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राजस्थान: अनूपगढ़ में किसानों में आपसी सहमति न बनने से खत्म हुआ किसान आंदोलन
Tue, 13 Oct 2026 12:45 PM IST
प्रतीक पांडेय
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, अनूपगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, अनूपगढ़
Published by: प्रतीक पांडेय
Updated Tue, 13 Oct 2026 12:45 PM IST
सार
राजस्थान के अनूपगढ़ में सिंचाई पानी की मांग को लेकर चल रहा 21 दिन का किसान आंदोलन समाप्त हो गया है। अनूपगढ़ और घड़साना के किसानों के बीच जल आवंटन और रेगुलेशन को लेकर सहमति नहीं बन सकी।
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आंदोलन कर रहे किसान (फाइल फोटो)
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
सिंचाई के लिए पानी की मांग को लेकर अनूपगढ़ में चल रहा 21 दिन का किसान आंदोलन किसानों के बीच आपसी एकराय न बन पाने के कारण समाप्त हो गया है। घड़साना और अनूपगढ़ के किसानों में जल आवंटन के प्रस्तावों को लेकर सहमति नहीं बन सकी। सरसों की बुवाई का समय निकल जाने और किसान संगठनों के बीच मतभेद गहराने के कारण अनूपगढ़ के किसान नेताओं ने बैठक कर धरने को समाप्त करने का निर्णय लिया है। व्यापार मंडल अध्यक्ष सुनील गोदारा ने बताया कि किसानों की फूट का लाभ उठाकर प्रशासन ने रेगुलेशन आगे खिसका दिया, जिससे पूरा क्षेत्र सिंचाई के समय पर पानी पाने से वंचित रह गया।
सरसों की बुवाई का सबसे अनुकूल समय निकल गया
व्यापार मंडल अध्यक्ष सुनील गोदारा ने बताया कि सिंचाई पानी की मांग को लेकर यह आंदोलन अगस्त में मुख्यमंत्री के अनूपगढ़ दौरे के समय शुरू हुआ था। किसानों की मुख्य मांग थी कि इंदिरा गांधी नहर परियोजना के प्रथम चरण की नहरों को अक्तूबर में चार में से दो समूहों में चलाकर पर्याप्त पानी दिया जाए। वर्तमान में बांध में 1372 फीट पानी उपलब्ध होने के बावजूद किसानों को सही समय पर पानी नहीं मिल सका। इसके परिणामस्वरूप सरसों और गेहूं की समय पर बुवाई को भारी नुकसान पहुंचा है।
अक्तूबर का आधा महीना बीत जाने के बाद सरसों की बुवाई का सबसे अनुकूल समय निकल गया है। किसान नेताओं ने महसूस किया कि जब आंदोलनकारियों के बीच एकता ही नहीं रही और दो अलग-अलग दिशाओं में प्रयास होने लगे, तो उपखंड अधिकारी (एसडीएम) कार्यालय के सामने धरना देकर जनता को भ्रमित रखने का कोई औचित्य नहीं रह गया था। इसी स्थिति को देखते हुए अनूपगढ़ में जारी धरने को समाप्त करने का फैसला लिया गया।
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अनूपगढ़ और घड़साना के बीच समन्वय का अभाव
सिंचाई पानी को लेकर 24 सितंबर को जयपुर से आए मुख्य अभियंता मेहरड़ा और जिला कलेक्टर की उपस्थिति में अनूपगढ़ में वार्ता हुई थी। इस दौरान मुख्य अभियंता ने अक्तूबर में चार में से दो समूहों में पानी चलाने और छह बारियों का रेगुलेशन जारी करने का आश्वासन दिया था। हालांकि किसान सात बारियों के नियमन की मांग पर अड़े हुए थे, जिससे सहमति नहीं बन पाई।
इस प्रस्ताव पर अनूपगढ़ और घड़साना के किसान प्रतिनिधियों में समन्वय स्थापित नहीं हो सका। इसके चलते अनूपगढ़ शाखा और प्रथम चरण के नाम पर दो अलग-अलग तंबू लग गए। आंदोलन के शीर्ष नेतृत्व ने 25 सितंबर को घड़साना व्यापार मंडल पहुंचकर प्रमुख प्रतिनिधियों से बातचीत की। नेतृत्व ने घड़साना के किसानों को समझाया कि यदि छह बारियों और दो समूहों के पानी पर सहमति नहीं बनी, तो सरकार रेगुलेशन आगे खिसका देगी और पूरा क्षेत्र पानी से वंचित रह जाएगा। इसके बावजूद घड़साना में एकराय नहीं बन सकी। सरकार ने इस मतभेद का लाभ उठाकर पुराने रेगुलेशन को तोड़ दिया और नए आदेश में पानी आठ दिन आगे खिसका दिया।
आंदोलन का राजनीतिकरण
सुनील गोदारा ने आरोप लगाया कि शुरुआत में गैर-राजनीतिक रहे इस आंदोलन में बाद में विभिन्न राजनीतिक दलों के लोग सक्रिय हो गए। कुछ पुराने नेताओं को मंचों से दूर रखा गया, जिससे आंदोलन अपनी मुख्य धारा से भटक गया।
वर्ष 2004-05 के ऐतिहासिक किसान आंदोलन का स्मरण कराते हुए उन्होंने कहा कि उस समय जनता ने कर्फ्यू तक तोड़ दिया था। दो महीने के संघर्ष के बाद प्रथम चरण के किसानों को 5.23 क्यूसेक पानी का अधिकार और 16 लाख एकड़ कमांड क्षेत्र की सुरक्षा मिली थी। उस समय पूरा प्रथम चरण एकजुट होकर लड़ा था। आगामी 14 तारीख के चक्का जाम के संबंध में उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि लड़ाई पूरे प्रथम चरण के लिए चार में से दो समूहों में पानी लेने की होगी, तभी वे इसमें शामिल होंगे।
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सरसों की बुवाई का सबसे अनुकूल समय निकल गया
व्यापार मंडल अध्यक्ष सुनील गोदारा ने बताया कि सिंचाई पानी की मांग को लेकर यह आंदोलन अगस्त में मुख्यमंत्री के अनूपगढ़ दौरे के समय शुरू हुआ था। किसानों की मुख्य मांग थी कि इंदिरा गांधी नहर परियोजना के प्रथम चरण की नहरों को अक्तूबर में चार में से दो समूहों में चलाकर पर्याप्त पानी दिया जाए। वर्तमान में बांध में 1372 फीट पानी उपलब्ध होने के बावजूद किसानों को सही समय पर पानी नहीं मिल सका। इसके परिणामस्वरूप सरसों और गेहूं की समय पर बुवाई को भारी नुकसान पहुंचा है।
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अक्तूबर का आधा महीना बीत जाने के बाद सरसों की बुवाई का सबसे अनुकूल समय निकल गया है। किसान नेताओं ने महसूस किया कि जब आंदोलनकारियों के बीच एकता ही नहीं रही और दो अलग-अलग दिशाओं में प्रयास होने लगे, तो उपखंड अधिकारी (एसडीएम) कार्यालय के सामने धरना देकर जनता को भ्रमित रखने का कोई औचित्य नहीं रह गया था। इसी स्थिति को देखते हुए अनूपगढ़ में जारी धरने को समाप्त करने का फैसला लिया गया।
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अनूपगढ़ और घड़साना के बीच समन्वय का अभाव
सिंचाई पानी को लेकर 24 सितंबर को जयपुर से आए मुख्य अभियंता मेहरड़ा और जिला कलेक्टर की उपस्थिति में अनूपगढ़ में वार्ता हुई थी। इस दौरान मुख्य अभियंता ने अक्तूबर में चार में से दो समूहों में पानी चलाने और छह बारियों का रेगुलेशन जारी करने का आश्वासन दिया था। हालांकि किसान सात बारियों के नियमन की मांग पर अड़े हुए थे, जिससे सहमति नहीं बन पाई।
इस प्रस्ताव पर अनूपगढ़ और घड़साना के किसान प्रतिनिधियों में समन्वय स्थापित नहीं हो सका। इसके चलते अनूपगढ़ शाखा और प्रथम चरण के नाम पर दो अलग-अलग तंबू लग गए। आंदोलन के शीर्ष नेतृत्व ने 25 सितंबर को घड़साना व्यापार मंडल पहुंचकर प्रमुख प्रतिनिधियों से बातचीत की। नेतृत्व ने घड़साना के किसानों को समझाया कि यदि छह बारियों और दो समूहों के पानी पर सहमति नहीं बनी, तो सरकार रेगुलेशन आगे खिसका देगी और पूरा क्षेत्र पानी से वंचित रह जाएगा। इसके बावजूद घड़साना में एकराय नहीं बन सकी। सरकार ने इस मतभेद का लाभ उठाकर पुराने रेगुलेशन को तोड़ दिया और नए आदेश में पानी आठ दिन आगे खिसका दिया।
आंदोलन का राजनीतिकरण
सुनील गोदारा ने आरोप लगाया कि शुरुआत में गैर-राजनीतिक रहे इस आंदोलन में बाद में विभिन्न राजनीतिक दलों के लोग सक्रिय हो गए। कुछ पुराने नेताओं को मंचों से दूर रखा गया, जिससे आंदोलन अपनी मुख्य धारा से भटक गया।
वर्ष 2004-05 के ऐतिहासिक किसान आंदोलन का स्मरण कराते हुए उन्होंने कहा कि उस समय जनता ने कर्फ्यू तक तोड़ दिया था। दो महीने के संघर्ष के बाद प्रथम चरण के किसानों को 5.23 क्यूसेक पानी का अधिकार और 16 लाख एकड़ कमांड क्षेत्र की सुरक्षा मिली थी। उस समय पूरा प्रथम चरण एकजुट होकर लड़ा था। आगामी 14 तारीख के चक्का जाम के संबंध में उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि लड़ाई पूरे प्रथम चरण के लिए चार में से दो समूहों में पानी लेने की होगी, तभी वे इसमें शामिल होंगे।