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अब वीरभद्र को पत्थर तो नहीं मार सकता
Shimla
Updated Fri, 04 Apr 2014 05:30 AM IST
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शिमला। चुनाव लड़ने से संन्यास लेने के बाद दोबारा अखाड़े में उतरे शांता कुमार सबको साथ ले रहे हैं। वीरवार को जब वे चंबा जिले के तीसा में प्रचार पर थे, तो उन्होंने अमर उजाला के तीखे सवालाें का सामना किया और अपनी सहज शालीन शैली से जवाब भी दिए। पेश हैं सवाल और जवाब :
अमर उजाला : आपने कई साल पहले चुनाव न लड़ने का ऐलान कर दिया था। इसके बाद राज्यसभा सांसद बने, लेकिन अब दोबारा चुनाव लड़ने को तैयार हो गए। क्या ये इमोशनल ब्लैकमेलिंग नहीं है?
शांता कुमार : मैंने निर्णय लिया था कि अब चुनाव नहीं लडूंगा, लेकिन अंतिम समय तक सक्रिय राजनीति में रहूंगा। इस बार का चुनाव असाधारण है। ये सरकार बनाने के लिए नहीं, बल्कि देश बचाने के लिए हो रहा है। हर सीट जरूरी है, इसलिए राष्ट्रीय अध्यक्ष ने कहा कि आपको चुनाव लड़ना है। दोबारा से मन बनाकर मैदान में उतरा हूं।
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अमर उजाला : राजन सुशांत आपको टारगेट कर रहे हैं। पहले आरोप लगाया कि हिमाचल में भाजपा को जेपी कंपनी चला रही है। फिर कहा कि आपके चेले ऐसे लोग हो सकते हैं, जिनका अपना कोई योगदान राजनीति में नहीं है। क्या कहते हैं?
शांता कुमार : देखिए! मेरा मुकाबला कांग्रेस से है। किसी और के बारे में कुछ भी कहने की जरूरत मैं नहीं समझता।
अमर उजाला : मुख्यमंत्री वीरभद्र पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपाें पर आपने उनसे इस्तीफा तो मांगा पर देरी से। वीरभद्र भी आप पर मेहरबान दिखते हैं। ऐसा क्यों?
शांता कुमार : ऐसी बात नहीं है। जैसे ही उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप सार्वजनिक हुए, मैंने उनके इस्तीफे की मांग की थी। देखिए! हम पुरानी पीढ़ी के लोग हैं। आलोचना भी शालीनता से करते हैं। मैं व्यक्तिवादी नहीं, बल्कि सिद्धांतवादी राजनीति का पक्षधर रहा हूं। गालियां नहीं दे सकता। इस्तीफा मांग लिया और क्या पत्थर मारूं? डा. परमार के समय भी हम ऐसी ही राजनीति करते थे। लेकिन आज माहौल बदल गया है।
अमर उजाला : गुजरात दंगाें के बाद आपके एक बयान के कारण आपको केंद्रीय मंत्री पद खोना पड़ा था? अब नरेंद्र मोदी के बारे में राय बदलने के क्या कारण हैं?
शांता कुमार : जब जो उचित लगा, तब वो कह दिया। मैं ये नहीं सोचता कि कब क्या बोलना चाहिए। समय की जरूरत के हिसाब से सच बोलने का साहस रखता हूं। इसके बदले बेशक कीमत चुकानी पड़ी हो। आज समय की जरूरत नरेंद्र मोदी हैं। मेरे समर्थन से भी पहले देश की जनता ने उन्हें प्रधानमंत्री पद का सबसे मजबूत दावेदार बना दिया था। भारत के इतिहास में यह पहली घटना है कि चुनाव से पहले ही कोई दावेदार भावी प्रधानमंत्री के तौर पर देखा जा रहा हो। मैं पीछे मुड़कर नहीं देखता।
अमर उजाला : आप राजनीति में परिवारवाद के विरोधी रहे हैं, लेकिन भाजपा में ही परिवारवाद को नहीं रोक पाए। क्यों?
शांता कुमार : पूरे देश में राजनीति का अवमूल्यन हुआ है। भाजपा पर भी इसे छींटे पड़े हैं। परिवारों की राजनीति घातक होती है। मेरा मानना है कि लोकतंत्र में परिवार तंत्र नहीं होना चाहिए। इससे भ्रष्टाचार बढ़ता है। कांग्रेस इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। पूरे देश में कांग्रेस के पास कई योग्य नेता हैं, लेकिन प्रधानमंत्री एक ही परिवार से या उनकी पसंद से होगा। यदि कांग्रेस ने प्रणब मुखर्जी को राष्ट्रपति भवन में बंद करने के बजाय प्रधानमंत्री बनाया होता तो आज चुनाव लड़ने में हमें भी मजा आता। अब तो एकतरफा मैच हो गया है। इसलिए भाजपा को भी परिवारवाद को रोकने के ठोस प्रयास करने चाहिए।
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अमर उजाला : आपने कई साल पहले चुनाव न लड़ने का ऐलान कर दिया था। इसके बाद राज्यसभा सांसद बने, लेकिन अब दोबारा चुनाव लड़ने को तैयार हो गए। क्या ये इमोशनल ब्लैकमेलिंग नहीं है?
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शांता कुमार : मैंने निर्णय लिया था कि अब चुनाव नहीं लडूंगा, लेकिन अंतिम समय तक सक्रिय राजनीति में रहूंगा। इस बार का चुनाव असाधारण है। ये सरकार बनाने के लिए नहीं, बल्कि देश बचाने के लिए हो रहा है। हर सीट जरूरी है, इसलिए राष्ट्रीय अध्यक्ष ने कहा कि आपको चुनाव लड़ना है। दोबारा से मन बनाकर मैदान में उतरा हूं।
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अमर उजाला : राजन सुशांत आपको टारगेट कर रहे हैं। पहले आरोप लगाया कि हिमाचल में भाजपा को जेपी कंपनी चला रही है। फिर कहा कि आपके चेले ऐसे लोग हो सकते हैं, जिनका अपना कोई योगदान राजनीति में नहीं है। क्या कहते हैं?
शांता कुमार : देखिए! मेरा मुकाबला कांग्रेस से है। किसी और के बारे में कुछ भी कहने की जरूरत मैं नहीं समझता।
अमर उजाला : मुख्यमंत्री वीरभद्र पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपाें पर आपने उनसे इस्तीफा तो मांगा पर देरी से। वीरभद्र भी आप पर मेहरबान दिखते हैं। ऐसा क्यों?
शांता कुमार : ऐसी बात नहीं है। जैसे ही उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप सार्वजनिक हुए, मैंने उनके इस्तीफे की मांग की थी। देखिए! हम पुरानी पीढ़ी के लोग हैं। आलोचना भी शालीनता से करते हैं। मैं व्यक्तिवादी नहीं, बल्कि सिद्धांतवादी राजनीति का पक्षधर रहा हूं। गालियां नहीं दे सकता। इस्तीफा मांग लिया और क्या पत्थर मारूं? डा. परमार के समय भी हम ऐसी ही राजनीति करते थे। लेकिन आज माहौल बदल गया है।
अमर उजाला : गुजरात दंगाें के बाद आपके एक बयान के कारण आपको केंद्रीय मंत्री पद खोना पड़ा था? अब नरेंद्र मोदी के बारे में राय बदलने के क्या कारण हैं?
शांता कुमार : जब जो उचित लगा, तब वो कह दिया। मैं ये नहीं सोचता कि कब क्या बोलना चाहिए। समय की जरूरत के हिसाब से सच बोलने का साहस रखता हूं। इसके बदले बेशक कीमत चुकानी पड़ी हो। आज समय की जरूरत नरेंद्र मोदी हैं। मेरे समर्थन से भी पहले देश की जनता ने उन्हें प्रधानमंत्री पद का सबसे मजबूत दावेदार बना दिया था। भारत के इतिहास में यह पहली घटना है कि चुनाव से पहले ही कोई दावेदार भावी प्रधानमंत्री के तौर पर देखा जा रहा हो। मैं पीछे मुड़कर नहीं देखता।
अमर उजाला : आप राजनीति में परिवारवाद के विरोधी रहे हैं, लेकिन भाजपा में ही परिवारवाद को नहीं रोक पाए। क्यों?
शांता कुमार : पूरे देश में राजनीति का अवमूल्यन हुआ है। भाजपा पर भी इसे छींटे पड़े हैं। परिवारों की राजनीति घातक होती है। मेरा मानना है कि लोकतंत्र में परिवार तंत्र नहीं होना चाहिए। इससे भ्रष्टाचार बढ़ता है। कांग्रेस इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। पूरे देश में कांग्रेस के पास कई योग्य नेता हैं, लेकिन प्रधानमंत्री एक ही परिवार से या उनकी पसंद से होगा। यदि कांग्रेस ने प्रणब मुखर्जी को राष्ट्रपति भवन में बंद करने के बजाय प्रधानमंत्री बनाया होता तो आज चुनाव लड़ने में हमें भी मजा आता। अब तो एकतरफा मैच हो गया है। इसलिए भाजपा को भी परिवारवाद को रोकने के ठोस प्रयास करने चाहिए।