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गुरदासपुर के डीसी सूचना आयोग में तलब
पठानकोट।
Updated Sat, 12 Oct 2013 10:24 PM IST
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पंजाब राज्य सूचना आयोग ने अधूरी सूचना देने पर गुरदासपुर के डीसी को तलब किया है। आयोग ने डीसी या अपना नुमाइंदा भेज 23 अक्तूबर को पेश होने के आदेश दिए हैं। आयोग को भेजी शिकायत में शिकायतकर्ता पठानकोट के सरना स्थित गुरु नाभा दास कॉलोनी निवासी विजय कुमार पुत्र तरसेम लाल ने बताया कि थाना सदर में तत्कालीन डीडीए जेके चोपड़ा की कानून राय के बाद उस पर आईपीसी की धारा 384, 341, 294, 509, 506 और 34 के तहत मामला दर्ज किया गया था।
पर्चा दर्ज होने के बाद विजय 14 से 20 मई, 2011 तक पठानकोट सब जेल और 20 से 27 मई तक केंद्रीय जेल गुरदासपुर में बतौर हवालाती रहा था। शिकायत में उसने बताया कि जमानत पर रिहा होने के बाद स्थानीय कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान 9 जून, 2011 को पर्चे में दर्ज आईपीसी की धारा 384 को तोड़ दिया था। शिकायतकर्ता ने बताया कि 27 अप्रैल, 2011 को कानवां थाना में डीडीए की कानूनी राय के बाद एससी-एसटी एक्ट, 324, 323 और 34 आईपीसी के मुताबिक पर्चा दर्ज हुआ था जिसमें वह शिकायतकर्ता है।
उसने आरोप लगाया कि अनुसूचित जाति से संबंधित होने की वजह से शुरुआत में साजिश के तहत एससी-एसटी एक्ट, आईपीसी की धारा 325, 148, 149 नहीं लगाई गई थी। बाद में तत्कालीन एसपी पठानकोट के आदेश पर उपरोक्त तीनों धाराओं को जोड़ दिया गया। इस वजह से आरोपियों को आसानी से केस में जमानत मिल गई। उसने आरोप लगाया कि उसके केस को कमजोर करने की साजिश रची गई।
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शिकायतकर्ता ने डीडीए के खिलाफ उपरोक्त दोनों मामलों में लापरवाही बरतने, भ्रष्टाचार और एससी-एसटी एक्ट के तहत कानूनी कार्रवाई करने की शिकायत पंजाब राज्य अनुसूचित जाति आयोग से की थी। आयोग ने मामले की डीसी गुरदासपुर को जांच के आदेश जारी किए थे। डीसी ने आगे एसडीएम गुरदासपुर से मामले की जांच कराई थी।
इसके बाद शिकायतकर्ता ने सूचना अधिकार अधिनियम के तहत डीसी गुरदासपुर से सूचना मांगी थी कि एसडीएम की जांच पर सहमत हैं या फिर नहीं। इसके जवाब में डीसी दफ्तर की ओर से एडीसी की रिपोर्ट को भेज दिया और उस पर अपनी सहमति के बारे में कोई सूचना तक नही दी गई। इसकी शिकायत पर सूचना आयोग ने डीसी गुरदासपुर को व्यक्तिगत तौर या फिर अपना नुमाइंदा 23 अक्तूबर को अयोग के सामने पेश होने के आदेश दिए हैं।
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पर्चा दर्ज होने के बाद विजय 14 से 20 मई, 2011 तक पठानकोट सब जेल और 20 से 27 मई तक केंद्रीय जेल गुरदासपुर में बतौर हवालाती रहा था। शिकायत में उसने बताया कि जमानत पर रिहा होने के बाद स्थानीय कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान 9 जून, 2011 को पर्चे में दर्ज आईपीसी की धारा 384 को तोड़ दिया था। शिकायतकर्ता ने बताया कि 27 अप्रैल, 2011 को कानवां थाना में डीडीए की कानूनी राय के बाद एससी-एसटी एक्ट, 324, 323 और 34 आईपीसी के मुताबिक पर्चा दर्ज हुआ था जिसमें वह शिकायतकर्ता है।
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उसने आरोप लगाया कि अनुसूचित जाति से संबंधित होने की वजह से शुरुआत में साजिश के तहत एससी-एसटी एक्ट, आईपीसी की धारा 325, 148, 149 नहीं लगाई गई थी। बाद में तत्कालीन एसपी पठानकोट के आदेश पर उपरोक्त तीनों धाराओं को जोड़ दिया गया। इस वजह से आरोपियों को आसानी से केस में जमानत मिल गई। उसने आरोप लगाया कि उसके केस को कमजोर करने की साजिश रची गई।
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शिकायतकर्ता ने डीडीए के खिलाफ उपरोक्त दोनों मामलों में लापरवाही बरतने, भ्रष्टाचार और एससी-एसटी एक्ट के तहत कानूनी कार्रवाई करने की शिकायत पंजाब राज्य अनुसूचित जाति आयोग से की थी। आयोग ने मामले की डीसी गुरदासपुर को जांच के आदेश जारी किए थे। डीसी ने आगे एसडीएम गुरदासपुर से मामले की जांच कराई थी।
इसके बाद शिकायतकर्ता ने सूचना अधिकार अधिनियम के तहत डीसी गुरदासपुर से सूचना मांगी थी कि एसडीएम की जांच पर सहमत हैं या फिर नहीं। इसके जवाब में डीसी दफ्तर की ओर से एडीसी की रिपोर्ट को भेज दिया और उस पर अपनी सहमति के बारे में कोई सूचना तक नही दी गई। इसकी शिकायत पर सूचना आयोग ने डीसी गुरदासपुर को व्यक्तिगत तौर या फिर अपना नुमाइंदा 23 अक्तूबर को अयोग के सामने पेश होने के आदेश दिए हैं।