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Vaikunth Chaturdashi 2023: वैकुण्ठ चतुर्दशी आज, जानिए महत्व, कथा और सुख-समृद्धि के लिए उपाय
Sun, 26 Nov 2023 10:33 AM IST
विनोद शुक्ला
धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला
Published by: विनोद शुक्ला
Updated Sun, 26 Nov 2023 10:33 AM IST
सार
Vaikunth Chaturdashi 2023:बैकुंठ चतुर्दशी को हरिहर यानी श्रीहरि और महादेव की पूजा करने का विधान है। जो भी व्यक्ति बैकुंठ चतुर्दशी को भगवान विष्णु की पूजा करता है, उसे स्वर्ग की प्राप्ति होती है।
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बैकुंठ चतुर्दशी पर हरि से हुआ हर का मिलन
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
Vaikunth Chaturdashi 2023: वैकुण्ठ चतुर्दशी कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाई जाती है। इस दिन भगवान विष्णु और भगवान भोलेनाथ की पूजा एक साथ करते हैं। वैकुंठ चतुर्दशी को हरिहर यानी श्रीहरि और महादेव की पूजा करने का विधान है। जो भी व्यक्ति बैकुंठ चतुर्दशी को भगवान विष्णु की पूजा करता है, उसे स्वर्ग की प्राप्ति होती है। जीवन के अंत समय में उसे भगवान विष्णु के धाम वैकुंठ में स्थान मिलता है।
वैकुंठ चतुर्दशी कथा
पौराणिक कथा के अनुसार एक बार सृष्टि के पालनहार विष्णु देवाधिदेव महादेव का पूजन करने के लिए काशी आए। यहां उन्होंने मणिकर्णिका घाट पर स्नान किया और फिर 1000 स्वर्ण कमल के पुष्पों भोलेनाथ को उपासना करने का संकल्प लिया। श्रीहरि ने काशी में शिवलिंग का अभिषेक किया और विधिविधान से पूजा करने लगे तो शिवजी ने उनकी परीक्षा लेने के लिए एक स्वर्ण पुष्प कम कर दिया। भगवान विष्णु को पुंडरीकाक्ष और कमल नयन भी कहा जाता है। ऐसे में पुष्प की कमी होने पर विष्णु जी ने अपने कमल समान नयन समर्पित करने लगे, श्री नारायण की भक्ति से प्रसन्न होकर शिव प्रकट हुए। उस दिन कार्तिक शुक्ल की चतुर्दशी तिथि थी। भोलेनाथ बोले आज से ये तिथि बैकुंठ चतुर्दशी कहलाएगी। इस दिन जो व्रत कर पूर्ण श्रद्धा के साथ पहले आपका (विष्णु जी) का पूजन करेगा उस बैकुंठ में स्थान प्राप्त होगा।
सुदर्शन चक्र किया भेंट
भगवान भोलेनाथ ने इसी दिन करोड़ों सूर्यों की कांति के समान वाला सुदर्शन चक्र श्रीहरि को प्रदान किया। एक और मान्यता के अनुसार श्रीहरि ने इस दिन जय-विजय को स्वर्ग के द्वार खुले रखने का आदेश दिया था। मान्यता हैं कि पृथ्वीलोक पर रहने वाले प्राणी को इस दिन व्रत और जगत के पालहार की पूजा करने से मृत्यु के बाद यमलोक की पीड़ा नहीं सेहनी पड़ती, उसे मोक्ष की प्राप्त होता है, उसे 14000 पाप कर्मों से मुक्ति मिलेगी।
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बैकुंठ चतुर्दशी के उपाय
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वैकुंठ चतुर्दशी कथा
पौराणिक कथा के अनुसार एक बार सृष्टि के पालनहार विष्णु देवाधिदेव महादेव का पूजन करने के लिए काशी आए। यहां उन्होंने मणिकर्णिका घाट पर स्नान किया और फिर 1000 स्वर्ण कमल के पुष्पों भोलेनाथ को उपासना करने का संकल्प लिया। श्रीहरि ने काशी में शिवलिंग का अभिषेक किया और विधिविधान से पूजा करने लगे तो शिवजी ने उनकी परीक्षा लेने के लिए एक स्वर्ण पुष्प कम कर दिया। भगवान विष्णु को पुंडरीकाक्ष और कमल नयन भी कहा जाता है। ऐसे में पुष्प की कमी होने पर विष्णु जी ने अपने कमल समान नयन समर्पित करने लगे, श्री नारायण की भक्ति से प्रसन्न होकर शिव प्रकट हुए। उस दिन कार्तिक शुक्ल की चतुर्दशी तिथि थी। भोलेनाथ बोले आज से ये तिथि बैकुंठ चतुर्दशी कहलाएगी। इस दिन जो व्रत कर पूर्ण श्रद्धा के साथ पहले आपका (विष्णु जी) का पूजन करेगा उस बैकुंठ में स्थान प्राप्त होगा।
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सुदर्शन चक्र किया भेंट
भगवान भोलेनाथ ने इसी दिन करोड़ों सूर्यों की कांति के समान वाला सुदर्शन चक्र श्रीहरि को प्रदान किया। एक और मान्यता के अनुसार श्रीहरि ने इस दिन जय-विजय को स्वर्ग के द्वार खुले रखने का आदेश दिया था। मान्यता हैं कि पृथ्वीलोक पर रहने वाले प्राणी को इस दिन व्रत और जगत के पालहार की पूजा करने से मृत्यु के बाद यमलोक की पीड़ा नहीं सेहनी पड़ती, उसे मोक्ष की प्राप्त होता है, उसे 14000 पाप कर्मों से मुक्ति मिलेगी।
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बैकुंठ चतुर्दशी के उपाय
- बैकुंठ चतुर्दशी के दिन आप भगवान विष्णु और भगवान शिव दोनों की पूजा करें साथ ही इस दिन आप भगवान विष्णु को बेल पत्रि और भगवान शिव को तुलसी की पत्ती अर्पित करें सिर्फ यह चीज आज ही है के दिन अर्पित करने का विधान है। ऐसा करने से आपके जीवन के सारे कष्ट कम हो जाएंगे और आपकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होंगी।
- मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु ने शिव जी के प्रसन्न करने के लिए काशी में गंगा घाट के तट पर दीप प्रज्ज्वलित किया था। इस दिन जो भी संध्या काल के समय तीर्थ घाटों पर पवित्र नदी के समीप दीपदान करता है उस पर माहदेव सहित भगवान विष्णु की अपार कृपा बरसती है और उसका जीवन दीप की तरह प्रकाशित होता है।
- इस दिन माना जाता है कि जो भी भगवान विष्णु के निमित्त एक हाजार कमल के पुष्प उनको अर्पित करता है और उनके मंत्र का जाप करते हुए उन्हें पुष्प अर्पित करता है उसके लिए बैकुंठ के द्वार सदैव के लिए खुल जाते हैं और जीवन भर उसे अपार सुख मिलता है
- महामृत्युंजय मंत्र का 108 बार जप करें और विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें।