

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परिवर्तिनी एकादशी कथा - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

आज परिवर्तिनी एकादशी का व्रत है। हिंदू धर्म में एकादशी तिथि का खास महत्व होता है। हिंदू पंचांग के अनुसार, भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की एकादशई को परिवर्तिनी, पद्मा या जलझूलनी एकादशी का व्रत रखा जाता है। इस एकादशी का विशेष महत्व होता है क्योंकि इस एकादशी पर भगवान विष्णु योग निद्रा में होते हैं हुए करवट बदलते हैं जिसके कारण इसका नाम परिवर्तिनी पड़ा। सनातन धर्म की मान्याताओं के अनुसार जब भगवान विष्णु हर वर्ष  देवशयनी एकादशी से योग निद्रा में चले जाते हैं और भाद्रपद शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन वे अपनी शेषशैय्या पर करवट बदलते हैं। पदम् पुराण के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु करवट बदलने के समय प्रसन्न मुद्रा में रहते हैं, जिसके चलते इस एकादशी की पूजा और व्रत को शुभ, मंगलकारी और विशेष फलदाई माना गया है।

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परिवर्तिनी एकादशी का महत्व
परिवर्तिनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु के वामन रूप की पूजा करने का विशेष महत्व होता है। इस एकादशी का व्रत रखने से सुख-सौभाग्य और संपन्नता प्राप्ति होती है। वहीं एक दूसरी धार्मिक मान्यता है कि ये भी है कि इस दिन माता यशोदा ने जलाशय में कान्हा जी  के वस्त्र धोए थे,इसी कारण इसे जलझूलनी एकादशी भी कहा जाता है। मंदिरों में इस दिन शोभा यात्रा निकाली जाती है और इस एकादशी पर व्रत करने से सभी पाप नष्ट होते हैं एवं वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है। 
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परिवर्तिनी एकादशी पर ऐसे करें भगवान विष्णु की पूजा
इस दिन प्रातःकाल स्नान आदि से निवृत्त होकर भगवान विष्णु के वामन स्वरूप का ध्यान करना चाहिए। इसके बाद भगवान को पंचामृत से स्नान कराया जाता है। पंचामृत में दूध, दही, घी, शक्कर और शहद का प्रयोग किया जाता है। इसके पश्चात गंगाजल से भगवान को स्नान कराकर कुमकुम और अक्षत अर्पित किए जाते हैं। पूजा के दौरान वामन भगवान की कथा का श्रवण या वाचन करें। इसके बाद दीपक से आरती उतारकर भगवान को भोग लगाएं और प्रसाद श्रद्धालुओं में वितरित करें। शाम के समय भगवान विष्णु के मंदिर अथवा उनके विग्रह के समक्ष भजन-कीर्तन करना भी शुभ माना जाता है।
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इस एकादशी पर करें ये मंत्र जाप, विष्णु संग लक्ष्मी की पूजा से मिलेगा विशेष पुण्य
परिवर्तिनी एकादशी पर भगवान विष्णु के मंत्र का जाप करना विशेष फलदायी माना जाता है। भक्त अपनी सामर्थ्य के अनुसार तुलसी की माला से *“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय”* मंत्र का जाप कर सकते हैं। इस दिन भगवान विष्णु के साथ देवी लक्ष्मी की पूजा करने की भी परंपरा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इससे जीवन में सुख, शांति, धन और समृद्धि की प्राप्ति होती है। साथ ही इस एकादशी के व्रत और पूजा से प्राप्त पुण्य से परलोक में भी उत्तम स्थान मिलने की मान्यता है। श्रद्धा, संयम और भक्तिभाव के साथ किया गया यह व्रत भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने का विशेष अवसर माना जाता है।
  
क्या है परिवर्तिनी एकादशी की व्रत कथा
पौराणिक कथा के अनुसार त्रेतायुग में बलि नाम का असुर था लेकिन वह अत्यंत दानी,सत्यवादी और ब्राह्मणों की सेवा करने वाला था। वह सदैव यज्ञ, तप आदि किया करता था। अपनी भक्ति के प्रभाव से राजा बलि स्वर्ग में देवराज इन्द्र के स्थान पर राज्य करने लगा। देवराज इन्द्र और देवता गण इससे भयभीत होकर भगवान विष्णु के पास गये। देवताओं ने भगवान से रक्षा की प्रार्थना की। इसके बाद भगवान विष्णु ने वामन रूप धारण किया और एक ब्राह्मण बालक के रूप में राजा बलि पर विजय प्राप्त की।


वामन रूप में राजा बलि से याचना करते हुए भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि  हे राजन! यदि तुम मुझे तीन पग भूमि दान करोगे, इससे तुम्हें तीन लोक के दान का फल प्राप्त होगा। राजा बलि ने भूमि दान करने के लिए तैयार हो गया। दान का संकल्प करते ही वामन रूप में भगवान विष्णु ने एक पांव से पृथ्वी, दूसरे पांव की एड़ी से स्वर्ग तथा पंजे से ब्रह्मलोक को नाप लिया। अब तीसरे पांव के लिए राजा बलि के पास कुछ भी शेष नहीं था। इसलिए उन्होंने अपने सिर को आगे कर दिया और भगवान वामन ने तीसरा पैर उनके सिर पर रख दिया। राजा बलि की वचन प्रतिबद्धता से प्रसन्न होकर भगवान वामन ने उन्हें पाताल लोक का स्वामी बना दिया।

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