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Jivitputrika Vrat 2023: 6 अक्तूबर को जीवित्पुत्रिका व्रत, जानिए महत्व, पूजाविधि और कथा

Wed, 04 Oct 2023 12:19 PM IST
विनोद शुक्ला धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला Published by: विनोद शुक्ला Updated Wed, 04 Oct 2023 12:19 PM IST
सार

जीवित्पुत्रिका व्रत पुत्र प्राप्ति और उसकी सुरक्षा के लिये किया जाता हैं। इस व्रत के दिन भगवान सूर्यनारायण का पूजन किया जाता हैं। ऐसी मान्यता है कि इस दिन का व्रत करने से मृतवत्सा दोष का निवारण होता हैं।

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Jitiya 2023 Date Importance Puja Vidhi Shubh Muhurat Katha Nahay Khay jivitputrika Vrat Parana Time
Jivitputrika Vrat 2023: आश्विन मास की कृष्णपक्ष की अष्टमी तिथि के दिन जितिया व्रत किया जाता हैं। - फोटो : iStock

विस्तार

Jivitputrika Vrat 2023: आश्विन मास की कृष्णपक्ष की अष्टमी तिथि के दिन जितिया व्रत किया जाता हैं। इसे जीवित्पुत्रिका व्रत के नाम से भी जाना जाता हैं। इस वर्ष जितिया व्रत 6 अक्तूबर, शुक्रवार के दिन किया जायेगा।  
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महत्व
जीवित्पुत्रिका व्रत पुत्र प्राप्ति और उसकी सुरक्षा के लिये किया जाता हैं। इस व्रत के दिन भगवान सूर्यनारायण का पूजन किया जाता हैं। ऐसी मान्यता है कि इस दिन का व्रत करने से मृतवत्सा दोष का निवारण होता हैं। जिन स्त्रियों के पुत्र जन्म लेते ही मृत्यु को प्राप्त होते है या जिन माताओं के पुत्र अल्पायु में मर जाते हैं, वो महिलायें अपने पुत्रों के लम्बी आयु और उनकी सुरक्षा के लिये इस व्रत को करती हैं। कहते हैं कि उत्तरा के गर्भ में पल रहे पांडव पुत्र की रक्षा के लिए श्रीकृष्ण ने अपने सभी पुण्य कर्मों से उसे पुनर्जीवित किया था। तब से ही स्त्रियां आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को निर्जला व्रत रखती हैं। कहते हैं कि इस व्रत के प्रभाव से भगवान श्री कृष्ण व्रती स्त्रियों की संतानों की रक्षा करते हैं।
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पूजाविधि
अष्टमी तिथि के दिन प्रदोष काल में तलाब के निकट कुशा से जीमूतवाहन की मूर्ति बनाई जाती है। साथ ही कथा के चील और मादा सियार की मूर्तियां भी गोबर से बनाते हैं। सबसे पहले जीमूतवाहन को धूप,दीप,फूल और अक्षत चढ़ाएं तथा चील और सियार को सिंदूर से टीका लगाएं। इसके बाद व्रत कथा का पाठ करें और अंत में आरती की जाती है। इस दिन पूजन में पेड़ा, दूब, खड़ा चावल, 16 गांठ का धागा, इलाईची, पान-सुपारी और बांस के पत्ते भी चढ़ाए जाते हैं। जितिया के पूजन में सरसों का तेल और खली भी चढ़ाई जाती है, जिसे बुरी नजर दूर करने के लिए अगले दिन बच्चों के सिर पर लगाया जाता है।
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कथा
कथा है कि सतयुग में गंधर्वों के एक राजकुमार थे,जिनका नाम जीमूतवाहन था। वे बड़े ही धर्मात्मा, परोपकारी और सत्यवादी थे। जीमूतवाहन को राजसिंहासन पर बिठाकर उनके पिता वन में प्रभु का स्मरण करने चले गए। लेकिन उनका मन राज कार्य में नहीं लगा। वे राज-पाट की जिम्मेदारी अपने भाइयों को देकर अपने पिता की सेवा के उदेश्य से उनके पास वन में चले गए। वन में ही उनका विवाह मलयवती नाम की कन्या से हुआ। एक दिन वन में भ्रमण करते हुए उनकी भेंट एक वृद्धा से हुई, जो नागवंश से थी। वह काफी डरी हुई थी और रो रही थी। दयालु जीमूतवाहन ने उससे उसकी ऐसी स्थिति के बारे में पूछा। इस पर वृद्धा ने बताया कि नागों ने पक्षीराज गरुड़ को वचन दिया है कि प्रत्येक दिन वे एक नाग को उनके आहार के रूप में देंगे।

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रोते हुए वृद्धा ने बताया कि उसका एक बेटा है, जिसका नाम शंखचूड़ है। आज उसे पक्षीराज गरुड़ के पास जाना है। इस पर जीमूतवाहन ने वृद्धा को आश्वस्त करते हुए कहा कि डरो मत,तुम्हारे पुत्र के प्राणों की रक्षा मैं करूंगा। आज तुम्हारे पुत्र की जगह स्वयं को लाल कपड़े से ढक कर शिला पर लेटूंगा। नियत समय पर जीमूतवाहन  पक्षीराज गरुड़ के समक्ष प्रस्तुत हो गए।लाल कपड़े में लिपटे जीमूतवाहन को गरुड़ अपने पंजों में दबोच कर साथ लेकर चल दिए। उस दौरान उन्होंने जीमूतवाहन की आंखों में आंसू निकलते देखा और कराहते हुए सुना। वे एक पहाड़ पर रुके, तो जीमूतवाहन ने सारी घटना बताई।पक्षीराज गरुड़ जीमूतवाहन के साहस, परोपकार और मदद करने की भावना से काफी प्रभावित हुए। उन्होंने जीमूतवाहन को प्राणदान दे दिया और कहा कि वे अब किसी नाग को अपना आहार नहीं बनाएंगे। इस तरह से जीमूतवाहन ने नागों की रक्षा की।तभी से संतान की सुरक्षा और सुख के लिए जीमूतवाहन की पूजा की शुरुआत हो गई।
 
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