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103 साल की हुईं दादी जानकी, 100 देशों में पहुंचा चुकी हैं ईश्वरीय पैगाम

बी.के. कोमल Updated Tue, 01 Jan 2019 03:13 PM IST
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Brahma Kumaris Dadi Janki Birthday
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दादी जानकी एक अद्भुत व्यक्तित्व
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- अलसुबह ब्रह्यमुहूर्त में ४ बजे से हो जाती हैं ध्यान मग्न    
- विश्व की सबसे स्थिर मन की महिला का है वल्र्ड रिकार्ड 
- मात्र चौैथी कक्षा तक पढ़ी, 46 हजार बहनों की अलौकिक मां
- 103 साल की उम्र में एक साल में की 50 हजार किमी की यात्रा
- आज भी 12 घंटे विश्व की सेवा में सक्रिय

उम्र - 103 साल। पढ़ाई -मात्र चौथी कक्षा तक। 46 हजार बहनों की अभिभावक। 12 घंटे जनसेवा में सक्रिय। अलसुबह ४ बजे से जागरण और ध्यान, उम्र के इस पड़ाव में भी उत्साह युवाओं जैसा, 80 फीसदी चीजें मौखिक याद... ऐसे अद्भुत व्यक्तित्व की धनी हैं दादी मां जानकी। दुनियाभर के 140 देशों में फैले प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय की मुय प्रशासिका दादी जानकी का जीवन आध्यात्म का प्रेरणापुंज है। यही नहीं विश्व की सबसे स्थिर मन की महिला का वर्ल्ड रिकार्ड भी दादी के नाम है। ब्रह्माकुमारीका विश्व की एकमात्र ऐसी संस्था है जो नारी शक्ति द्वारा संचालित है। 

उम्र के इस पड़ाव में भी जारी है आध्यात्मिक साधना...
दादी जानकी का जीवन साक्षात् में योग की जीती-जागती मिसाल है। उन्होंने राजयोग के अयास से खुद को इतना परिपक्व, शक्तिशाली, महान और आदर्शवान बना लिया है कि उनका एक-एक वाक्य महावाक्य होता है। योग से मन इतना संयमित, पवित्र, शुद्ध और सकारात्मक बना लिया है कि वह जिस समय चाहें, जिस विचार या संकल्प पर और जितनी देर चाहें, स्थिर रह सकती हैं। यही कारण है कि जीवन के 103 बसंत पार करने के बाद भी आज भी आपकी ऊर्जा और उत्साह देखते ही बनता है। केवल भारत ही नहीं बल्कि विश्व के 140 देशों में अपनी मौजूदगी से दादी ने लाखों लोगों की जिंदगी में एक सकारात्मक संचार किया है। लोग देखकर, सुनकर, मिलकर प्रेरित हुए हैं जो आज एक अच्छी जिंदगी के राही हैं। उनका एक-एक शब्द लाखों भाई-बहनों के लिए मार्गदर्शक और पथप्रदर्शक बन जाता है। 

हैदराबाद सिंध प्रांत में 1916 में हुआ था जन्म...
अविभाज्य भारत के हैदराबाद सिंध प्रांत (अब पाकिस्तान) में 1916 में जन्मी दादी जानकी ने मात्र चौथी कक्षा तक ही पढ़ाई की है। भक्ति भाव के संस्कार बचपन से ही मां-बाप से विरासत में मिले। लोगों को दु:ख, दर्द और तकलीफ, जातिवाद और धर्म के बंधन में बंधे देख आपने अल्पायु में ही समाज परिवर्तन का दृढ़ संकल्प किया। साथ ही अपना जीवन समाज कल्याण, समाजसेवा और विश्व शांति के लिए अर्पण करने का साहसिक फैसला कर लिया। माता-पिता की सहमति के बाद २१ वर्ष की आयु में आप ओम् मंडली (ब्रह्माकुमारीका का पहले यही नाम था) से जुड़ गईं। 

14 वर्ष तक की गुप्त योग-साधना...
ब्रह्माकुमारीका के साकार संस्थापक ब्रह्मा बाबा के सान्निध्य में आपने 14 वर्ष तक गुप्त तपस्या की। इन 14 वर्षों तक कराची में एक साथ 300 भाई-बहनों ने प्रेम और स्नेह से रहते हुए खुद को इस विश्व विद्यालय के चार सब्जेक्ट (ज्ञान, योग, सेवा और धारणा) में परिपक्व बनाया। ब्रह्ममुहूर्त में सुबह 4 बजे से उठना और घंटों तक योग-साधना और सत्संग ये दिनचर्या रही। वर्ष 1950 में संस्था कराची से माउंट आबू, राजस्थान स्थानांतरित हुई। जहां से विश्व सेवाओं का शंखनाद हुआ और आध्यात्म का विश्व के कोने-कोने में पहुंचाया।

भारतीय संस्कृति के विदेश में रोपे बीज...
वर्ष 197० में दादी जानकी पहली बार विदेशी जमीं पर मानवीय मूल्यों का बीज रोपने के लिए निकलीं। दादी ने भले ही चौथी तक पढ़ाई की थी परन्तु प्यार, स्नेह, अपनापन और मूल्यों की भाषा ने विदेशी जमीं पर भारतीय संस्कृति को स्थापित कर दिया। धीरे-धीरे यह कारवां बढ़ता रहा। आज विश्वभर में लोग भारतीय आध्यात्म और राजयोग मेडिटेशन को दिनचर्या में शामिल कर जीवन को नई दिशा दे रहे हैं। आज भी दादी पूरे विश्व का चक्कर लगाती हैं। दादी अभी भी प्रात: ३ बजे उठ जाती हैं। राजयोग मेडिटेशन के साथ आध्यात्मिक मूल्यों का मंथन, लोगों से मिलना-जुलना आदि अपने तय समय पर ही करती हैं। इसके बाद दिन में कुछ आराम कर वापस सायंकालीन ध्यान मेडिटेशन और फिर रात्रि 10 बजे तक सो जाती हैं। करीब 10 से 12 घंटे तक आज भी सेवा में संलग्न रहती हैं। 

एक साल में 50 हजार किमी की यात्रा...
दादी उम्र के इस पड़ाव पर भी इतनी ऊर्जावान हैं कि पिछले एक वर्ष में उन्होंने भारत सहित दुनिया के कई देशों का चक्कर लगाते हुए ५० हजार किमी की यात्रा तय की है। जो अपने आप में एक विश्व रिकार्ड है। इतनी यात्रा के बाद भी उनमें आज भी युवाओं जैसा उत्साह देखा जा सकता है।  

स्वच्छ भारत मिशन की हैं ब्रांड एंबेसेडर...
ब्रह्माकुमारी की पूरे विश्व में साफ-सफाई और स्वच्छता को लेकर विशेष पहचान रही है। देश में स्वच्छता को बढ़ावा देने के लिए भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दादी जानकी को स्वच्छ भारत मिशन का ब्रांड एंबेसेडर भी नियुक्त किया है। हाल ही में दादी के नेतृत्व में पूरे भारतवर्ष में विशेष स्वच्छता अभियान भी चलाए गए। 

हजारों बहनें समाजसेवा में जुटीं...
दादी को विश्व की मां का दर्जा हासिल है। वे ब्रह्माकुमारीका संस्था में समर्पित 46 हजार से अधिक बहनों की अभिभावक के साथ मां भी हैं। आपके सान्निध्य में इतनी बहनें प्यार-स्नेह के साथ दिन-रात समाजसेवा में जुटी हुई हैं। दादी के एक आह्नान पर संस्थान से जुड़े 12 लाख से अधिक भाई-बहनें जुट जाते हैं। 

दादी ने अकेले सौ देशों में दिया ईश्वरीय पैगाम...
दादी की कर्मठता, सेवा के प्रति लगन और अथक परिश्रम का ही कमाल है कि अकेले दादी ने विश्व के सौ देशों में भारतीय प्राचीन संस्कृति आध्यात्मिकता एवं राजयोग का संदेश पहुंचाया। दादी ने सबसे पहले लंदन से ईश्वरीय संदेश की शुरुआत की। यहां वर्ष 1991 में कई एकड़ क्षेत्र में फैले ग्लोबल को-ऑपरेशन हाऊस की स्थापना की गई। धीरे-धीरे यह कारवां बढ़ता गया और यूरोप के देशों में आध्यात्म का शंखनाद हुआ। दादी के साथ हजारों की संया में बीके भाई-बहनें जुड़ते गए। दादी जानकी ने वर्ष 197० से वर्ष 2007 तक 3७ वर्ष विदेश में अपनी सेवाएं दीं। इसके बाद वर्ष 2007 में संस्था की तत्कालीन मुय प्रशासिका राजयोगिनी दादी प्रकाशमणि के शरीर छोडऩे के बाद आपको 27 अगस्त को ब्रह्माकुमारीका की मुख्य प्रशासिका नियुक्त किया गया। तब से लेकर आज तक आप संस्था को कुशलतापूर्वक नेतृत्व करते हुए लाखों लोगों की प्रेरणापुंज बनी हुई हैं।

दादी को पसंद है ये खाना...
दादी शरीर को ठीक तथा खुद को हल्का रखने के लिए सुबह नाश्ते में दलिया, उपमा और फल लेती हैं। दोपहर में खिचड़ी, सब्जी लेना पसंद करती हैं। रात में सब्जियों का गाढ़ा सूप पसंदीदा आहार है। दादी वर्षों से तेल-मसाले वाले भोजन से परहेज करती हैं। भोजन करने का भी समय निर्धारित है। दादी का कहना है कि हम जैसा अन्न खाते हैं वैसा हमारा मन होता है। इसलिए सदा भोजन परमात्मा की याद में ही करना चाहिए। हमारे मन का भोजन से सीधा संबंध है। 

कई राष्ट्रीय- अंतरराष्ट्रीय अवार्ड से नवाजा गया...
दादी को विदेश में सेवा के दौरान कई देशों में अंतरराष्ट्रीय अवार्ड से भी नवाजा गया। इसके अलावा भारत में भी कई अवार्ड से पुरस्कृत किया गया। दादी के ही नेतृत्व में संस्थान के अंतरराष्ट्रीय मुयालय माउंट आबू में हर वर्ष राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय समेलन का आयोजन किया जाता है। इसमें विश्वभर के कई देशों के प्रतिनिधि भाग लेते हैं।

फैक्ट फाइल....
- १९१६ में हैदराबाद सिंध प्रांत में जन्म
- १९७० में पहली बार विदेश सेवा पर निकलीं
- २००७ में ब्रह्माकुमारीका की मुख्य प्रशासिका बनीं
- १०० देशों में अकेले पहुंचाया राजयोग का संदेश
- १४० देशों में संस्थान के सेवाकेंद्र
- २१ वर्ष की आयु में जुड़ी संस्थान से
- १२ लाख से अधिक भाई-बहनें जुड़े विद्यालय से
- ४६ हजार बहनों की हैं नायिका
- १४ वर्ष तक की गुप्त योग-साधना
- १२ घंटे रोजाना समाज कल्याण में सक्रिय
- ८० फीसदी चीजें आज भी याद रहती हैं
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