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टोंक की टक्कर में सचिन पायलट और यूनुस खान में कौन किस पर भारी?
प्रबुद्ध जैन, अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Fri, 30 Nov 2018 07:13 AM IST
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सचिन पायलट बनाम यूनुस खान
- फोटो : Amar Ujala
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टोंक। राजस्थान की राजधानी जयपुर से 100 किलोमीटर की दूरी पर बसा एक शहर जो राजस्थान का लखनऊ भी कहलाता है, अदब का गुलशन भी। मीठे खरबूजों का चमन भी, हिंदू-मुस्लिम एकता का मस्कन भी।
साल 2018 के नवंबर-दिसंबर में इसे एक नई पहचान मिल चुकी है। ये वो सीट है जहां से चुनावी रणभूमि में दो योध्दा हैं। दोनों खास। एक तरफ हैं राजस्थान कांग्रेस के मुखिया सचिन पायलट तो दूसरी ओर हैं राजस्थान सरकार में मंत्री यूनुस खान।
यूं देखा जाए तो टोंक के लिए न तो सचिन पायलट उसकी अपनी मिट्टी से उपजे नेता हैं और न ही यूनुस खान। दोनों कुछ मजबूरियों के चलते इस मैदान में उतरे हैं। सियासी मजबूरियां हमेशा मन और इच्छा पर भारी पड़ती हैं। तब और भी, जब जीत और हार के सवाल राजनीतिक भविष्य पर सवालिया निशान लगाने की ताकत रखते हों। इस केस में भी ऐसा ही है।
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पहले चर्चा थी कि सचिन सिर्फ ऊपर हवा में रहकर चीजों को 'पायलट' करना चाहते हैं। जमीन पर उतरने की उनकी इच्छा नहीं। लेकिन, बाद में जब गहलोत कूदे तो उन्हें भी उतरना ही पड़ा।
उधर यूनुस खान, डीडवाना से लड़ते हैं लेकिन आनन-फानन में भाजपा ने अजीत सिंह मेहता के नाम का एलान करने के बाद भी उन्हें हटाकर खान को पायलट के सामने खड़ा कर दिया। मेहता यहां से मौजूदा विधायक हैं।
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साल 2018 के नवंबर-दिसंबर में इसे एक नई पहचान मिल चुकी है। ये वो सीट है जहां से चुनावी रणभूमि में दो योध्दा हैं। दोनों खास। एक तरफ हैं राजस्थान कांग्रेस के मुखिया सचिन पायलट तो दूसरी ओर हैं राजस्थान सरकार में मंत्री यूनुस खान।
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यूं देखा जाए तो टोंक के लिए न तो सचिन पायलट उसकी अपनी मिट्टी से उपजे नेता हैं और न ही यूनुस खान। दोनों कुछ मजबूरियों के चलते इस मैदान में उतरे हैं। सियासी मजबूरियां हमेशा मन और इच्छा पर भारी पड़ती हैं। तब और भी, जब जीत और हार के सवाल राजनीतिक भविष्य पर सवालिया निशान लगाने की ताकत रखते हों। इस केस में भी ऐसा ही है।
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पहले चर्चा थी कि सचिन सिर्फ ऊपर हवा में रहकर चीजों को 'पायलट' करना चाहते हैं। जमीन पर उतरने की उनकी इच्छा नहीं। लेकिन, बाद में जब गहलोत कूदे तो उन्हें भी उतरना ही पड़ा।
उधर यूनुस खान, डीडवाना से लड़ते हैं लेकिन आनन-फानन में भाजपा ने अजीत सिंह मेहता के नाम का एलान करने के बाद भी उन्हें हटाकर खान को पायलट के सामने खड़ा कर दिया। मेहता यहां से मौजूदा विधायक हैं।
टोंक का धार्मिक गणित
टोंक विधानसभा सीट पर 2 लाख से कुछ ज्यादा मतदाता हैं। इनमें 60 से 70 हजार मुस्लिम मतदाता हैं। इसके बाद दलित और गुर्जर आबादी है। यहां मुस्लिम वोटर निर्णायक भूमिका निभाते हैं। जाहिर है, पायलट और यूनुस की इस लड़ाई में टोंक का मजहबी गणित अहम हो जाता है। शायद यही वजह रही कि ऐन वक्त पर भाजपा ने रण का सिपहसालार बदल दिया यानी अजीत मेहता की जगह यूनुस खान को आगे कर दिया।पायलट की उड़ान होगी कामयाब?
sachin pilot
सचिन पायलट 2004 में दौसा और 2009 में अजमेर से लोकसभा चुनाव जीतकर संसद में पहुंचे थे। वो पहली बार विधानसभा चुनाव में उतरे हैं। राजस्थान के नक्शे पर टोंक को देखा जाए तो ये दौसा से करीब 120 और अजमेर से 190 किलोमीटर की दूरी पर है। यानी, अपने प्रभाव क्षेत्र का फायदा पायलट को मिल सकता है। जो बात उनके खिलाफ जाती है वो है परंपराओं का टूटना।
बीते 46 साल में ये पहली बार हुआ है कि इस मुस्लिम बहुल सीट पर कांग्रेस ने किसी गैर-मुस्लिम उम्मीदवार को उतारा हो। परंपराओं का टूटना तो अच्छी बात होती है लेकिन चुनावी परंपराएं जब टूटती हैं तो उम्मीदवारों के लिए अक्सर अच्छी खबर लेकर नहीं आतीं।
एक और बात जिस पर ध्यान दिया जाना बेहद जरूरी है वो है टोंक विधानसभा सीट पर बीते 7 चुनावों के नतीजे। ये सीट कांग्रेस के लिए इस कदर असुरक्षित है कि 7 में से सिर्फ दो बार उसे जीत मिली, 5 बार हार का सामना करना पड़ा।
यूनुस का टोंक से कोई सीधा वास्ता नहीं है। वो दो बार डीडवाना से विधायक रहे हैं-2003 और 2013 में। बसपा और एक निर्दलीय को मिला लिया जाए तो टोंक में तीन मुस्लिम उम्मीदवार हो गए हैं। ऐसे में, उनको कुछ नुकसान होना तय है। पायलट ने उन्हें छेड़ना भी शुरू कर दिया है। वो पूछ रहे हैं कि क्या योगी आदित्यनाथ, अपने उम्मीदवार का प्रचार करने टोंक नहीं आएंगे। ये विरोधी पर मनोवैज्ञानिक बढ़त हासिल करने की कोशिश है।
राजस्थान में अगर वसुंधरा राजे और मानवेंद्र के बीच हो रहे मुकाबले पर सबकी नजर होगी तो पायलट और यूनुस खान के बीच की लड़ाई पर भी। 11 दिसंबर को पता लग जाएगा कि बाजी किसके हाथ लगी।
बीते 46 साल में ये पहली बार हुआ है कि इस मुस्लिम बहुल सीट पर कांग्रेस ने किसी गैर-मुस्लिम उम्मीदवार को उतारा हो। परंपराओं का टूटना तो अच्छी बात होती है लेकिन चुनावी परंपराएं जब टूटती हैं तो उम्मीदवारों के लिए अक्सर अच्छी खबर लेकर नहीं आतीं।
एक और बात जिस पर ध्यान दिया जाना बेहद जरूरी है वो है टोंक विधानसभा सीट पर बीते 7 चुनावों के नतीजे। ये सीट कांग्रेस के लिए इस कदर असुरक्षित है कि 7 में से सिर्फ दो बार उसे जीत मिली, 5 बार हार का सामना करना पड़ा।
यूनुस खान का समीकरण का क्या कहता है?
यूनुस राजस्थान सरकार के कद्दावर मंत्री हैं। उनके पास पीडब्ल्यूडी विभाग है। यूनुस को वसुंधरा राजे का करीबी भी माना जाता है। टोंक में पार्टी का उन्हें उतारना काफी कुछ कहता है। उनके अलावा सरकार में हबीबुर्रहमान भी थे। लेकिन जब उन्हें टिकट नहीं मिला तो वो कांग्रेस में चले गए। यूनुस, 200 उम्मीदवारों में भाजपा के इकलौते मुस्लिम उम्मीदवार हैं। पार्टी ने उन्हें दमदार समझकर टोंक में टांग तो दिया लेकिन चुनौतियां कई हैं।यूनुस का टोंक से कोई सीधा वास्ता नहीं है। वो दो बार डीडवाना से विधायक रहे हैं-2003 और 2013 में। बसपा और एक निर्दलीय को मिला लिया जाए तो टोंक में तीन मुस्लिम उम्मीदवार हो गए हैं। ऐसे में, उनको कुछ नुकसान होना तय है। पायलट ने उन्हें छेड़ना भी शुरू कर दिया है। वो पूछ रहे हैं कि क्या योगी आदित्यनाथ, अपने उम्मीदवार का प्रचार करने टोंक नहीं आएंगे। ये विरोधी पर मनोवैज्ञानिक बढ़त हासिल करने की कोशिश है।
राजस्थान में अगर वसुंधरा राजे और मानवेंद्र के बीच हो रहे मुकाबले पर सबकी नजर होगी तो पायलट और यूनुस खान के बीच की लड़ाई पर भी। 11 दिसंबर को पता लग जाएगा कि बाजी किसके हाथ लगी।