आईएएस अधिकारी ने 47 साल बाद जीती गोल्ड मेडल की लड़ाई
81 साल के पूर्व आईएएस अधिकारी अजीत सिंह सिंघवी के जीवन में चार दशक बाद फिर एक खुशनुमा लम्हा आया है। 47 साल की लंबी लड़ाई के बाद उन्हें एलएलबी में टॉप करने के लिए गोल्ड मेडल मिला है। हालांकि इसके लिए आदेश 2003 में ही हो गए थे लेकिन विश्वविद्यालय ने भी उन्हें मेडल देने में 13 साल लगा दिए। गुरुवार को विश्वविद्यालय के अधिकारी ने उन्हें एलएलबी में टॉपर होने का सर्टिफिकेट प्रदान किया।
टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के अनुसार अजीत सिंह ने 1969 में बीकानेर के डूंगर लॉ कालेज से एलएबी की दो वर्षीय डिग्री ली थी। जिसमें उन्हें यूनिविर्सिटी में दूसरा स्थान प्राप्त हुआ था। आरोप है कि विश्वविद्यालय ने नियमों में बदलाव करते हुए अंतिम वर्ष के अंकों के आधार पर उनकी जगह सवाई सिंह को टॉपर घोषित कर दिया था। जबकि अजीत सिंह का दावा था कि मेरिट तय करने के लिए दोनों वर्षों का कुल टोटल जोड़ जाना चाहिए।
अजीत सिंह बताते हैं कि अगर मैं अपनी लड़ाई बीच में छोड़ देता तो इससे समाज के सामने गलत उदाहरण जाता। इसलिए एक उच्च उदाहरण पेश करने की मंशा के चलते मैं दशकों तक यह लड़ाई लड़ता रहा। बता दें कि सिंघवी ने एलएलबी करने से पहले ही 1958 में आरएएस की परीक्षा पास कर ली थी। लेकिन अपने परिवार की विरासत आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने कानून की डिग्री ली।
कानून की डिग्री के लिए लड़ी 47 साल की कानूनी लड़ाई
वो बताते हैं कि मैंने साल 1967 में एलएलबी में इस मंशा से दाखिला लिया था कि अगर मैं वकालत नहीं भी करुंगा तो मेरी नौकरी में इसका काफी महत्व रहेगा। मैंने अपने पहले साल के रिजल्ट में विश्वविद्यालय में सबसे ज्यादा अंक प्राप्त किए। लेकिन दूसरे वर्ष में मैं विश्वविद्यालय टॉपर घोषित किए गए व्यक्ति से कुछ अंक से पीछे रह गया। उन्हें दोनों वर्षों के कुल अंकों की बजाय दूसरे वर्ष के अंकों के आधार पर टॉपर घोषित किया गया था।
मैंने इसके विरोध किया लेकिन विश्वविद्यालय ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया। 90 के दशक के शुरूआती वर्षों में स्थानीय अदालत ने उन्हें एलएलबी टॉपर घोषित कर दिया लेकिन मामला जयपुर हाईकोर्ट में चला गया। जहां से उन्हें दशकों बाद न्याय मिला और कोर्ट ने ही उन्हें असली टॉपर माना।
हालांकि इस बीच बीकानेर और जयपुर अदालत में वह 300 मुकदमों की कार्यवाही कर चुके थे। खास बात ये है कि साल 2003 में आए इस आदेश के बाद राजस्थान विश्वविद्यालय ने भी उन्हें 13 साल बाद असली डिग्री से नवाजा।