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राजस्थान: 43 साल से जमा राशि के बाद भी नहीं मिला प्लॉट, हाईकोर्ट ने नगरपालिका के अध्यक्ष और अधिकारी को बुलाया

Sat, 17 Oct 2026 10:02 AM IST
आशुतोष प्रताप सिंह न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर Published by: आशुतोष प्रताप सिंह Updated Sat, 17 Oct 2026 10:02 AM IST
सार

राजस्थान हाईकोर्ट ने दो अलग-अलग मामलों में अहम निर्देश दिए हैं। पहले मामले में अदालत ने कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के आरोपों का सामना कर रहे एक ब्लॉक मुख्य चिकित्सा अधिकारी का निलंबन आदेश निरस्त कर दिया। न्यायमूर्ति अनूप कुमार ने कहा कि निलंबन का उद्देश्य कर्मचारी को दंडित करना नहीं, बल्कि निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करना है।

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rajasthan high court suspension order quashed 43 year land dispute niwai municipality
राजस्थान हाई कोर्ट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

राजस्थान हाईकोर्ट ने निलंबन और अनुशासनात्मक कार्रवाई को लेकर अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि किसी कर्मचारी को निलंबित करने का उद्देश्य उसे दंडित करना नहीं, बल्कि मामले की निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करना है। अदालत ने कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के आरोपों का सामना कर रहे एक ब्लॉक मुख्य चिकित्सा अधिकारी का निलंबन आदेश निरस्त कर दिया। साथ ही राज्य सरकार को आरोप पत्र तामील होने की तारीख से छह महीने के भीतर अनुशासनात्मक कार्रवाई पूरी करने का निर्देश दिया। वहीं, एक अन्य मामले में हाईकोर्ट ने 90 वर्षीय सेवानिवृत्त शिक्षक को 43 साल बाद भी आवंटित भूखंड का कब्जा और पट्टा नहीं मिलने पर सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने निवाई नगरपालिका के अध्यक्ष और कार्यकारी अधिकारी को 26 अक्टूबर को दोपहर दो बजे व्यक्तिगत रूप से पेश होने का आदेश दिया है। दोनों मामलों में अदालत ने अलग-अलग परिस्थितियों पर सुनवाई करते हुए महत्वपूर्ण निर्देश दिए हैं।

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निलंबन का उद्देश्य निष्पक्ष जांच, सजा देना नहीं

न्यायमूर्ति अनूप कुमार ने राज्य सरकार की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि निलंबन का मुख्य उद्देश्य जांच को निष्पक्ष बनाए रखना है। इससे यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि संबंधित कर्मचारी साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ न करे और गवाहों को प्रभावित न कर सके। निलंबन को अपने आप में दंड का रूप नहीं माना जा सकता। मामले के अनुसार, एक महिला कर्मचारी ने ब्लॉक मुख्य चिकित्सा अधिकारी के खिलाफ कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की शिकायत दर्ज कराई थी। मामले की निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने के लिए प्रशासन ने संबंधित अधिकारी को 16 जनवरी को निलंबित कर दिया था।

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निलंबन आदेश के खिलाफ अधिकारी ने सिविल सेवा अपीलीय अधिकरण में अपील की। अधिकरण ने तकनीकी आधार पर उन्हें राहत देते हुए कहा कि उस समय उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई लंबित नहीं थी।

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अधिकरण से राहत मिलने पर अधिकारी को किया बहाल

मामले में हाईकोर्ट में याचिका लंबित रहने के दौरान ही अधिकरण के आदेश का पालन करते हुए संबंधित अधिकारी को बहाल कर दिया गया। इसके बाद उन्हें अलवर में नई तैनाती भी दे दी गई। राज्य सरकार की ओर से हाईकोर्ट में दलील दी गई कि निलंबन के तुरंत बाद आरोप पत्र तैयार करने और सक्षम प्राधिकारी से उसकी मंजूरी लेने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई थी। हालांकि, इसी बीच अधिकरण ने अधिकारी को राहत दे दी। हाईकोर्ट ने निलंबन के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए आदेश निरस्त कर दिया। साथ ही निर्देश दिया कि आरोप पत्र तामील होने की तारीख से छह महीने के भीतर अनुशासनात्मक कार्रवाई पूरी की जाए।

43 साल से भूखंड का इंतजार, 90 वर्षीय बुजुर्ग के मामले में हाईकोर्ट सख्त

एक अन्य मामले में राजस्थान हाईकोर्ट ने 90 वर्षीय सेवानिवृत्त शिक्षक मदनलाल गौतम को भूखंड का कब्जा और पट्टा नहीं मिलने पर गंभीर नाराजगी जताई। अदालत ने निवाई नगरपालिका के अध्यक्ष और कार्यकारी अधिकारी को 26 अक्टूबर को दोपहर दो बजे व्यक्तिगत रूप से पेश होने का आदेश दिया है।
न्यायमूर्ति अशोक कुमार जैन ने मदनलाल गौतम की ओर से दायर द्वितीय सिविल अपील पर सुनवाई करते हुए दोनों अधिकारियों से जवाब मांगा। अदालत ने पूछा कि चार दशक से अधिक समय बीत जाने के बावजूद याचिकाकर्ता को आवंटित भूखंड का भौतिक कब्जा और पट्टा क्यों नहीं दिया गया।

1983 में हुआ था भूखंड का आवंटन, 1985 में जमा कराई राशि

अपीलकर्ता के अधिवक्ता प्रहलाद शर्मा ने अदालत को बताया कि मदनलाल गौतम को वर्ष 1983 में निवाई की दीनदयाल कॉलोनी में एक भूखंड आवंटित किया गया था। उन्होंने वर्ष 1985 में भूखंड की निर्धारित राशि भी जमा करा दी थी। हालांकि, इस बीच नगरपालिका ने भूखंडों के क्रमांकों में बदलाव कर दिया। इसके कारण उनके आवंटित भूखंड की स्थिति बदल गई। इसके बाद भी नगरपालिका ने न तो उन्हें भूखंड का भौतिक कब्जा सौंपा और न ही पट्टा जारी किया। चार दशक से अधिक समय बीत जाने और बुजुर्ग की उम्र 90 वर्ष हो जाने के बावजूद भूखंड का कब्जा नहीं मिलने के मामले को अदालत ने गंभीरता से लिया है। इसी के चलते नगरपालिका के अध्यक्ष और कार्यकारी अधिकारी को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर जवाब देने के निर्देश दिए गए हैं।

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