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मिलता रहा आश्वासन, निकल गई जान
ब्यूरो/अमर उजाला संतकबीरनगर
Updated Fri, 17 Jun 2016 11:55 PM IST
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जान चली गई।
- फोटो : अंबरीश मिश्रा
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पुरानी तहसील खलीलाबाद के रहने वाले एक गरीब परिवार का दुख पीछा नहीं छोड़ रहा है। प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के स्तर से सिर्फ मदद का आश्वासन मिलता रहा और आखिरकार शुक्रवार को इकलौते कैंसर पीड़ित बेटे दीपक गुप्ता की जान निकल गई। एक साल पहले पिता विजय गुप्ता की कैंसर की बीमारी से मौत हो गई थी। अब परिवार में कोई पुरुष सदस्य नहीं बचा। बूढ़ी दादी, मां और तीन बहनों की देखभाल कौन करेेगा यह सवाल हर किसी की जुबान पर था। इस गरीब परिवार के हालात और उनके दर्द को देख कर हर किसी की आंखों से आंसू छलक पड़ा।
पुरानी तहसील मोहल्ला निवासी मां- बाप के इकलौते बेटे 21 वर्षीय दीपक गुप्ता को फेफडें में कैंसर की बीमारी थी। पैसे के अभाव में ठीक से उपचार नहीं पाया। वैसे तो सीएमओ ने पीजीआई रेफर कराया था, जहां से उपचार करने के बजाए ,बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था। कई जनप्रतिनिधियों ने पीड़ित के घर पहुंच कर उपचार में होने वाले खर्च को शासन से दिलाने का भरोसा जताया था, लेकिन वह सिर्फ कोरा आश्वासन साबित हुआ। गरीबी और लाचारगी भरी जिंदगी गुजारने वाले परिवार ने ठीक से उपचार नहीं करा पाया और दीपक की मौत हो गई। पिता विजय की भी कैंसर की बीमारी से एक साल पहले मौत हो गई थी। परिवार में दो लोगों को कैंसर ने जकड़ा तो मकान और जेवर सब बिक गया। किराए के मकान में रह कर गरीब परिवार गुजर बसर कर रहा है। एक साल के भीतर पहले पिता और फिर बेटे की मौत का गहरा जख्म बूढ़ी दादी प्रभावती और मां सुशीला को मिला है। दीपक की 18 वर्षीय बहन दीपिका,16 वर्षीय सलोनी और 13 वर्षीय शिवानी बेसुध थी। पिता की मौत के बाद अभिभावक भाई की हुई मौत ने तीनों बहनों को बेसहारा कर दिया। पीड़ित परिजनों का रो- रो कर बुरा हाल था। उस रास्ते से गुजरने वाले लोग के पग परिजनों के करुण कंद्रन सुनकर स्वत: कुछ देर के लिए रूक जाते थे। जुटी भीड़ यहीं कह रही थी कि इस परिवार का दुख पीछा नहीं छोड़ रही है। यदि समय से मदद मिली होती और सही से उपचार हुआ होता तो शायद इस परिवार का आखिरी चिराग नहीं बुझता। साए की तरह बेबस परिवार का पीछा कर रही कैंसर की बीमारी ने दोनों पुरुष सदस्यों की मौत हो गई। अब असहाय और लाचार परिवार को मदद की दरकार है।
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पुरानी तहसील मोहल्ला निवासी मां- बाप के इकलौते बेटे 21 वर्षीय दीपक गुप्ता को फेफडें में कैंसर की बीमारी थी। पैसे के अभाव में ठीक से उपचार नहीं पाया। वैसे तो सीएमओ ने पीजीआई रेफर कराया था, जहां से उपचार करने के बजाए ,बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था। कई जनप्रतिनिधियों ने पीड़ित के घर पहुंच कर उपचार में होने वाले खर्च को शासन से दिलाने का भरोसा जताया था, लेकिन वह सिर्फ कोरा आश्वासन साबित हुआ। गरीबी और लाचारगी भरी जिंदगी गुजारने वाले परिवार ने ठीक से उपचार नहीं करा पाया और दीपक की मौत हो गई। पिता विजय की भी कैंसर की बीमारी से एक साल पहले मौत हो गई थी। परिवार में दो लोगों को कैंसर ने जकड़ा तो मकान और जेवर सब बिक गया। किराए के मकान में रह कर गरीब परिवार गुजर बसर कर रहा है। एक साल के भीतर पहले पिता और फिर बेटे की मौत का गहरा जख्म बूढ़ी दादी प्रभावती और मां सुशीला को मिला है। दीपक की 18 वर्षीय बहन दीपिका,16 वर्षीय सलोनी और 13 वर्षीय शिवानी बेसुध थी। पिता की मौत के बाद अभिभावक भाई की हुई मौत ने तीनों बहनों को बेसहारा कर दिया। पीड़ित परिजनों का रो- रो कर बुरा हाल था। उस रास्ते से गुजरने वाले लोग के पग परिजनों के करुण कंद्रन सुनकर स्वत: कुछ देर के लिए रूक जाते थे। जुटी भीड़ यहीं कह रही थी कि इस परिवार का दुख पीछा नहीं छोड़ रही है। यदि समय से मदद मिली होती और सही से उपचार हुआ होता तो शायद इस परिवार का आखिरी चिराग नहीं बुझता। साए की तरह बेबस परिवार का पीछा कर रही कैंसर की बीमारी ने दोनों पुरुष सदस्यों की मौत हो गई। अब असहाय और लाचार परिवार को मदद की दरकार है।
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