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Karwa Chauth 2025: मिट्टी के करवे से पूर्ण होता है करवा चौथ व्रत, जानें महत्व और पूजा नियम
Wed, 08 Oct 2025 11:53 AM IST
विनोद शुक्ला
धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला
Published by: विनोद शुक्ला
Updated Wed, 08 Oct 2025 11:53 AM IST
सार
Karwa Chauth 2025: 10 अक्तूबर को करवा चौथ का व्रत है। इस दौरान मिट्टी का करवा (घड़ा) विशेष रूप से प्रयोग किया जाता है, जिसके बिना करवा चौथ की पूजा अधूरी मानी जाती है।
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Karwa Chauth 2025
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
Karwa Chauth 2025: भारतीय संस्कृति में हर व्रत और त्योहार का गहरा धार्मिक, पौराणिक और प्रतीकात्मक अर्थ होता है। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाने वाला करवा चौथ व्रत सुहागिन स्त्रियों के लिए सबसे महत्वपूर्ण व्रतों में से एक माना गया है। इस दिन स्त्रियां पति की दीर्घायु, सौभाग्य और सुखमय जीवन की कामना के लिए निर्जला व्रत रखती हैं। इस व्रत में पूजा के दौरान मिट्टी का करवा (घड़ा) विशेष रूप से प्रयोग किया जाता है, जिसके बिना करवा चौथ की पूजा अधूरी मानी जाती है।
मिट्टी के करवे का प्रतीकात्मक अर्थ
“करवा” शब्द संस्कृत के करक से बना है, जिसका अर्थ होता है घड़ा या जलपात्र। यह पात्र मिट्टी से बनाया जाता है क्योंकि मिट्टी को पंचतत्वों का प्रतीक माना गया है-पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश। इसी मिट्टी से मानव शरीर की रचना भी मानी गई है। इसलिए करवा चौथ पर मिट्टी का करवा धरती के जीवनदायिनी स्वरूप और सृष्टि के मूल तत्वों का प्रतिनिधित्व करता है। जब स्त्रियां इससे जल भरती हैं या इसे पूजन में रखती हैं, तो वे पाँचों तत्वों को साक्षी मानकर अपने सुहाग की रक्षा और पारिवारिक सुख-समृद्धि की कामना करती हैं।
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पूजन में करवे का प्रयोग और उसकी मान्यता
व्रत के दिन शाम को चंद्र दर्शन से पहले स्त्रियां मिट्टी के करवे में जल भरती हैं, उसे पूजा स्थान पर रखती हैं और भगवान गणेश,शिव-पार्वती,कार्तिकेय और चौथ माता का आवाहन करती हैं। करवे के ऊपर सराई में चावल, द्रव्य और मिठाई रखकर करवा चौथ की कथा सुनी जाती है। यह करवा न केवल पूजा का पात्र है, बल्कि यह स्त्री की निष्ठा, प्रेम और संयम का प्रतीक भी बन जाता है।
मिट्टी शुद्ध और सात्त्विक मानी गई है, जबकि धातु या प्लास्टिक के करवे कृत्रिम तत्वों से बने होते हैं। मिट्टी का करवा पर्यावरण के साथ सामंजस्य का प्रतीक है, और यह धरती माँ के प्रति कृतज्ञता का भाव भी प्रकट करता है। इसलिए धार्मिक दृष्टि से कहा गया है कि यदि पूजा में मिट्टी का करवा न हो, तो व्रत अधूरा माना जाता है।
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इस प्रकार करवा चौथ का मिट्टी का करवा केवल पूजा का पात्र नहीं, बल्कि जीवन, निष्ठा, प्रकृति और धर्म का एक अद्भुत संगम है, जो स्त्रियों के सच्चे प्रेम और श्रद्धा का प्रतीक बनकर आज भी भारतीय परंपरा में जीवंत है।
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मिट्टी के करवे का प्रतीकात्मक अर्थ
“करवा” शब्द संस्कृत के करक से बना है, जिसका अर्थ होता है घड़ा या जलपात्र। यह पात्र मिट्टी से बनाया जाता है क्योंकि मिट्टी को पंचतत्वों का प्रतीक माना गया है-पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश। इसी मिट्टी से मानव शरीर की रचना भी मानी गई है। इसलिए करवा चौथ पर मिट्टी का करवा धरती के जीवनदायिनी स्वरूप और सृष्टि के मूल तत्वों का प्रतिनिधित्व करता है। जब स्त्रियां इससे जल भरती हैं या इसे पूजन में रखती हैं, तो वे पाँचों तत्वों को साक्षी मानकर अपने सुहाग की रक्षा और पारिवारिक सुख-समृद्धि की कामना करती हैं।
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व्रत के दिन शाम को चंद्र दर्शन से पहले स्त्रियां मिट्टी के करवे में जल भरती हैं, उसे पूजा स्थान पर रखती हैं और भगवान गणेश,शिव-पार्वती,कार्तिकेय और चौथ माता का आवाहन करती हैं। करवे के ऊपर सराई में चावल, द्रव्य और मिठाई रखकर करवा चौथ की कथा सुनी जाती है। यह करवा न केवल पूजा का पात्र है, बल्कि यह स्त्री की निष्ठा, प्रेम और संयम का प्रतीक भी बन जाता है।
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मिट्टी का करवा क्यों आवश्यक है?मिट्टी शुद्ध और सात्त्विक मानी गई है, जबकि धातु या प्लास्टिक के करवे कृत्रिम तत्वों से बने होते हैं। मिट्टी का करवा पर्यावरण के साथ सामंजस्य का प्रतीक है, और यह धरती माँ के प्रति कृतज्ञता का भाव भी प्रकट करता है। इसलिए धार्मिक दृष्टि से कहा गया है कि यदि पूजा में मिट्टी का करवा न हो, तो व्रत अधूरा माना जाता है।
Karwa Chauth 2025: करवा चौथ पर इन 3 बातों का रखें खास ध्यान, पति की लंबी उम्र का मिलेगा आशीर्वाद
इस प्रकार करवा चौथ का मिट्टी का करवा केवल पूजा का पात्र नहीं, बल्कि जीवन, निष्ठा, प्रकृति और धर्म का एक अद्भुत संगम है, जो स्त्रियों के सच्चे प्रेम और श्रद्धा का प्रतीक बनकर आज भी भारतीय परंपरा में जीवंत है।
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