Ahoi Ashtami 2021: आज है अहोई अष्टमी, जानिए शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और कथा
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Ahoi Ashtami 2021: यूं तो भारतीय वैदिक शास्त्र में पति एवं संतान सुख की अक्षय वृद्धि और उनकी लंबी आयुके लिए अनेकों तिथियां और व्रत हैं, जिनमें अक्षय तृतीया, निर्जला एकादशी, हरितालिका तीज, करवा चौथ आदि प्रमुख हैं किंतु इन स्वयंसिद्ध तिथियों के अतिरिक्त भी कई और ऐसी तिथियां हैं जिनका व्रत करके मातृशक्ति अपने पति और संतान की लंबी आयु एवं उत्तम स्वास्थ्य की कामना करती हैं, उन्हीं में से प्रमुख अहोई भी अष्टमी है जो कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाई जाती है। अहोई देवी माँ पार्वती का ही रूप हैं इनका व्रत-पूजा करने से माताओं-बहनों की जन्मकुंडली में नौ ग्रहों द्वारा में बने हुए बंध्या योग, काकबंध्या योग, गर्भपात से मुक्ति, मंदबुद्धि संतान का जन्म होना, संतान की असमय मृत्यु, दुष्ट संतान योग आदि ज्योतिष के सभी कुयोग समाप्त हो जाते है और प्राणी धन-संतान सुख से परिपूर्ण होकर सुखद जीवन यापन करता है।
इस दिन श्रेष्ठ 'गुरुपुष्य' योग
आज अहोई अष्टमी बृहस्पतिवार को सुबह 09 बजकर 39 मिनट से बलवान 'पुष्यनक्षत्र' का उदय हो रहा है जो कल दोपहर 11 बजकर 38 मिनट तक विद्यामान रहेगा । मुहुर्त ग्रंथों के अनुसार 'गुरुपुष्य' योग में किया गया जप-तप-अनुष्ठान आदि का फल कई गुणा बढ़ता है और अक्षुण भी रहता है। मंत्र दीक्षा अथवा सिद्धि के लिए यह मुहूर्त श्रेष्ठ है। आज सर्वार्थसिद्धि योग सूर्योदय से आरम्भ होकर सुबह तक रहेगा, यह योग भी सभी कार्यों में सिद्धि दिलाने वाला है। शायंकालीन प्रदोष वेला में स्थानीय सूर्यास्त से 01 घंटा 36 मिनट तक के मध्य पूजा का श्रेष्ठ मुहूर्त है। इतने बड़े शुभयोगों के रहते मां अहोई की कृपा पाने का अच्छा अवसर है।
किस विधि से करें अहोई अष्टमी पूजा
अहोई अष्टमी की पूजा-आराधना का विधान शायंकालीन प्रदोष वेला में है जब आसमान में तारों का उदय हो जाय तभी पूजन आरंभ करें। व्रत करने वाली माताओं-बहनों को 'निर्जला' रहकर सुबह स्नान-ध्यान करके माँ पार्वती रुपी अहोई देवी के व्रत-आराधना का संकल्प करना चाहिए। अपने घर में पूजा स्थल की दीवार या कैलेंडर पर अहोई मां की आकृति गेरू या लाल रंग से बनाएं। सूर्यास्त के बाद प्रदोष वेला में ही तारे निकलने पर मां की पूजा आरम्भ करें। पूजन सामग्री में एक चांदी या सफेद धातु की अहोई देवी की मूर्ति, जल से भरा हुआ कलश, अक्षत, रोली, सिंदूर, दूध-भात, हलवा, फल- फूल दीप आदि जो यथाशक्ति सामग्री हो साथ ले लें । बाद में भगवान गणेश और श्रीविष्णु, पृथ्वी, नवग्रह, कुलदेवी देवता आदि को प्रणाम करें। पूजाफल की पूर्ण रक्षा और फल प्राप्ति के लिए रक्षा दीप जलाएं उसके बाद अहोई माँ का ध्यान करें कि हे पार्वतीरुपी माँ अहोई देवी मैं अपनी शक्ति-सामर्थ्य, बुद्धि और ज्ञानके अनुसार जीवनपर्यंत अपने संतान सुख की कामना के लिए आपकी पूजा कर रही हूँ मेरी पूजा स्वीकार करें और मेरे संकल्पित सभी मनोरथ पूर्ण करें। पूजन के समय यदि कोई मंत्र न आता हो तो आदिशक्ति माँ के इस मंत्र, 'या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ।। को बोलते हुए जो भी पूजन सामग्री उपलब्ध हो उसे अर्पित करें। पूजा करने के बाद मां अहोई
की पूजा का फल और माहत्म्य सुनना न भूलें ।
पूजा का फल,कथा और महत्व
इस व्रत को लेकर एक कथा है कि एक साहूकार के सात बेटे और एक विमला नाम की बेटी थी सबकी शादी हो चुकी थी। विमला दीपावली को पिता के घर आई थी। घर को लीपने के लिए सातों बहुएं मिट्टी लाने गावं के बाहर गईं तो विमला भी उनके साथ चली गई। विमला जहां खुदाई रही थी, उस स्थान पर एक सेही अपने साथ बेटों से साथ रहती थी। मिट्टी काटते हुए गलती से साहूकार की बेटी की खुरपी के चोट से स्याहु का एक बच्चा मर गया इस पर क्रोधित होकर सेही ने विमला को संतानहीनता का श्राप दे दिया। सेही के वचन सुनकर विमला अपनी सातों भाभियों से एक-एक कर विनती करती हैं कि वह उसके बदले अपनी कोख बंधवा लें। सबसे छोटी भाभी पुष्पा ननद के बदले अपनी कोख बंधवाने के लिए तैयार हो जाती है। इसके बाद पुष्पा के जो भी बच्चे जन्म लेते हैं वे सात दिन बाद मर जाते हैं। सात पुत्रों की इस प्रकार मृत्यु होने के बाद पुष्पा एक पंडित जी घर गयी और सारी व्यथा बताई। पंडित ने सुरभी गाय की सेवा करने की सलाह दी। सुरभी सेवा से प्रसन्न होकर सेही पास ले जाती है। रास्ते में थक जाने पर दोनों आराम करने लगते हैं। अचानक साहूकार की छोटी बहू पुष्पा की नजर एक ओर जाती हैं, वह देखती है कि एक सांप गरूड़पक्षी के बच्चे को मार रहा है तो वह सांप को ही मार देती है। इतने में गरूड़पक्षी की माँ भी वहां आ जाती है और खून बिखरा हुआ देखकर उसे लगता है कि छोटी बहू पुष्पा ने उसके बच्चे को मार दिया है इस पर वह पुष्पा को चोंच मारने लगती है। पुष्पा गरुण की माँ से कहती है कि उसने तो उसके बच्चे की जान बचाई है इसपर गरूड़पक्षी की माँ पुष्पा से खुश होकर सुरभी सहित उन्हें सेही के पास पहुंचा देती है। सेही पुष्पा की सेवा से प्रसन्न होकर उसे सात पुत्र और सात बहू होने का आशीर्वाद देती है। सेही के आशीर्वाद से छोटी बहू का घर पुत्र और पुत्र बहुओं से हरा भरा हो जाता है। असंभव को भी संभव करदेना ही अहोई माँ की शक्ति है।