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Hindi News ›   Spirituality ›   Festivals ›   Diwali 2021 date Maa Lakshmi is the goddess of wealth and prosperity, but why worship Kuber Dev on Diwali

Diwali 2021: मां लक्ष्मी हैं धन की देवी फिर भी दिवाली पर साथ में क्यों होता है कुबेर का पूजन

Thu, 04 Nov 2021 07:47 AM IST
शशि सिंह धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला Published by: शशि सिंह Updated Thu, 04 Nov 2021 07:47 AM IST
सार

इस साल दिवाली का त्योहार 04 अक्टूबर 2021 दिन गुरुवार को मनाया जाएगा। दिवाली को रात्रि में मां लक्ष्मी, भगवान गणेश के पूजन का विधान हैं लेकिन इसी के साथ दिवाली पर देवताओं के कोषाध्यक्ष कुबेर का पूजन भी किया जाता है। क्या आपको पता है कि दिवाली पर मां लक्ष्मी के साथ कुबेर देव का पूजन क्यों किया जाता है।

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Diwali 2021 date Maa Lakshmi is the goddess of wealth and prosperity, but why worship Kuber Dev on Diwali
दीवाली 2021 मां लक्ष्मी के साथ क्यों किया जाता है कुबेर देव का पूजन

विस्तार

प्रत्येक वर्ष की तरह दिवाली का त्योहार इस बार भी कार्तिक मास की अमावस्या तिथि को मनाया जा रहा है। इस दिन रात्रि में हर ओर दीपकों की रोशनी से जगमग होती है और अमावस्या का सारा अंधकार दूर हो जाता है। इस साल दिवाली का त्योहार 04  नवंबर 2021 दिन गुरुवार को मनाया जा रहा है। दिवाली को रात्रि में मां लक्ष्मी, भगवान गणेश के पूजन का विधान हैं लेकिन इसी के साथ दिवाली पर देवताओं के कोषाध्यक्ष कुबेर का पूजन भी किया जाता है। धार्मिक ग्रंथों में मां लक्ष्मी को धन और ऐश्वर्य की देवी कहा गया है। मान्यता है कि दिवाली पर मां पृथ्वी लोक पर विचरण करती हैं। इस दिन विधिवत पूजन करने से लक्ष्मी जी अपने भक्तों की झोली धन-धान्य से भर देती हैं लेकिन क्या आपको पता है कि दिवाली के दिन कोषाध्यक्ष कुबेर का पूजन क्यों किया जाता है। तो चलिए जानते हैं कि कौन हैं कोषाध्यक्ष कुबेर और दिवाली के दिन क्यों होता है कुबेर का पूजन।

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चंचला हैं मां लक्ष्मी
पौराणिक कथा के अनुसार जब दैत्यराज बलि ने तीनों लोकों पर अपना अधिकार कर लिया और दानवों के त्रास से सभी देवता अत्यंत परेशान हो गए। इसके बाद देवराज इंद्र और अन्य देवता-गण भगवान विष्णु के पास पहुंचे और इसका दानवों से विजय प्राप्त करने का निवारण पूछा, तब भगवान विष्णु ने उन्हें समुद्र मंथन करने को कहा, जिसके बाद देवता और दानवों में मिलकर अमृत प्राप्ति के लिए समुद्र मंथन किया। समुद्र मंथन के समय एक-एक करके क्रमशः चौदह रत्नों की प्राप्ति हुई, जिसमें आठवें रत्न को रूप में मां लक्ष्मी यानी धन, समृद्धि, वैभव और ऐश्वर्य प्रदान करने वाली देवी की उत्पत्ति हुई। जल से उत्पत्ति होने के कारण इनका स्वभाव चंचल माना गया है, इसलिए ये एक स्थान पर नहीं ठहरती हैं।

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इसलिए की जाती है कुबेर देव की पूजा
कुबेर देव के विषय में कई तरह की कथाएं प्रचलित हैं। धार्मिक ग्रंथों में मिलने वाली एक कथा के अनुसार, इन्हें रावण के गौत्र का बताया जाता है, लेकिन राक्षस वर्ण के होने के बाद भी इन्हें देव के रूप में पूजा जाता है। इनको यक्ष भी कहा जाता है, यक्ष यानी रक्षा करने वाला। ये धन के रक्षक देव के रूप में पूजे जाते हैं। धार्मिक ग्रंथो में इन्हें देवताओं के धन कोषाध्यक्ष भी कहा गया है। जहां मां लक्ष्मी चंचला कहलाती हैं और एक जगह ठहरना उनका स्वभाव नहीं है तो वहीं कुबेर देव को स्थाई संपत्ति का देवता माना गया है। यही कारण है कि दिवाली पर मां लक्ष्मी के साथ कुबेर देव का पूजन भी किया जाता है ताकि घर में स्थाई रूप से धन संपत्ति बनी रहे।

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