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राजस्थान: विधानसभा सत्र के बीच थावरचंद डामोर का सरकार पर हमला, बोले- आदिवासियों के साथ हुआ राजनीतिक दिखावा
Thu, 20 Aug 2026 12:09 PM IST
जयपुर ब्यूरो
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर
Published by: जयपुर ब्यूरो
Updated Thu, 20 Aug 2026 12:09 PM IST
सार
Rajasthan News: राजस्थान विधानसभा सत्र से पहले धरियावद विधायक थावरचंद डामोर ने आदिवासी क्षेत्रों की बदहाली, जल-जंगल-जमीन, रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य के मुद्दों पर सरकार को घेरा। उन्होंने विश्व आदिवासी दिवस के विवाद पर भी प्रतिक्रिया देते हुए आदिवासी अधिकारों को प्राथमिकता देने की मांग की।
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विधायक थावर चंद डामोर
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
राजस्थान विधानसभा का सत्र शुरू होने से पहले धरियावद विधायक थावरचंद डामोर ने आदिवासी मुद्दों, विश्व आदिवासी दिवस को लेकर हुए विवाद और आदिवासी क्षेत्रों की बदहाली को लेकर सरकारों पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि आजादी के करीब 80 वर्ष बाद भी आदिवासी समाज की स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ है। विभिन्न सरकारों ने आदिवासी समाज के वास्तविक विकास के बजाय राजनीतिक दिखावा अधिक किया है।
'गंभीर मुद्दों पर कैसे होगी चर्चा?'
विधायक डामोर ने कहा कि विधानसभा सत्र से प्रदेश के युवाओं, विद्यार्थियों, किसानों और आम जनता को बड़ी उम्मीदें होती हैं। रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, कानून व्यवस्था और विकास जैसे मुद्दों पर गंभीर चर्चा और ठोस फैसलों की उम्मीद रहती है। उन्होंने सत्र की अवधि कम होने की आशंका जताते हुए कहा कि यदि सदन केवल दो-तीन दिन चलता है तो जनता से जुड़े गंभीर मुद्दों पर सार्थक बहस संभव नहीं होगी।
जल-जंगल-जमीन से लेकर मानगढ़ तक उठाएंगे मुद्दे
डामोर ने कहा कि वह विधानसभा में युवाओं के रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, जल-जंगल-जमीन, आदिवासी क्षेत्रों के विकास और मानगढ़ जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाएंगे। उन्होंने आरोप लगाया कि टाइगर रिजर्व और वन क्षेत्रों के नाम पर कई जगह आदिवासियों की जमीनों के अधिग्रहण की स्थिति पैदा हो रही है। वहीं, वन अधिकार कानूनों का लाभ भी जरूरतमंद लोगों तक प्रभावी तरीके से नहीं पहुंच रहा।
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विश्व आदिवासी दिवस पर भाजपा प्रदेशाध्यक्ष को दिया जवाब
विश्व आदिवासी दिवस को लेकर भाजपा प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए डामोर ने कहा कि 9 अगस्त को मनाया जाने वाला विश्व आदिवासी दिवस संयुक्त राष्ट्र स्तर पर मान्यता प्राप्त दिवस है। इसका उद्देश्य दुनिया भर के आदिवासी समुदायों की संस्कृति, परंपराओं, अधिकारों और प्रकृति संरक्षण में उनकी भूमिका को पहचान देना है।
बिरसा मुंडा से टंट्या मामा तक, गिनाए आदिवासी नायक
डामोर ने कहा कि भगवान बिरसा मुंडा की जयंती और विश्व आदिवासी दिवस का अपना अलग महत्व है। बिरसा मुंडा आदिवासी समाज के महान नायक और स्वतंत्रता संघर्ष के प्रतीक हैं, जबकि विश्व आदिवासी दिवस दुनिया भर के आदिवासी समुदायों की सामूहिक पहचान, संस्कृति और अधिकारों से जुड़ा है। उन्होंने टंट्या मामा, तिलका मांझी, सिद्धू-कान्हू और चांद-भैरव सहित कई आदिवासी वीरों का भी उल्लेख किया।
मूर्तियां बनाने से नहीं, विचारों पर अमल से होगा विकास
विधायक ने आरोप लगाया कि राजनीतिक दल आदिवासी महापुरुषों के नाम पर मूर्तियां, स्मारक और आयोजन तो करते हैं, लेकिन उनके विचारों को जमीन पर लागू करने की गंभीरता नहीं दिखाते। उन्होंने कहा कि यदि बिरसा मुंडा के विचारों को सही मायने में अपनाया जाए तो जल, जंगल और जमीन की रक्षा तथा आदिवासी अधिकारों को प्राथमिकता देनी होगी।
पौधारोपण अभियान पर भी उठाए सवाल
डामोर ने पर्यावरण संरक्षण को लेकर सरकार की नीतियों पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि एक ओर बड़े पैमाने पर पौधारोपण अभियान चलाए जाते हैं, जबकि दूसरी ओर बड़े प्रोजेक्ट और अन्य गतिविधियों के कारण जंगलों और पेड़ों को नुकसान पहुंचने के आरोप सामने आते हैं। उन्होंने पौधारोपण अभियानों की सफलता की निगरानी की मांग की।
पलायन, कुपोषण और रोजगार पर सरकार से मांगा जवाब
आदिवासियों को मुख्यधारा में लाने के दावों पर सवाल उठाते हुए डामोर ने कहा कि सरकारी दावों में विकास की तस्वीर अलग दिखाई देती है, जबकि जमीनी हकीकत कई क्षेत्रों में अलग है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या आदिवासी क्षेत्रों से पलायन रुका है, कुपोषण खत्म हुआ है और शिक्षा, रोजगार व स्वास्थ्य सुविधाओं में पर्याप्त सुधार हुआ है।
'वर्तमान के साथ पिछली सरकारें भी जिम्मेदार'
डामोर ने कहा कि आजादी के दशकों बाद भी आदिवासी क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं, रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य की चुनौतियां बनी हुई हैं। इसके लिए वर्तमान सरकार के साथ पूर्ववर्ती सरकारों को भी जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि विश्व आदिवासी दिवस पर विवाद खड़ा करने के बजाय आदिवासी समाज की वास्तविक समस्याओं पर चर्चा होनी चाहिए।
विधानसभा में धरियावद की आवाज मजबूती से उठाने का दावा
डामोर ने कहा कि आदिवासी समाज अब अपने अधिकारों और पहचान को लेकर अधिक जागरूक हो रहा है। जल-जंगल-जमीन, संस्कृति और संवैधानिक अधिकारों के मुद्दे मजबूती से उठाए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि विधानसभा सत्र में वह इन मुद्दों को सरकार के सामने रखेंगे और धरियावद सहित आदिवासी अंचलों की उपेक्षा को लेकर जवाब मांगेंगे।
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'गंभीर मुद्दों पर कैसे होगी चर्चा?'
विधायक डामोर ने कहा कि विधानसभा सत्र से प्रदेश के युवाओं, विद्यार्थियों, किसानों और आम जनता को बड़ी उम्मीदें होती हैं। रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, कानून व्यवस्था और विकास जैसे मुद्दों पर गंभीर चर्चा और ठोस फैसलों की उम्मीद रहती है। उन्होंने सत्र की अवधि कम होने की आशंका जताते हुए कहा कि यदि सदन केवल दो-तीन दिन चलता है तो जनता से जुड़े गंभीर मुद्दों पर सार्थक बहस संभव नहीं होगी।
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जल-जंगल-जमीन से लेकर मानगढ़ तक उठाएंगे मुद्दे
डामोर ने कहा कि वह विधानसभा में युवाओं के रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, जल-जंगल-जमीन, आदिवासी क्षेत्रों के विकास और मानगढ़ जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाएंगे। उन्होंने आरोप लगाया कि टाइगर रिजर्व और वन क्षेत्रों के नाम पर कई जगह आदिवासियों की जमीनों के अधिग्रहण की स्थिति पैदा हो रही है। वहीं, वन अधिकार कानूनों का लाभ भी जरूरतमंद लोगों तक प्रभावी तरीके से नहीं पहुंच रहा।
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विश्व आदिवासी दिवस पर भाजपा प्रदेशाध्यक्ष को दिया जवाब
विश्व आदिवासी दिवस को लेकर भाजपा प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए डामोर ने कहा कि 9 अगस्त को मनाया जाने वाला विश्व आदिवासी दिवस संयुक्त राष्ट्र स्तर पर मान्यता प्राप्त दिवस है। इसका उद्देश्य दुनिया भर के आदिवासी समुदायों की संस्कृति, परंपराओं, अधिकारों और प्रकृति संरक्षण में उनकी भूमिका को पहचान देना है।
बिरसा मुंडा से टंट्या मामा तक, गिनाए आदिवासी नायक
डामोर ने कहा कि भगवान बिरसा मुंडा की जयंती और विश्व आदिवासी दिवस का अपना अलग महत्व है। बिरसा मुंडा आदिवासी समाज के महान नायक और स्वतंत्रता संघर्ष के प्रतीक हैं, जबकि विश्व आदिवासी दिवस दुनिया भर के आदिवासी समुदायों की सामूहिक पहचान, संस्कृति और अधिकारों से जुड़ा है। उन्होंने टंट्या मामा, तिलका मांझी, सिद्धू-कान्हू और चांद-भैरव सहित कई आदिवासी वीरों का भी उल्लेख किया।
मूर्तियां बनाने से नहीं, विचारों पर अमल से होगा विकास
विधायक ने आरोप लगाया कि राजनीतिक दल आदिवासी महापुरुषों के नाम पर मूर्तियां, स्मारक और आयोजन तो करते हैं, लेकिन उनके विचारों को जमीन पर लागू करने की गंभीरता नहीं दिखाते। उन्होंने कहा कि यदि बिरसा मुंडा के विचारों को सही मायने में अपनाया जाए तो जल, जंगल और जमीन की रक्षा तथा आदिवासी अधिकारों को प्राथमिकता देनी होगी।
पौधारोपण अभियान पर भी उठाए सवाल
डामोर ने पर्यावरण संरक्षण को लेकर सरकार की नीतियों पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि एक ओर बड़े पैमाने पर पौधारोपण अभियान चलाए जाते हैं, जबकि दूसरी ओर बड़े प्रोजेक्ट और अन्य गतिविधियों के कारण जंगलों और पेड़ों को नुकसान पहुंचने के आरोप सामने आते हैं। उन्होंने पौधारोपण अभियानों की सफलता की निगरानी की मांग की।
पलायन, कुपोषण और रोजगार पर सरकार से मांगा जवाब
आदिवासियों को मुख्यधारा में लाने के दावों पर सवाल उठाते हुए डामोर ने कहा कि सरकारी दावों में विकास की तस्वीर अलग दिखाई देती है, जबकि जमीनी हकीकत कई क्षेत्रों में अलग है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या आदिवासी क्षेत्रों से पलायन रुका है, कुपोषण खत्म हुआ है और शिक्षा, रोजगार व स्वास्थ्य सुविधाओं में पर्याप्त सुधार हुआ है।
'वर्तमान के साथ पिछली सरकारें भी जिम्मेदार'
डामोर ने कहा कि आजादी के दशकों बाद भी आदिवासी क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं, रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य की चुनौतियां बनी हुई हैं। इसके लिए वर्तमान सरकार के साथ पूर्ववर्ती सरकारों को भी जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि विश्व आदिवासी दिवस पर विवाद खड़ा करने के बजाय आदिवासी समाज की वास्तविक समस्याओं पर चर्चा होनी चाहिए।
विधानसभा में धरियावद की आवाज मजबूती से उठाने का दावा
डामोर ने कहा कि आदिवासी समाज अब अपने अधिकारों और पहचान को लेकर अधिक जागरूक हो रहा है। जल-जंगल-जमीन, संस्कृति और संवैधानिक अधिकारों के मुद्दे मजबूती से उठाए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि विधानसभा सत्र में वह इन मुद्दों को सरकार के सामने रखेंगे और धरियावद सहित आदिवासी अंचलों की उपेक्षा को लेकर जवाब मांगेंगे।