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नहीं भरे बाढ़ से मिले जख्म
पठानकोट।
Updated Sun, 27 Jul 2014 10:52 PM IST
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चक्की दरिया में पिछले वर्ष आई बाढ़ से प्रभावित लोगों के जख्म अब भी हरे हैं। उनकी जिन्दगी पटरी पर नहीं लौटी है।
उन्हें इस बात का मलाल है कि प्रभावित क्षेत्रों में राहत और बचाव के लिए अपेक्षित कार्य नहीं हुए। जबकि सरकारी फाइलों में बाढ़ राहत के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च कर दिए गए। तटवर्ती इलाकों में राहत और बचाव के प्रभावी कार्य न होने से ही चक्की दरिया में बाढ़ के खतरे को लेकर एक बार फिर लोगों की सांस अटकी है। उन्हें डर है कि यदि इस बार भी दरिया में बाढ़ आई तो तबाही तय है।
इस बार भी सरकारी स्तर से बाढ़ से पूर्व सुरक्षा इंतजामों के मद में 35 लाख खर्च का दावा किया गया है, लेकिन तटवर्ती इलाकों के लोग खुद को सुरक्षित महसूस नहीं कर रहे हैं। वैसे तो बरसात के अलावा अन्य मौसम में चक्की दरिया नाले के रूप में ही नजर आती है, लेकिन बरसात में इसका विकराल रूप अब तक कई बार तबाही मचा चुका है।
नदी तट के सैली कुलियां व तबूआ सरीखे गांव बाढ़ से सबसे अधिक प्रभावित हुए। हिमाचल प्रदेश तथा पंजाब को जोड़ने वाला रेलवे पुल भी बीते वर्ष में पानी में बह गया था। इसके चलते पठानकोट-जोगिन्द्र नगर रेल सेवा भी बाधित हुई थी।
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हाईवे को खतरा
चक्की दरिया से करीब 20 फुट की दूरी पर स्थित जम्मू- जालंधर नेशनल हाईवे पर भी खतरे के बादल मंडरा रहे हैं। नदी में बाढ़ आई तो राजमार्ग भी प्रभावित हो सकता है। इतना ही नहीं चक्की दरिया के पास स्थित क्रेशर भी खतरे से खाली नहीं हैं। अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि बीते वर्ष इस दरिया के बहाव में एक क्रेशर भी भेंट चढ़ गया था।
दरिया के तट पर सुरक्षा इंतजाम के तहत कहने के लिए तो सैली कुलिया के पास स्थित उदासीन आश्रम के पीछे बांध बनाया जा रहा है, लेकिन बरसात शुरू होने के बाद भी अभी तक निर्माण कार्य पूरा न हो सका है। दूसरी ओर प्रभावित ग्रामीणों के मकान अब भी बाढ़ की विभीषिका की कहानी बयां कर रहे हैं। उचित सरकारी मदद न मिलने के कारण बाढ़ से ढहे मकानों की मरम्मत नहीं हो सकी है।
नेताओं ने छला : सुनीता
बाढ़ प्रभावित सुनीता देवी ने बताया कि उसका मकान पिछले वर्ष भी चक्की दरिया की भेंट चढ़ गया था। अब भी दरिया से उसके मकान को खतरा है। वह 12 वर्ष से यहां रह रहे हैं । यहां का हाल जानने मास्टर मोहन लाल, प्रताप सिंह बाजवा, दिनेश सिह बब्बू तथा अश्वनी कुमार सरीखे नेता तो आए, लेकिन वे सिर्फ आश्वासन देकर लौट गए।
घर की छत से ही खौफ : सुमीता
सुमीता देवी ने बताया कि वह 6 वर्ष से यहां रह रहे हैं । बीते वर्ष उसके कमान के दो कमरे चक्की दरिया में बह गए। एक कमरा जो बचा है वह भी जर्जर है। उसमें दरारे आ गई हैं। वह कभी भी गिर सकता है। अब तो उन्हें अपने घर की छत से ही डर लगता है।
भूकटाव रोकना जरूरी : अजय
अजय कुमार ने बताया कि यहां पानी के बहाव को रोकने के लिए क्रेट बांधे जाते हैं, लेकिन इनका कोई फायदा नहीं होता। जब तक दरिया के तट पर भूकटाव होता रहेगा, खतरा भी मंडराता रहेगा। सरकार की ओर से हमारी कोई मदद नहीं की जा रही है।
सरकार ने दिखा धोखा
सुरिन्द्र कौन ने बताया कि हमने यह स्थान सरकारी स्तर सेे मिली थी। यदि सरकार को पता था कि यह चक्की दरिया के पानी के खतरे में आता है, तो हमें यह भूमि क्यों अलाट की गई। हर वर्ष हमारे घर दरिया की भेंट चढ जाते हैं, लेकिन प्रशासन की ओर से कोई उपाय नहीं किया जाता। इसलिए सरकार को हमें इस स्थान की जगह किसी अन्य स्थान पर भूमि उपलब्ध कराई जाय, जहां वे सुरक्षित जीवन व्यतीत कर सकें।
डीसी बोले, कोई खतरा नहीं
डीसी सुखविंद्र सिंह ने कहा कि बाढ़ की रोकथाम के लिए जो बांध बनाए जा रहे हैं, उनका निर्माण 35 लाख की लागत से हो रहा है। बांधों का निर्माण इसलिए किया जा रहा है, ताकि बाढ़ से कोई नुकसान न हो। मानसून देर से आने के कारण बाढ़ का खतरा कम है। तट पर भूकटाव रोकने के लिए मिट्टी की जरूरत फंड की कमी के कारण पूरी नहीं की जा सकी है।
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उन्हें इस बात का मलाल है कि प्रभावित क्षेत्रों में राहत और बचाव के लिए अपेक्षित कार्य नहीं हुए। जबकि सरकारी फाइलों में बाढ़ राहत के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च कर दिए गए। तटवर्ती इलाकों में राहत और बचाव के प्रभावी कार्य न होने से ही चक्की दरिया में बाढ़ के खतरे को लेकर एक बार फिर लोगों की सांस अटकी है। उन्हें डर है कि यदि इस बार भी दरिया में बाढ़ आई तो तबाही तय है।
इस बार भी सरकारी स्तर से बाढ़ से पूर्व सुरक्षा इंतजामों के मद में 35 लाख खर्च का दावा किया गया है, लेकिन तटवर्ती इलाकों के लोग खुद को सुरक्षित महसूस नहीं कर रहे हैं। वैसे तो बरसात के अलावा अन्य मौसम में चक्की दरिया नाले के रूप में ही नजर आती है, लेकिन बरसात में इसका विकराल रूप अब तक कई बार तबाही मचा चुका है।
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नदी तट के सैली कुलियां व तबूआ सरीखे गांव बाढ़ से सबसे अधिक प्रभावित हुए। हिमाचल प्रदेश तथा पंजाब को जोड़ने वाला रेलवे पुल भी बीते वर्ष में पानी में बह गया था। इसके चलते पठानकोट-जोगिन्द्र नगर रेल सेवा भी बाधित हुई थी।
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हाईवे को खतरा
चक्की दरिया से करीब 20 फुट की दूरी पर स्थित जम्मू- जालंधर नेशनल हाईवे पर भी खतरे के बादल मंडरा रहे हैं। नदी में बाढ़ आई तो राजमार्ग भी प्रभावित हो सकता है। इतना ही नहीं चक्की दरिया के पास स्थित क्रेशर भी खतरे से खाली नहीं हैं। अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि बीते वर्ष इस दरिया के बहाव में एक क्रेशर भी भेंट चढ़ गया था।
दरिया के तट पर सुरक्षा इंतजाम के तहत कहने के लिए तो सैली कुलिया के पास स्थित उदासीन आश्रम के पीछे बांध बनाया जा रहा है, लेकिन बरसात शुरू होने के बाद भी अभी तक निर्माण कार्य पूरा न हो सका है। दूसरी ओर प्रभावित ग्रामीणों के मकान अब भी बाढ़ की विभीषिका की कहानी बयां कर रहे हैं। उचित सरकारी मदद न मिलने के कारण बाढ़ से ढहे मकानों की मरम्मत नहीं हो सकी है।
नेताओं ने छला : सुनीता
बाढ़ प्रभावित सुनीता देवी ने बताया कि उसका मकान पिछले वर्ष भी चक्की दरिया की भेंट चढ़ गया था। अब भी दरिया से उसके मकान को खतरा है। वह 12 वर्ष से यहां रह रहे हैं । यहां का हाल जानने मास्टर मोहन लाल, प्रताप सिंह बाजवा, दिनेश सिह बब्बू तथा अश्वनी कुमार सरीखे नेता तो आए, लेकिन वे सिर्फ आश्वासन देकर लौट गए।
घर की छत से ही खौफ : सुमीता
सुमीता देवी ने बताया कि वह 6 वर्ष से यहां रह रहे हैं । बीते वर्ष उसके कमान के दो कमरे चक्की दरिया में बह गए। एक कमरा जो बचा है वह भी जर्जर है। उसमें दरारे आ गई हैं। वह कभी भी गिर सकता है। अब तो उन्हें अपने घर की छत से ही डर लगता है।
भूकटाव रोकना जरूरी : अजय
अजय कुमार ने बताया कि यहां पानी के बहाव को रोकने के लिए क्रेट बांधे जाते हैं, लेकिन इनका कोई फायदा नहीं होता। जब तक दरिया के तट पर भूकटाव होता रहेगा, खतरा भी मंडराता रहेगा। सरकार की ओर से हमारी कोई मदद नहीं की जा रही है।
सरकार ने दिखा धोखा
सुरिन्द्र कौन ने बताया कि हमने यह स्थान सरकारी स्तर सेे मिली थी। यदि सरकार को पता था कि यह चक्की दरिया के पानी के खतरे में आता है, तो हमें यह भूमि क्यों अलाट की गई। हर वर्ष हमारे घर दरिया की भेंट चढ जाते हैं, लेकिन प्रशासन की ओर से कोई उपाय नहीं किया जाता। इसलिए सरकार को हमें इस स्थान की जगह किसी अन्य स्थान पर भूमि उपलब्ध कराई जाय, जहां वे सुरक्षित जीवन व्यतीत कर सकें।
डीसी बोले, कोई खतरा नहीं
डीसी सुखविंद्र सिंह ने कहा कि बाढ़ की रोकथाम के लिए जो बांध बनाए जा रहे हैं, उनका निर्माण 35 लाख की लागत से हो रहा है। बांधों का निर्माण इसलिए किया जा रहा है, ताकि बाढ़ से कोई नुकसान न हो। मानसून देर से आने के कारण बाढ़ का खतरा कम है। तट पर भूकटाव रोकने के लिए मिट्टी की जरूरत फंड की कमी के कारण पूरी नहीं की जा सकी है।